हिमालय को चाहिएं हमदर्द

Submitted by Hindi on Mon, 09/26/2011 - 11:05
Source
संडे नई दुनिया, 25 सितंबर- 01 अक्टूबर 2011

भारतभूमि के मस्तक हिमालय का भला महज सम्मान से ही नहीं हो सकता, उसे अलग नीति चाहिए जो उसके दुख-दर्द को ध्यान में रखकर बनाई गई हो। पर्वतीय राज्यों के लिए अलग हिमालय नीति की मांग जोर-शोर से उठ रही है।

हिमालय और हिमालय से जुड़े सवालों को जानने-समझने और उठाने से जुड़ी मुहिम धीरे-धीरे रंग लाने लगी है। हिमालयी परिवेश को सुरक्षित-संरक्षित रखने की लड़ाई लड़ रहे कार्यकर्ताओं ने पिछले साल 9 सितंबर को हिमालय दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत की। दूसरे ही साल यह इतना लोकप्रिय हो गया कि अकेले देहरादून शहर में छह से अधिक स्थानों पर हजारों लोगों ने अपने-अपने तरीके से हिमालय दिवस मनाया। हिमालय दिवस असल में उस पूरी प्रक्रिया और लड़ाई की एक कड़ी के रूप में है जहां देश-दुनिया के हिमालय प्रेमी भौगोलिक रूप से भिन्न इस भूभाग के लिए अलग रीति-नीति की बात कर रहे हैं। इस बार का हिमालय दिवस संस्थाओं, दबाव समूहों, रंग-संस्कृति कर्मियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने तो मनाया ही, पहली बार स्कूलों में भी हिमालय दिवस के कार्यक्रम आयोजित किए गए।

सब तरफ दिख जाते हैं ऐसे विरोध से भरे नारेसब तरफ दिख जाते हैं ऐसे विरोध से भरे नारेउत्तराखंड में हिमालय के सवालों को उठाने के लिए जनसंगठनों ने मिलकर हिमालय यूनिटी फॉर मूवमेंट (हम) नाम से एक फोरम का गठन किया है जिसमें राज्य की लगभग 30 संस्थाएं शामिल हैं । पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा, पद्मश्री डॉ. अनिल जोशी, जनकवि अतुल शर्मा, सामाजिक कार्यकर्ता राधा बहन, गीता गैरोला, सुरेश भाई, भुवन पाठक, विजय प्रताप, हर्ष डोभाल, देवेंद्र बहुगुणा, तरुण जोशी जैसे सामाजिक कार्यकर्ता राज्य में इस मुहिम की अगुवाई करने में जुटे हैं। छात्र समुदाय और राजनीतिक दल भी धीरे-धीरे इसका हिस्सा बन रहे हैं। हिमालय दिवस के मौके पर देहरादून के गांधी पार्क से हिंदी भवन तक 'हम' द्वारा आयोजित जागरूकता रैली में सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। इस मौके पर आयोजित गोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि हिमालय को बचाने की जिम्मेदारी केवल पहाड़ के लोगों की नहीं बल्कि सबकी है। इसके लिए नीति बनाने वालों को अलग से विचार करना चाहिए। हिमालय के जल, जंगल और जमीन का अनियोजित एवं अवैज्ञानिक दोहन एवं जीविका के लिए पहाड़ से लोगों का पलायन देश की सुरक्षा के लिए भी खतरा है। इस बात पर भी जोर दिया गया कि पहाड़ को बचाने और सही अर्थों में पहाड़ के विकास के लिए वहां मल्टीनेशनल्स कंपनियों का दखल कम करना होगा। वक्ताओं ने कहा कि हिमालय को एक अलग भू-भाग के रूप में मान्यता देने की जरूरत है। कश्मीर से लेकर नगालैंड तक के पर्वतीय राज्यों के लिए अलग हिमालय नीति बनाने की मांग भी कार्यक्रम में जोर-शोर से उठी। गोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि संसद में पहाड़ी राज्यों के सांसदों की संख्या 36 है जिन्हें हिमालय नीति के लिए पहल करनी चाहिए। पहाड़ों में बन रही जलविद्युत परियोजनाओं पर रोक लगाकर छोटी परियोजनाएं बनाने और सहकारिता के आधार पर उनका संचालन स्थानीय समुदायों को देने की मांग भी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने की।

पर्यावरणविद् सुरेश भाई ने कहा कि हिमालय का जनजीवन एवं उनकी जीविका का आधार मुख्य रूप से प्राकृतिक संसाधन हैं जिन पर अब भी आम लोगों का अधिकार नहीं है। हिमालय की नदियों से देश को 60 प्रतिशत जलापूर्ति होती है। यह जलापूर्ति भविष्य में भी जारी रहे इसके लिए नदियों के उद्गम वाले हिमालयी राज्यों में नदियों का जल बहाव निरंतर एवं अविरल रखना जरूरी है। पलायन रोकने के लिए पहाड़ों में नए सिरे से भूमि प्रबंधन किए जाने की जरूरत है।

