जल सुरक्षा के बिना संभव नहीं खाद्य सुरक्षा

Submitted by Hindi on Wed, 12/21/2011 - 18:22

यदि हम चाहते हैं कि लोग मोटे अनाज व कम पानी वाली अन्य फसलों को प्राथमिकता पर उपजायें, तो सुनिश्चित करना होगा कि अन्य फसलों की तुलना में ऐसी फसलों को अधिक मूल्य मिले। यदि उत्पादन कर भी आलू की तरह फेंकना पड़ा या गन्ने की तरह जलाना पड़ा, तो लोग कम पानी की फसलों की तरफ कभी नहीं जायेंगे। अच्छी बात यह है कि कम पानी की अधिकांश के खाद्यान्न हर आबोहवा में सेहत के लिए ज्यादा फायदेमंद होते हैं। कुल मिलाकर शर्त यह है कि पानी और उत्पादन के बीच संतुलन बनाना होगा।

भूख से मौत कहीं भी हो...किसी भी राष्ट्र या समुदाय में; ऐसे हादसे सिर्फ वैश्विक व्यवस्था और अर्थव्यवस्था ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए काले धब्बे हैं। बीते 18 दिसंबर को केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा मंजूर खाद्य सुरक्षा विधेयक कम से कम भारत में इस काले धब्बे को मिटाने की ओर बढ़ा एक अहम् कदम है। बाजार में चाहे जो भाव हो, प्रत्येक व्यक्ति को नियंत्रित दरों पर दो जून का निवाला मुहैया होना ही चाहिए। कानून बनने पर खाद्य सुरक्षा विधेयक एक तरह से इस बात की गारंटी देने की तैयारी है। एक रुपये में मोटा अनाज, दो रुपये में गेहूं और तीन रुपये में चावल। वह भी गरीबी रेखा से नीचे, उपर और अन्तोदय में विभेद किए बगैर। मंहगाई के नये दौर में यह काफी राहत देने वाला कदम होगा। देश की बहुत बड़ी आबादी को इसका लाभ मिलेगा। खासकर गरीब कहलाने में संकोच वाले निचले मध्यम वर्गीय शहरी परिवारों को। उन्हें मजबूरन 20 रुपये किलो चावल और 16-17 रुपये आटा खरीदना पड़ता है। महंगाई के नये दौर में रोटी बजट पर भारी पड़ने लगी है।

लेकिन क्या यह खाद्य सुरक्षा कानून भारत के खेतों में पर्याप्त खाद्यान्न की उपज न होने पर भी सभी को खाने भर अनाज की गारंटी दे सकेगा? कानून बनने पर कभी सड़ा-गला या आयातित अनाज देने की मजबूरी सामने न आये, इसके लिए खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ जल सुरक्षा कानून जरुरी है। यह मांग अकारण नहीं है। तर्क यह है कि सिर्फ बिल बना देने से ही कभी भी.. किसी भी समस्या का हल तब तक नहीं होता, जब तक कि बिल को व्यवहार में उतारने के लिए अनुकूल परिस्थितियां निर्मित नहीं की जाती। जरूरत भर पानी की गारंटी दिए बगैर आप खेती और उसकी उपज की गांरटी कैसे दे सकते हैं? राष्ट्रीय परिदृश्य यह है कि नित नये इलाके जलाभाव क्षेत्रों की सूची में शामिल हो रहे हैं। जहां कभी पानी ही पानी था, वहां आज पेयजल तक का संकट देखा जा रहा है। खासकर नदी किनारे के क्षेत्र। नदी किनारे रहकर भी वे प्यासे हैं।

