दक्षिणी पंजाब में कैंसर की महामारी

Submitted by Hindi on Mon, 11/07/2011 - 09:21
Source
नवभारत टाइम्स, 19 अक्टूबर 2011

केंद्र सरकार को सबसे पहले समूचे मालवा क्षेत्र में हेल्थ इमरजेंसी घोषित करके कैंसर विशेषज्ञों तथा पर्यावरण विशेषज्ञों का एक उच्च स्तरीय दल वहां भेजना चाहिए। पूरे क्षेत्र का विस्तृत सर्वेक्षण आवश्यक है। हमें मालूम होना चाहिए कि ऐसे कौन से कैंसर कारक तत्व हैं, जिनकी वजह से ये बीमारियां फैल रही हैं। कैंसर पीड़ितों के इलाज के लिए राज्य सरकार केंद्र के सहयोग से कैंसर राहत कोष स्थापित कर सकती है।

पंजाब के दक्षिणी जिलों के किसान इस समय गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रहे हैं। हैरानी की बात है कि राज्य और केंद्र, दोनों की ही सरकारें उनकी तकलीफ सुनने को तैयार नहीं हैं। सतलुज नदी के दक्षिण में मालवा क्षेत्र कृषि की दृष्टि से संपन्न इलाका है। यहां उपजने वाला अनाज पूरे देश का पेट भरता है। कपास की अच्छी खेती की वजह से इस इलाके को 'कॉटन बेल्ट' भी कहा जाता है लेकिन यहां के लहलहाते खेतों के पीछे एक दर्द भरी दास्तान छिपी हुई है। मालवा क्षेत्र के सात जिलों- भटिंडा, फरीदकोट, मोगा, मुक्तसर, फिरोजपुर और मानसा के किसानों को पिछले काफी समय से कैंसर और अन्य रोगों से जूझना पड़ रहा है।
 

हजार पीछे एक


कैंसर के मामलों में वृद्धि की रफ्तार देखकर राज्य सरकारों को अब तक सजग हो जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। एक सर्वे के मुताबिक इस इलाके में तीन से पांच हजार की आबादी वाले प्रत्येक गांव में पिछले 8-10 सालों के दौरान कैंसर के कम से कम 30 मामले सामने आए हैं। यह संख्या राष्ट्रीय औसत से बहुत ज्यादा है। सरकार के कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम ने 2004-2005 के दौरान एक लाख पुरुषों में 68 से लेकर 114 कैंसर के मामले दर्ज किए थे। महिलाओं में यह दर 116.5 थी। मालवा क्षेत्र की डेढ़ करोड़ की आबादी में मरीजों की संख्या करीब 12 हजार हो सकती है। फरीदकोट के कैंसर अस्पताल में हर रोज कैंसर के 30-35 नए मामलों का आना स्थिति की गंभीरता की ओर इशारा करता है।

 

 

हरित क्रांति की कीमत


सर्वे से यह भी पता चलता है कि कैंसर से ग्रसित होने वालों में महिलाओं की संख्या ज्यादा है। स्थानीय डाक्टरों के मुताबिक यूटेरस और बेस्ट कैंसर के मामले ज्यादा देखने में आ रहे हैं। इस क्षेत्र में भोजन नली के कैंसर, लिंफोमा और ल्यूकीमिया के भी कई केस सामने आए हैं। कैंसर के अलावा प्रजनन संबंधी विकारों की शिकायतें भी मिल रही हैं। कैंसर के कारणों का पता लगाने के लिए सरकार की तरफ से कोई ठोस पहल नहीं की गई है और तो और, इलाके का विस्तृत सर्वेक्षण भी नहीं किया गया है। समझा जाता है कि रासायनिक प्रदूषण और पेयजल की विषाक्तता की वजह से किसानों में कैंसर के केस असामान्य रूप से बढ़ रहे हैं।

यहां किसान 15 तरह के कीटनाशकों का प्रयोग करते हैं, जिनमें कई को संभावित कैंसरकारक माना जाता है। उचित मार्ग निर्देशन और जागरूकता के अभाव में यहां के किसान कीटनाशकों और उर्वरकों का अंधाधुंध इस्तेमाल करते हैं। इन रसायनों के प्रयोग में लापरवाही से भी स्थिति बदतर हो रही है। किसान कीटनाशकों के खाली डिब्बों का इस्तेमाल पानी और खाद्यान्न जमा करने के लिए भी करते हैं।