'हम' के लिए गांव-गांव से देहरादून पहुँची महिलाएं'हम' के लिए गांव-गांव से देहरादून पहुँची महिलाएंसामाजिक कार्यकर्ता भुवन पाठक ने कहा कि हिमालय केवल भारत को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को प्रभावित करता है। जिस प्रकार बीते दशकों में प्राकृतिक संसाधनों की लूट का सिलसिला शुरू हुआ है उससे उत्तराखंड का हिमालयी क्षेत्र भी बच नहीं सका है। सरकारें जल, जंगल और जमीन खुले हाथों जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण और प्रबंधन के नाम पर मल्टीनेशनल कंपनियों को लुटा रही हैं। अकेले उत्तराखंड राज्य में 200 से अधिक परियोजनाएं वर्तमान में कार्यरत हैं तथा प्रस्तावित और निर्माणाधीन को मिला दें तो यह आंकड़ा 400 को पार कर जाता है। ऐसे में सरकारों को अब यह विचार करना ही होगा कि वह पहाड़ को और कितना खोखला बनाना चाहती है।

महिला समाख्या कार्यकर्ता डॉ. चंद्रा भंडारी ने कहा कि महिलाएं हिमालयी जनजीवन की रीढ़ हैं। घर-गृहस्थी से लेकर कृषि कार्य तक सब कुछ महिलाएं ही संभालती हैं। पहाड़ में महिलाओं को चारा-पानी सहित रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए लंबी-लंबी यात्राएं व कठिन श्रम करना पड़ता है। महिला केंद्रीत ऐसी नीतियां बनाए जाने की जरूरत है जिनसे महिलाओं के ऊपर से काम का बोझ कम होने के साथ ही, उन्हें आर्थिक रूप से स्वाबलंबी भी बनाया जा सके।

हिमालय दिवस के अवसर पर देहरादून में आयोजित एक कार्यक्रमहिमालय दिवस के अवसर पर देहरादून में आयोजित एक कार्यक्रमकांग्रेस प्रदेश उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना ने कहा कि हिमालय देश के मस्तक की तरह है। देश की पानी, बिजली जैसी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के साथ ही प्राणवायु भी देता है। हिमालय देश के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा चक्र का निर्माण भी करता है। उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों के लिए अलग से नीति बनाने के साथ ही विकास के लिए अलग से योजनाएं भी बननी चाहिए।

हिमालय दिवस मनाने के साथ ही जनसंगठनों ने हिमालय लोकनीति नाम से एक ड्राफ्ट भी तैयार किया है। इस लोकनीति में जल, जंगल और जमीन पर स्थानीय लोगों के अधिकार की मांग की गई है। इसमें कहा गया है कि प्राकृतिक संसाधनों पर ग्राम सभाओं का अधिकार होना चाहिए तथा वन और भूमि से संबंधित सरकारी विभागों को तकनीकी व आर्थिक सहयोगी के रूप में रहना चाहिए। वन, वनभूमि और वनौषधी को लेकर भी हिमालय लोकनीति में कहा गया है कि अगर वनों पर ग्रामीणों का अधिकार होगा तो प्रत्येक गांव का अपना जंगल होगा जहां से वह घास, लकड़ी व चारे की आपूर्ति कर सकता है। परियोजनाओं और विकास के बढ़ते बोझ के कारण अब कई ऐसे गांव हैं जिनका कोई जंगल नहीं बचा है। अंतर्राष्ट्रीय कार्बन ट्रेडिंग के अनुबंधों से हिमालय क्षेत्र को मुक्त रखने की बात भी हिमालय लोकनीति में कही गई है। लोकनीति का कहना है कि वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण हिमालय क्षेत्र में पड़ने वाले प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन स्थानीय लोगों के साथ मिलकर ही किया जना चाहिए। अध्ययन के बाद तापमान वृद्धि को रोकने के उपाय भी स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर ही किए जाने चाहिए। लोकनीति हिमालय में शिक्षा, पर्यटन और रोजगार के अवसर बढ़ाने की भी मांग करती है। लोकनीति में हिमालय राज्यों के लिए केंद्र सरकार सेहिमालय विकास मंत्रालय बनाने की भी मांग की गई है।

हिमालय पर मंडरा रहा है खतरा


'हम' की एक रैली में अपनी मांगो के साथ शामिल लोग'हम' की एक रैली में अपनी मांगो के साथ शामिल लोगभौतिक विकास और व्यावसायिक दृष्टिकोण ने हिमालय को खतरे में डाल दिया है। बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण ने हिमालय के पारिस्थितिकी को प्रभावित करने के साथ ही लाखों लोगों को विस्थापित होने पर मजबूर किया है। पहाड़ के संवेदनशील क्षेत्रों में भारी-भरकम मशीनों के साथ ही डायनामाइट के विस्फोटों ने पहाड़ों को झकझोर देने का काम किया है। पर्यावरण में आ रहे बदलाव हिमालय के साथ ही पूरे देश के लिए दूरगामी कुप्रभावों की ओर इशारा कर रहे हैं। टिहरी में बनाई गई विशालकाय झील के कारण उसके आस-पास के सैकड़ों गांवों में भूस्खलन और भूधसाव की चपेट में आ गए हैं। पहाड़ों में लगातार तेज हो रहे भूस्खलन का असर जनमानस के जलस्रोतों और चरागाहों पर भी पड़ रहा है। प्रसिद्ध भू-वैज्ञानिक के.एस. बल्दिया ने एक अध्ययन में पाया है कि पहाड़ों में 50 प्रतिशत जलस्रोत सूख गए हैं और पहाड़ की कई सदानीरा नदियां मौसमी नदियों के रूप में परिवर्तित हो गई हैं। सुरंग आधारित जलविद्युत परियोजनाएं भी हिमालय के लिए एक बड़ा खतरा हैं। इन परियोजनाओं के लिए बनने वाली सुरंगें हिमालय को खोखला और कमजोर बना रही हैं।

Email:- mahesh.pandey@naidunai.com

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