फसलों के लिए जल की आवश्यकता एवं प्रबंधन

Submitted by Hindi on Thu, 12/22/2011 - 13:04
Source
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, चतुर्थ राष्ट्रीय जल संगोष्ठी, 16-17 दिसम्बर 2011

भागीरथ द्वारा गंगा को पृथ्वी पर लाये जाने की पौराणिक कथा है, जो सिंचाई के लिए जल प्रभाव द्वारा सिंचाई की व्यवस्था की सफलता का इतिहास है। इससे यह स्पष्ट है कि भारत में प्राचीनकाल से ही सिंचाई पर जोर दिया जाता रहा है। वर्षा से प्राप्त जल-संसाधनों के पूरक के रूप में जल-संग्रह की स्थानीय सुविधाओं नहरों, सामुदायिक तालाबों और अन्य साधनों को न केवल प्राचीन काल के बडे़-बडे़ राजाओं द्वारा, बल्कि मध्ययुगीन लोगों द्वारा भी महत्व दिया जाता था। भारत में आजादी के बाद बड़ी-बड़ी सिंचाई योजनाएं शुरू कर दी गयी। सर्वप्रथम उड़ीसा का हीराकुंड बाँध शुरू किया गया उसके बाद पंजाब का भाखड़ा बाँध जैसी अन्य योजनाएं सिंचाई हेतु भारत के विकास में अग्रणीय रही तथा सिंचाई के क्षेत्र में बहुत बड़ा योगदान रहा।

इन योजनाओं ने लोगों में उत्साह और उमंग की ऐसी लहर दौड़ा दी कि इन्हें लोग भारत के मन्दिर कहने लगे। विकास की बहुत स्कीम स्वतंत्र भारत की महत्वपूर्ण अंग बनती गयी। वृहद और मध्य सिंचाई योजनाओं, नदियों पर बने बाँधों एवं लघु सिंचाई द्वारा सिंचाई सुविधाओं में बढ़ती प्रगति से ही भारत आज विश्व में अग्रणी राष्ट्र के रूप में माना जाता है। भारत की समृद्धि का आधार खुशहाल कृषक है जिसके लिए सिंचाई उसके खेतों की प्रजनन क्षमता का मुख्य स्रोत है। मां गंगा, एक उत्तर भारत के राजा भागीरथ का दिया ऐसा अनमोल अनुपम उपहार है जिसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। गंगा जल न केवल हमें पवित्र करता है वरन् एक बड़े भूभाग को विकसित भी करता है।

मां गंगा में से तीर्थ नगरी हरिद्वार से होते हुए ऊपरी गंगा नहर का निर्माण हुआ। ऊपरी गंगा नहर की क्षमता 10500 क्यूसेक है। उत्तरी क्षेत्र की प्रमुख सिंचाई उसी ऊपरी गंगा नहर के द्वारा होती है। वर्तमान में उस नहर द्वारा खरीफ व रबी में सिंचाई की जाती है। जिसके कारण पश्चिमी उत्तर प्रदेश का सहारनपुर, हरिद्वार, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद, बुलन्दशहर, अलीगढ़, आगरा, मथुरा एवं ऐटा का क्षेत्र सिंचित होता है। वर्षा काल में गंगा नदी में अतिरिक्त जल उपलब्ध रहता है। जिसका उपयोग धान की सिंचाई हेतु किया जाता है।

फसलों के लिये जल की आवश्यकता एवं प्रबन्धन (Water requirement and management for agricultural crops)


सारांश:


भागीरथ द्वारा गंगा को पृथ्वी पर लाए जाने की पौराणिक कथा प्रचलित है, जो सिंचाई के लिये जल प्रभाव द्वारा सिंचाई की व्यवस्था की सफलता का इतिहास है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत में प्राचीन काल से ही सिंचाई पर जोर दिया जाता रहा है। वर्षा से प्राप्त जल-संसाधनों के पूरक के रूप में जल-संग्रह की स्थानीय सुविधाओं जैसे नहरों, सामुदायिक तालाबों और अन्य साधनों को न केवल प्राचीन काल के बड़े-बड़े राजाओं द्वारा, बल्कि मध्ययुगीन लोगों द्वारा भी महत्व दिया जाता था। भारत में आजादी के बाद बड़ी-बड़ी सिंचाई परियेाजनाएं शुरू की गई थीं। सर्वप्रथम ओडिशा का हीराकुंड बाँध शुरू किया गया उसके बाद पंजाब का भाखड़ा बाँध। ये अन्य परियोजनाएं सिंचाई हेतु भारत के विकास में अग्रणीय रहीं तथा सिंचाई के क्षेत्र में इनका बहुत बड़ा योगदान रहा। इन योजनाओं ने लोगों में उत्साह और उमंग की ऐसी लहर दौड़ा दी कि इन्हें लोग भारत के मंदिर कहने लगे। विकास की बहुत सी-स्कीम स्वतंत्र भारत की महत्त्वपूर्ण अंग बनती गई। वृहद और मध्य सिंचाई योजनाओं, नदियों पर बने बाँधों एवं लघु सिंचाई द्वारा सिंचाई सुविधाओं में बढती प्रगति से ही भारत आज विश्व में अग्रणी राष्ट्र के रूप में माना जाता है। भारत की समृद्धि का आधार खुशहाल कृषक है जिसके लिये सिंचाई उसके खेतों की प्रजनन क्षमता का मुख्य स्रोत है। गंगा नदी राजा भागीरथ का दिया एक ऐसा अनमोल अनुपम उपहार है जिसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। गंगा जल न केवल हमें पवित्र करता है वरन एक बड़े भू-भाग को विकसित भी करता है। गंगा नदी में से तीर्थ नगरी हरिद्वार से होते हुए ऊपरी गंगा नहर का निर्माण हुआ। ऊपरी गंगा नहर की क्षमता 10500 क्यूसेक है। उत्तरी क्षेत्र की प्रमुख सिंचाई इसी ऊपरी गंगा नहर के द्वारा होती है। वर्तमान में इस नहर द्वारा खरीफ व रबी ऋतुओं की फसलों की सिंचाई की जाती है। जिसके कारण पश्चिम उत्तर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर, हरिद्वार, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद, बुलन्दशहर, अलीगढ, आगरा, मथुरा एवं एटा क्षेत्र सिंचित होते हैं। वर्षा काल में गंगा नदी में अतिरिक्त जल उपलब्ध रहता है, जिसका उपयोग धान की सिंचाई हेतु किया जाता है।

