पर्यावरण का अनुपम प्रहरी

Submitted by Hindi on Sat, 11/12/2011 - 09:24
Source
नई दुनिया, 12 नवम्बर 2011

अनुपम मिश्र ने काम को परियोजना और बजट से कभी नहीं जोड़ा। उन्होंने काम को समाज से जोड़ा। यही कारण है कि समाज ने उनके काम को सिर माथे चढ़ाया, उसे आगे बढ़ाया। मिश्र ने कुल 17 पुस्तकें लिखी हैं लेकिन जिस एक पुस्तक ने उन्हें अनुपम बनाया, वह है 'आज भी खरे हैं तालाब' पानी के प्रबंधन के लिए इस पुस्तक में सुझाए गए तरीके के अलावा दूसरा कोई शाश्वत तरीका है ही नहीं।

नाम होना और नाम को चरितार्थ करना दो अलग बातें होती हैं। अनुपम मिश्र ने नाम को चरितार्थ किया है। पर्यावरण के लिए वह तब से काम कर रहे हैं, जब देश में पर्यावरण का कोई विभाग नहीं खुला था। गांधी शांति प्रतिष्ठान में उन्होंने पर्यावरण कक्ष की स्थापना की। पर्यावरण कक्ष क्या, एक छोटा-सा कमरा। न कोई सहयोगी, न कोई बजट लेकिन उसी छोटे से कमरे के एकांत में बगैर बजट के बैठकर मिश्र ने देश और दुनिया के पर्यावरण की जिस बारीकी से खोज-खबर ली है, वह करोड़ों रुपए बजट वाले विभागों और परियोजनाओं के लिए संभव नहीं हो पाया है। हां, देश में सरकारी विभाग खुलने के बाद तमाम पीएचडी और डीलिट वाले पर्यावरणविद जरूर पैदा हुए हैं। लेकिन पर्यावरण के लिए इन सबके होने का अर्थ अंग्रेजी शब्द के 'डीलिट' से अधिक कुछ नहीं है।

मिश्र ने काम को परियोजना और बजट से कभी नहीं जोड़ा। उन्होंने काम को समाज से जोड़ा। यही कारण है कि समाज ने उनके काम को सिर माथे चढ़ाया, उसे आगे बढ़ाया। वह स्वयं कहते हैं कि काम बड़ा होने के साथ-साथ बजट छोटा होते जाना चाहिए, अन्यथा वह काम समाज का नहीं बन पाएगा और जो काम समाज का नहीं बन पाया, वह टिकाऊ नहीं हो पाएगा।

यों तो मिश्र ने छोटी-बड़ी कुल 17 पुस्तकें लिखी हैं लेकिन जिस एक पुस्तक ने उन्हें अनुपम बनाया, वह है 'आज भी खरे हैं तालाब' पानी के प्रबंधन का जो तरीका इस पुस्तक में सुझाया गया है, उसके अलावा जल प्रबंधन का दूसरा कोई शाश्वत तरीका है ही नहीं और इस विषय पर इस दर्जे की पुस्तक हिंदी क्या, दुनिया की किसी भी दूसरी भाषा में सुलभ नहीं है। इस पुस्तक ने समाज को उसके उस हुनर और वजूद की याद ताजा कराई है, जिसे भूलने के बाद आज समाज के बेपानी होने का खतरा पैदा हो गया है। मनरेगा के तहत गांव-गांव में यदि तालाब खोदे जा रहे हैं तो उसके पीछे कहीं न कहीं यह पुस्तक भी एक कारण है।

मिश्र की एक बड़ी खासियत यह भी है कि उन्होंने अपनी किसी भी पुस्तक पर कॉपीराइट नहीं रखा। इस बारे में वे कहते हैं कि उन्होंने जो कुछ भी लिखा है, उसमें उनका कुछ भी नहीं है। सब कुछ समाज का है। उन्होंने तो बस समाज की क्लर्की भर की है। उनकी इसी विनम्रता और उदारता के लिए सात नवंबर को उन्हें देश के प्रतिष्ठित जमनालाल बजाज पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके पहले भी उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। उन्हें देश का सर्वोच्च इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार मिल चुका है लेकिन मिश्र समाज के प्यार के आगे इन सभी पुरस्कारों को तुच्छ मानते हैं।

Disqus Comment

More From Author

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

नया ताजा