इंडिया वाटर बनाम इंडिया मार्का

Submitted by Hindi on Mon, 10/24/2011 - 16:59

पिछले दिनों अमेठी के करीब 250 मानिंदों की सहभागिता से संपन्न हुए एक उर्जा सम्मेलन ने चेतना जगाई है। सिर पर आ गये पानी के संकट की गुहार ने अमेठी के लोगों की नींद तोड़ी है। मुट्ठी भर लोग लोटा-डोरी बांधकर जलयात्रा पर निकल भी चुके हैं। दुआ कीजिए कि ये सफल हों! इनका श्रम जगे और कम से कम इनके एक सांसद की चेतना; ताकि और इंडिया मार्का लगाने की जरुरत न पड़े;... और तालाब-कुंए-नदियां फिर से जिंदा हो जायें।

पिछले तीन दशक से उत्तर प्रदेश का ’अमेठी’ एक अति विशिष्ट लोकसभा क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। इस इलाके के पानी की तस्वीर से आप पानी पर देश के नीति निर्धारकों की दृष्टि की एक बानगी देख सकते हैं। पहले वी वी आई पी सांसद स्व. संजय गांधी ने अमेठी में धान-गन्ना खूब बोने की सलाह दी थी। उन्हें पानी पर बात करने की न फुरसत थी, न समझ। उस वक्त तक अमेठी के समदा-बढ़ैया जैसे कई तालों की जलराशि विशाल थी और जेठ की दोपहरी में छोटे ताल-तलैयों में भैंसों व चरवाहों की मस्ती आम। मालती-उज्जयिनी जैसी नदियों में कुलाचें मारती टोलियां कभी भी देखी जा सकती थी। बड़े उत्सवों के मौके पर नदी के पानी से भोज पकाकर शुद्धता की गारंटी दी जाती थी। कुओं की खुदाई गुड़ के शर्बत, लाई-चने के फांके तथा हंसी ठहाकों के साझे से हो जाती थी।कुओं में आठ-दस हाथ की रस्सी से काम चल जाता था। दुगला से पानी उठाकर खेतों तक पहुंचाने के लिए नहरें भी थी। अतः उनमें पानी की आवक से सिंचाई की गारंटी सुनिश्चित की जा सकती थी; बावजूद इनके तब सिंचाई के लिए सरकारी गहरे नलकूप लगाये गये। इस तरह नहरों के बाद दूसरी बार पानी के लिए किसी बाहरी मशीन या प्रणाली पर लोगों की निर्भरता का नमूना सामने आया।

‘80 के दशक में एक बाढ़ आई। तालाबों की पाल लांघकर पानी खेतों में भरा रहा। तब राजीव गांधी सांसद थे। बाढ़ मुक्ति के लिए उन्होंने बढ़ैया ताल जैसे कई बड़े तालाबों से जल निकासी के नाले खुदवा दिए। वे आज भी उसी तरह पानी बहाकर तालाब खाली कर देते हैं। उनके इस निर्णय को आसपास के कई इलाकों में अपनाया। नतीजे भी सभी ने भुगते। निजी नलकूपों के लिए बांटी गई सब्सिडी ने इस संकट को बढ़ाया ही। लगाये गये कुछेक उद्योगों ने भी आगे चलकर पानी की मात्रा व गुणवत्ता में सेंध लगाई। राजीव गांधी के जमाने तक अमेठी के आम आदमी की अपने सांसद तक पहुंच आसान थी। वहां से लौटे लोगों में वी वी आई पी होने का घमंड दिखाई देने लगा था। इसका प्रतिबिंब कालांतर में प्रधानों द्वारा बड़े पैमाने पर किए गये भूमि पट्टों व पंचायती जमीनों पर कब्जों के रूप में दिखा। कब्जे बढ़े, तो तालाब सिकुड़ गये।