कहीं दोहन की अधिकता, कहीं जल संचयन की न्यूनता... तो कहीं वर्षाक्रम में परिवर्तन के कारण। जलाभाव के कारण कितने ही इलाकों के खेत बांझ हो गए हैं। खेत हैं, पर खेती नहीं। मवेशी हैं, पर चारा नहीं। जहां-जहां बांध बने, वहां जल तो है, जल सुरक्षा नहीं। पानी है, किंतु पकड़ से बाहर है। टिहरी के बांध में पानी ही पानी है। टिहरी की नई बसावट पानी की कमी की शिकायत कर रही है। बांध के तुरंत बाद कई किमी. तक पानी नहीं, बल्कि पानी की कमी की गांरटी देते उदाहरणों से देश भरा पड़ा है। विसंगति यह है कि जलीय असंतुलन के नये समीकरणों के बावजूद पानी की कमी के इलाकों में भी लोग अधिक पानी की खेती करने से चूक नहीं रहे। बुंदेलखण्ड कभी बांदा कभी धान का कटोरा था। हरियाणा में यमुना से सटे करनाल, पानीपत, सोनीपत आदि को भी कभी यही संज्ञा दी जाती थी। कभी पंजाब की गलियों की नमी भी मिटाये नहीं मिटती थी। गन्ना, अंगूर, केला जैसी अधिक पानी पीने वाली खेती लंबे अरसे से महाराष्ट्र में की जाती है। लेकिन क्या इन्हें अब अधिक पानी पीने वाली फसलों की अंधाधुंध खेती की इजाजत दी जा सकती है? नहीं।

बुंदेलखण्ड समेत ऐसे इलाके जहां पानी की कमी ने कई जिंदगानियां लील ली, वहां भी लोगों को सोयाबीन, राजमा, पीपरमेंट तथा धान की खेती करते देख ताज्जुब हुआ। इसकी बदौलत जलाभाव क्षेत्रों की बात तो छोड़िए, खूब पानी वाले इलाकों में भी पानी की गिरावट का दौर जारी है। बावजूद इसके ऐसे जाने कितने इलाकों में न तो पानी की अनुशासित खेती है और न ही जलसंचयन की कोशिशें। बाजारु खेती का लालच खेतों में रासायनिक उर्वरक के उपयोग के साथ-साथ ज्यादा सिंचाई करने की मजबूरी बढ़ाता जा रहा है। रासायनिक उर्वरक मिट्टी के बंधे ढेलों को खोलकर नमी रोकने की क्षमता धीरे-धीरे कम कर देते हैं। खाद्य सुरक्षा अधिनियम कम रकबे वाले किसानों को बाजारु खेती की राह पर और ले जायेगा। अभी जिन खेतिहर मजदूरों की खाद्यान्न की जरूरत दूसरों के खेतों में कटाई-बिनाई में प्राप्त खाद्यान्न से हो जाती है, उन्होंने अभी ही खाद्यान्न की बजाय सागभाजी की नकदी खेती को प्राथमिकता देना शुरु कर दिया है।

गांवों में नकदी की बढ़ती जरूरतों ने ग्रामीणों को बाजारु जरूरतों की ओर जाने को मजबूर कर दिया है। जिस भी वर्ग की खाद्यान्न की जरूरत सरकारी राशन से पूरी होने लगेगी, खाद्यान्न उत्पादन उसकी प्राथमिकता से हट जायेंगे। इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। दाल की तरह भविष्य में खाद्यान्न उत्पादन के लिए भी कोई कार्यक्रम न चलाना पड़े, इसके लिए खाद्यान्न को किसान की प्राथमिकता बनाये रखना हैं। यदि हम चाहते हैं कि लोग मोटे अनाज व कम पानी वाली अन्य फसलों को प्राथमिकता पर उपजायें, तो सुनिश्चित करना होगा कि अन्य फसलों की तुलना में ऐसी फसलों को अधिक मूल्य मिले। यदि उत्पादन कर भी आलू की तरह फेंकना पड़ा या गन्ने की तरह जलाना पड़ा, तो लोग कम पानी की फसलों की तरफ कभी नहीं जायेंगे। अच्छी बात यह है कि कम पानी की अधिकांश के खाद्यान्न हर आबोहवा में सेहत के लिए ज्यादा फायदेमंद होते हैं। कुल मिलाकर शर्त यह है कि पानी और उत्पादन के बीच संतुलन बनाना होगा। पानी के लेन-देन यानी निकासी और संचयन के बीच संतुलन बनाये बगैर खाद्य सुरक्षा देना संभव नहीं। जलसुरक्षा के लिए जल निकासी हेतु भूजल स्तर की सीमा, संचयन एक आवश्यक प्रक्रिया बने-ऐसे प्रावधानों के अलावा कई महत्वपूर्ण निर्णय से जलसुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी।

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