नीति बनाकर ही हो नदियों का संरक्षण

Submitted by Hindi on Tue, 10/18/2011 - 12:03
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यदि नदियों को और खुद को बचाना है, तो सामाजिक जवाबदारी व हकदारी दोनों साथ सुनिश्चित करनी ही पड़ेगी। इसीलिए जरूरी है कि सभी राज्य अपने-अपने स्तर पर स्थानीय भूसांस्कृतिक विविधता का सम्मान करते हुए नदी नीतियां बनायें। फिलहाल देश की एक अदालत ने रास्ता दिखा दिया है। गंगा एक्सप्रेस वे तथा यमुना एक्सप्रेस वे के मामले में बता दिया है कि नदियों की जमीन, बाढ़ क्षेत्र बिकाऊ नहीं है। इन्हें बेचे नहीं, बल्कि बचायें।

हम आज तक भाखड़ा-टिहरी-नर्मदा बांध के विस्थापितों का ठीक से पुनर्वास नहीं कर सके हैं। सतलुज-कावेरी जैसे अन्तर्राज्यीय व भारत बनाम बांग्लादेश-चीन-पाकिस्तान जैसे अन्तर्राष्ट्रीय नदी जल बंटवारे के मसले भी अनसुलझे ही हैं। नदियों को मां मानने वाले भारत में नदियों को नाला बनाने तथा डंप एरिया में तब्दील करने का चलन नापाक होते हुए भी बढ़ता ही जा रहा है। गंगा कार्य योजना से लेकर अभी तक हुए नदी प्रदूषण मुक्ति के प्रयास नाकाफी साबित हुए हैं। साफ दिखाई दे रहा है कि सरकार व प्रदूषण मुक्ति के नाम पर पैसा मुहैया कराने वालों का जोर प्रदूषण मुक्ति के स्थान पर देश में जल-मल शोधन संयंत्रों का उद्योग खड़ा करने पर है।

नदी भूमि व बाढ़ क्षेत्र पर बढ़ती बसावट, बढ़ते अनधिकृत कब्जे व भूमि अधिग्रहण के बढ़ते लालच पर लगाम लगती दिखाई नहीं दे रही है। मुख्य धारा योजना में है। बेसिन तथा नदियों के मूल स्रोतों को बचाने की कोई साकार कोशिश नहीं चल रही। नदी तल का रेत, पत्थर, चट्टानें, प्रवाह, नदी की जमीन, तथा नदी को नदी बनाने वाली सहायक छोटी धारायें, जीव व वनस्पतियों को हासिल किए बगैर कोई नदी अपने नैसर्गिक स्वरूप को वापस नहीं पा सकती। इस सत्य से हम सभी अवगत हैं। इसके लिए कई संत शक्तियों द्वारा जान की बाजी लगाने की घटनाओं के बावजूद पूरा जैवविविधता तंत्र ही दांव पर है। नतीजा? हम अपनी नदियों को नैसर्गिक स्वरूप लौटाने की दिशा में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ रहे हैं।

उक्त परिदृश्य की प्रमाणिकता जांचने के लिए किसी आंकड़े या अध्ययन की जरूरत नहीं। यमुना, भिलंगना, मंदाकिनी, टौंस, हिंडन, गोमती, दामोदर, कोसी, ब्रह्मपुत्र, बांडी-लूणी, साबरमती, वैधवती, अकरावती, अडियार, कूवम, गार्वी से लेकर मुंबई की मीठी व पुणे की मुला-मुठा, देवनदी, रामनदी......देश की किसी भी एक नदी को जाकर अपनी आंखों से देख लीजिए; प्रमाण मिल जायेंगे। नदियों को नाला बनाने की शासकीय बेसमझी के कई नमूने देश में हैं।....और तो और जिसे हमारी आस्था भारत की संस्कृति, सभ्यता व समृद्धि की महाधारा कहते नहीं थकती; हमारा राष्ट्रप्रेम जिसे राष्ट्र की अस्मिता की पहचान के रूप में गाता रहा; हमारा विज्ञान जिसे भारत के पर्यावरण का हिमालय के अलावा दूसरा मॅानीटर बताता है; भारत की सरकार ने जिसे 2008 में राष्ट्रीय नदी घोषित कर उसके संरक्षण का संकल्प लिया और मेरे जैसे कम पढ़े लिखे लोग जिसे ‘गैन्जेज’ न कहकर ‘गंगा मैया कहते है, जिसके स्नेहिल स्पर्श की कल्पना मात्र से स्वयं को धन्य महसूस करते हैं, अपने मरने से पूर्व जिसकी दो बूंद की कामना करते हैं...खुद पर शर्म आती है कि, ऐसी अमृतधारा को भी हम कोमा में जाने से नहीं रोक सके हैं। ‘‘हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है” -हमने आज यह गीत गाने का गौरव खो दिया है। हम अपनी संतानों को नदियों की जगह नाले सौंपकर जाने के घोषित दोषी हैं।