अमेठी में उसर-बंजर क्षेत्र की अधिकता व उससे जुड़े भाग्य को लेकर एक कहावत प्रचलित है, ‘जो न होते अमेठी में उसर, तो अमेठी के दइव होते दूसर।’ यानी यदि अमेठी मे उसर धरती न होती, तो अमेठी का भाग्य विधाता कोई और होता। यह अधिकता बाद के वर्षों में और बढ़ी। आज से करीब एक दशक पहले तत्कालीन सांसद श्रीमती सोनिया गांधी इस बात को लेकर चिंतित हुईं। उन्हें उसर की अधिकता का कारण बताने के लिए एक अति प्रतिष्ठित भूगोल संस्थान के वैज्ञानिक तथा स्थायी कृषि विज्ञान केंद्र के दल ने दौरा किया। रिपोर्ट दी – “धरती के भीतर चट्टानों की परत है। उसी के चलते धरती पानी सोख नहीं पाती। यह जलभराव ही अंततः जमीन को बंजर बना रही है।”

इस रिपोर्ट से असंतुष्ट वैज्ञानिक स्व. श्री अनिल अग्रवाल ने पानी कार्यकर्ताओं की एक देहाती टीम को वहां भेजा। वापस लौटी टीम के एक कार्यकर्ता ने जमीन पर लाइने खींचकर उन्हें बताया कि कैसे अमेठी में फैली सड़कों के नये संजाल ने पानी की घेराबंदी कर दी है। सड़कों में आसपास की जमीन के ढाल को समझे बगैर गलत जगह पर लगाई गई जलनिकासी पाइप बेकार साबित हुई है। परिणामस्वरूप सड़कों ने वहां एक ओर जलभराव किया, तो दूसरी ओर जलाभाव। दोनों ने जमीन को बेकार किया। खारा पानी व बंजर धरती दोनो बढ़े। दुर्भाग्य से उसके कुछ महीने बाद अनिल जी नहीं रहे। सांसद महोदया की चिंता रिपोर्ट तक सीमित होकर रह गई।

इसी बीच विश्व बैंक की स्वजल योजना आई। तब तक अमेठी के कुओं का पानी उतरना शुरु हो गया था। चार नंबर की मशीन वाले हैंडपंप दिखाई देने लगे थे। वी वी आई पी इलाके के लोग पानी खींचने के लिए मेहनत क्यों करें? अतः यहां 150-200 गहरे बोर वाले इंडिया मार्का हैंडपंप की एक बड़ी खेप इस इलाके में खैरात की तरह खपा दी गई। जहां जरुरत थी, वहां भी और जहां जरुरत नहीं थी, वहां भी। प्रधानों व पार्टी कार्यकर्ताओं ने लोगों की जरुरत के लिए नहीं, अपितु अपनी हैसियत जताने के लिए इंडिया मार्का लगवाये, जो जितने ज्यादा इंडिया मार्का ला सके, वह उतना बड़ा कार्यकर्ता। मुफ्त में बांटा गया इंडिया मार्का हैसियत का प्रतीक हो गया। इसने आगे चलकर काफी नुकसान किया।