यहां कीटनाशकों की खपत राष्ट्रीय औसत से लगभग दोगुनी और उर्वरकों की खपत लगभग तिगुनी है। पंजाब के किसान प्रति हेक्टेयर में 380 किलो उर्वरक का इस्तेमाल करते हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 132 किलो है। कीटनाशकों की खपत 570 ग्राम प्रति हेक्टेयर की राष्ट्रीय औसत की तुलना में 923 ग्राम प्रति हेक्टेयर है। उर्वरकों और कीटनाशकों के अधिक इस्तेमाल का सिलसिला सत्तर के दशक में हरित क्रांति से शुरू हुआ था। किसानों को आज हरित क्रांति की सफलता की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।

जल प्रदाय भी एक बड़ी समस्या है। पूरे क्षेत्र में स्वच्छ जल के लिए तीन-चार सौ फुट गहरे ट्यूबवेल खोदने पड़ रहे हैं, जबकि पहले 30 से 50 फुट पर ही अच्छा पानी मिल जाता था। राजस्थान विश्वविद्यालय, सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट (सीएसई) और पंजाब विश्वविद्यालय के अध्ययनों में कैंसर पीड़ित महिलाओं के रक्त में डीडीटी की अधिक मात्रा देखी गई। पंजाब प्रदूषण बोर्ड और पीजीआई चंडीगढ़ ने 2005 में अपने संयुक्त अध्ययन में कैंसर और कीटनाशकों के बीच रिश्ते को उजागर किया था।

सीएसई ने 2005 में पंजाब के चार जिलों से एकत्र किए गए रक्त के सभी नमूनों में कीटनाशकों की मौजूदगी दर्ज की। पिछले साल जर्मनी की माइक्रोटेस मिनरल लैब ने मालवा क्षेत्र के मानसिक रूप से विकलांग 149 बच्चों के बाल के 80 प्रतिशत नमूनों में यूरेनियम के अंश की पुष्टि की थी। इस क्षेत्र में यूरेनियम के स्रोत क्या हैं, यह अभी स्पष्ट नहीं है। एक अनुमान है कि राज्य के ताप बिजलीघरों से निकलने वाली फ्लाईऐश यूरेनियम प्रदूषण का स्रोत हो सकती है।

कैंसर के मामलों में लगातार वृद्धि के बावजूद राज्य में कैंसर पीड़ितों के इलाज की समुचित सरकारी व्यवस्था नहीं है। चंडीगढ़ पीजीआई और फरीदकोट मेडिकल कॉलेज में कैंसर के लिए सुविधाएं जरूर हैं, लेकिन इनका खर्च उठाना आम आदमी के लिए संभव नहीं है। नतीजा यह है कि मालवा के किसान सस्ते इलाज के लिए बीकानेर की ट्रेन पकड़ते हैं। हर रोज करीब 70 से 100 कैंसर मरीजों को लेकर जाने वाली इस ट्रेन का अब नाम ही 'कैंसर ट्रेन' पड़ चुका है।

 

 

 

 

हेल्थ इमरजेंसी


पंजाब में प्रदूषण से उत्पन्न समस्याओं को सिर्फ स्थानीय परिप्रेक्ष्य में ही नहीं देखा जाना चाहिए। केंद्र सरकार को सबसे पहले समूचे मालवा क्षेत्र में हेल्थ इमरजेंसी घोषित करके कैंसर विशेषज्ञों तथा पर्यावरण विशेषज्ञों का एक उच्च स्तरीय दल वहां भेजना चाहिए। पूरे क्षेत्र का विस्तृत सर्वेक्षण आवश्यक है। हमें मालूम होना चाहिए कि ऐसे कौन से कैंसर कारक तत्व हैं, जिनकी वजह से ये बीमारियां फैल रही हैं। कैंसर पीड़ितों के इलाज के लिए राज्य सरकार केंद्र के सहयोग से कैंसर राहत कोष स्थापित कर सकती है। ऐसे मामलों पर निगरानी के लिए एक कैंसर रजिस्ट्री बनाने का सुझाव भी दिया गया है। सभी डॉक्टरों के लिए कैंसर के मामलों की जानकारी देना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए। प्राथमिक स्तर पर रोग की पहचान के लिए अधिक से अधिक निगरानी केंद्र खोलने के अतिरिक्त राज्य के अस्पतालों में उच्च स्तरीय कैंसर चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार भी आवश्यक है। मालवा के किसानों की समस्या पूरे देश के लिए एक बड़ा सबक और समय रहते संभलने की चेतावनी भी है।

 

 

 

 

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