ऐसा क्यों है? क्योंकि आज भारत में नदियों के सरंक्षण... संर्वद्धन की कोई नीति नहीं है। पुरातन काल में भारत ने नदियों के साथ संस्कार और व्यवहार की जो तत्कालीन नीति बनाई थी, उसे पिछड़ा व पोंगापंथी कहकर हमने नकार दिया। माघ मेले में वार्षिक तथा अर्धकुंभ, कुंभ व महाकुंभ में क्रमशः छह, बारह और 144 वर्ष के पिछले परिदृश्य की व्यापक समीक्षा व आगे की नीति निर्माण व नियमन की जो व्यवस्था बनाई थी, उसे धर्मसमाज ने ही अपनी शक्ति व समृद्धि की झूठी दिखावट व मैल बढ़ाने वाले तमाशों में तब्दील कर नष्ट कर दिया। नतीजा? भारत की नदियां अनीति की शिकार बन रही हैं। देश की जल नीति समेत कोई भी नीति हमारी नदियों का पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित नहीं करती। नदियों की भूमि व बाढ़ क्षेत्र का भू उपयोग किसी भी हालत में नदी विरोधी गतिविधियों के लिए न हो। नदी की जमीन व प्रवाह पर पहला हक नदी तथा उस पर जीने वाले मल्लाह, मछुआरे, पंडा, पुरोहितों व जीव-जंतुओं का हो।

‘‘प्रकृति प्रदत उपहारों के मामले में तो सरकारों की भूमिका ट्रस्टी मात्र की है। यदि वे इन्हें संभालकर रखने में असमर्थ साबित होती हैं, तो उन्हें चाहिए कि वे इन्हें समाज को सौंप दे। ‘‘- केंद्रीय मंत्री कमलनाथ द्वारा हिमाचल प्रदेश में नदी की धारा को मोड़कर एक मोटल के मामले में सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी एक नजीर तो है लेकिन इस पर आधारित कोई नीति हमारी सरकार ने नहीं बनाई। इसीलिए गंगा-यमुना एक्सप्रेस वे, मेगासिटी, खेलगांव, अक्षरधाम, मेट्रो मॉल, हिंडन पर ताजा पुल के जमीन-पानी हड़पो व मैला फैलाओ वाले सरकारी अभियानों से नदियों को बचाने की लड़ाइयां हैं। आगे अपर गंगा नहर से लेकर दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरीडोर में विवाद होंगे ही। नीति हो तो हर बात के लिए लोगों को सरकारों के सामने क्यों गिड़गिड़ाना या लड़ना न पड़े।

नदियां हजारों साल में स्वरूप लेती हैं। यदि ये एक बार बुरी तरह प्रदूषित हो जायें, तो इन्हे पूरी तरह प्रदूषण मुक्त करना कई दशक लम्बी सतत् प्रकिया के बगैर संभव नहीं होता। गलतियां पहले भी हुईं थीं लेकिन अमृतमंथन कर जहर को उससे अलग करने के बाद भारत के धर्मशास्त्रों ने नदी की शुचिता के लिए अमृत और जहर को हमेशा अलग-अलग रखने का सिद्धांत प्रतिपादित किया था। आज हम गंगामृत में पहले जहर मिला रहे है, फिर उन्हे अलग करने के नाम पर करोड़ों बर्बाद कर रहे हैं। अतः नदियों व इनके किनारों को मैले नालों व मल शोधन संयत्रों से दूर रखना जरूरी है। रिवर और सीवर को अलग रखे बगैर काम चलने वाला नहीं। मल को बहाकर ले जाना एक वैज्ञानिक अपराध है। इस सिद्धांत को आधार मानकर प्रदूषण का उसके स्रोत पर ही निपटारा करने की नीति बनानी होगी।

वर्तमान सीवेज प्रणाली इस सिद्धांत के विपरीत है। परंपरागत त्रिकुण्डीय टैंक पद्धति वाली छोटी घरेलु इकाइयां व्यावहारिक व अनुकूल साबित हुई हैं। यदि नदियों को और खुद को बचाना है, तो सामाजिक जवाबदारी व हकदारी दोनों साथ सुनिश्चित करनी ही पड़ेगी। इसीलिए जरूरी है कि सभी राज्य अपने-अपने स्तर पर स्थानीय भूसांस्कृतिक विविधता का सम्मान करते हुए नदी नीतियां बनायें। फिलहाल देश की एक अदालत ने रास्ता दिखा दिया है। गंगा एक्सप्रेस वे तथा यमुना एक्सप्रेस वे के मामले में बता दिया है कि नदियों की जमीन, बाढ़ क्षेत्र बिकाऊ नहीं है। इन्हें बेचे नहीं, बल्कि बचायें।

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