2004 के चुनाव हुए। राहुल गांधी ने सांसदी संभाली। तब तक खैरात के इंडिया मार्का की मांग काफी बढ़ चुकी थी। मांग पर लगाम के लिए आवेदकों द्वारा इंडिया मार्का की कुल लागत का 10 फीसदी खर्च वहन करने का प्रावधान किया गया लेकिन मांग घटी नहीं, क्योंकि ज्यादातर कुएं उपयोग न करने के कारण बेकार हो चुके थे। शेष पानी की अधिक खिंचाई व परंपरागत स्रोतों के सूख जाने के कारण संकट की चपेट में आ चुके थे। नदियों ने ठेंगा दिखाना शुरु कर दिया था। खारे पानी के इलाके बढ़ने लगे थे। चार नबंर की मशीन वाले हैंडपंप पानी की जगह रेत पिलाने लगे थे। छह नंबर की मशीन भी ज्यादा दिन साथ नहीं देगी; ऐसा साफ दिखाई देने लगा था। इंडिया मार्का की मांग इतनी बढ़ी, कि सांसद-विधायक के माथे पर बल पड.गये। आवेदक के पास अगली बार वोट मांगने जाने तक उसे इंडिया मार्का मिलेगा भी या नहीं...यह गारंटी देना कठिन हो गया। इसीलिए चुनाव आने से साल-छह महीने पहले इंडिया मार्का बांटे जाने की रणनीति अपना ली गई। अब कहीं-कहीं इंडिया मार्का भी जवाब देने लगा है। कुएं पहले ही साथ छोड़ चुके हैं। लोगों ने समर्सिबल का दामन थाम लिया है। अब कम में समर्सिबल लगाने के लिए कंपनियां आगे आ गई हैं। खेती का पानी और मंहगा हो गया है। पीने का क्या होगा? यह सवाल अमेठी के सामने सिर उठाकर खड़ा हो गया है। फिलहाल कई गांवों में जल निगम के नलों का प्रवेश कराकर इतिश्री कर ली गई है। इंडिया वाटर बनाम इंडिया मार्का का हश्र सामने आ गया है।

क्या अमेठी के सांसद इससे चिंतित हैं। नहीं? तभी अमेठी के लोगों का उद्धार करने आया राजीव गांधी चेरिटिबल ट्रस्ट पढ़ाई, सेहत व महिला सबलीकरण के प्रोजेक्ट व पैसा तो लाया, इलाके की एक बंद पड़ी फैक्टरी खरीदकर रोजगार देने की भी बात कही, किंतु उससे कहीं ज्यादा बड़ा रोजगार व सेहत देने वाले नीचे गये पानी को ऊपर लाने में ट्रस्ट ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। दलितों के घर में भोजन करने के शौकीन सांसद महोदय ने जानने की कोशिश नहीं की, कि उनके परिवार द्वारा संचालित संजय गांधी अस्पताल व गेस्ट हाउस के अलावा एच ए एल फैक्टरी का कचरा.. किस जल स्रोत में मिलकर किस दलित की जिंदगी में कितना जहर घोल रहा है। इसकी खबरों ने भी सांसद को कभी चिंतित नहीं किया। उन्होंने जिस समदा ताल के पुर्नउद्धार की परियोजना का बड़े उत्साह से श्रीगणेश किया था; उसका क्या हश्र हुआ?.. उन्होंने यह जानने की जहमत भी नहीं उठाई। हां! राजीव गांधी महिला परियोजना का एक दफ्तर अवश्य उज्जयिनी नदी के मूल स्रोत के पेट पर बना दिया गया है।

अमेठी लोकसभा क्षेत्र के इस एक चावल से आप-हम पूरी पतीली का अंदाज लगा सकते हैं कि पानी को लेकर सांसदों की दिलचस्पी कितनी है। हालात ये हैं कि जहां लोग सो गये, वहां सत्ता की लोकधर्मिता भी सो गई। जहां जन जगा, वहीं कुछ आगाज हुआ। पिछले दिनों अमेठी के करीब 250 मानिंदों की सहभागिता से संपन्न हुए एक उर्जा सम्मेलन ने चेतना जगाई है। सिर पर आ गये पानी के संकट की गुहार ने अमेठी के लोगों की नींद तोड़ी है। मुट्ठी भर लोग लोटा-डोरी बांधकर जलयात्रा पर निकल भी चुके हैं। दुआ कीजिए कि ये सफल हों! इनका श्रम जगे और कम से कम इनके एक सांसद की चेतना; ताकि और इंडिया मार्का लगाने की जरुरत न पड़े;... और तालाब-कुंए-नदियां फिर से जिंदा हो जायें।

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