Abstract


There is a very old story about bringing Ganga on the earth by King Bhagiratha. Besides quenching the thirst of millions of people of India, the holy and sacred water of Ganga is also used for the purpose of irrigation in most of the parts of India. In the past, the kings were also adopting the water conservation schemes to store rainwater for future requirements. Hirakud dam in Odisha and Bhakra dam in Punjab are the evident examples of that time. The construction of these dams was reasonably useful for the irrigation purpose and the people call them as a temples of India. It was a continuous processes to construct the large and medium dams at different rivers in different parts of India. As India is a country of farmers, there is an urgent need of water for irrigation. On the other hand India has good rain water in monsoon period. During this study, the main emphasis of irrigation depends upon the kind of crops and need of water for such crops. Also the management of rainwater will meet the requirement of different crops in India. The capacity of upper Ganga is 10500 cusec which meets most of the irrigation requirements on North Uttar Pradesh and Uttarakhand.

खरीफ व रबी की फसल का सत्र


प्रायः फसलों के तीन सत्र होते हैं: (अ) रबी (अक्तूबर-नवम्बर से मार्च-अप्रैल तक;, (ब) खरीफ (जून-जुलाई से सितम्बर-अक्तूबर तक), एवं (स) जायद (रबी व खरीफ के मध्य में) पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अत्यधिक ऊपजाऊ जमीन तथा सिंचाई के अत्यधिक संसाधन होने के कारण गेहूँ व धान की करीब 69.3 मिलियन हेक्टेयर में खेती की जाती है। भारत में मौसम का मिजाज बदलता रहता है। महाराष्ट्र में एक वर्ष में लगभग पाँच बार फसल पैदा की जा सकती है।

विभिन्न फसलों के लिये पानी का प्रतिशत उपयोग


भारत में कृषि क्षेत्र कुल राष्ट्रीय उत्पाद में 50 प्रतिशत योगदान करता है। आवश्यकता है कि हम कृषि हेतु जल की उपलब्धता सुनिश्चित करें। वर्तमान में खेतों तक जल पहुँचाने के मात्र. दो ही साधन प्रयोग में लाये जाते हैं : (1) मुख्य नहर से रजवाहे, रजवाहे से माइनर, माइनर से कुलवि (छोटी नहर) बनाकर सिंचित जल को खेतों तक पहुँचाया जाता है (2) दूसरा भूगर्म जल जिसे नलकूप आदि की सहायता से निकालकर उपयोग में लाया जाता है।

Sarniउपरोक्त दोनों ही साधनों द्वारा स्रोत से खेतों तक जल पहुँचाने में करीब 40 प्रतिशत जल नष्ट हो जाता है। शेष जल जो सिंचाई द्वारा प्रयोग में लाया जाता है उसमें से भी फसल को आधा ही जल मिल पाता है। बाकी आधा जल या तो अन्य अनुपयोगी वनस्पतियों द्वारा प्रयोग में लाया जाता है या भूगर्भ में जाकर लुप्त हो जाता है। इस संबंध में प्राप्त जानकारी के अनुसार भिन्न-भिन्न किस्मों की मिट्टी द्वारा जल ग्रहण करने एवं उसे पौधों को उपलब्ध करा पाने की क्षमता पर विकास करना होगा।

सिंचाई की विधियाँ


उत्तर प्रदेश में मुख्य रूप से सतही विधियाँ ही प्रचलित हैं हालाँकि इनसे जल की बहुत अधिक हानि होती है लेकिन यदि हम थोड़ी सावधानी बरतें तो इन हानियों को काफी हद तक कम कर सकते हैं उन सावधानियों में सर्वप्रथम तो खेत का समतलीकरण है। यदि हमारा खेत उबड़-खाबड़ है तो सिंचाई का जल पौधे/फसल के जल क्षेत्र में एक साथ न पहुँच कर कहीं जड़ क्षेत्र के नीचे तथा कहीं क्षेत्र की कम गहराई तक ही पहुँचेगा।

Sarni-2अतः ऐसी विधि को अपनाये जाने से जल हानि कम होगी जिससे जड़ क्षेत्र में पानी एक समान लगे। इसके लिये सर्वप्रथम भूमि को समतल करके हल्का ढाल देते हुए मिट्टी की किस्म के अनुसार क्यारी बनाकर सिंचाई करनी चाहिए। ऐसी सतही विधियाँ अपनाकर जल हानि काफी मात्रा में रोकी जा सकती है तथा 60 प्रतिशत तक जल का उपयोग पौधों के लिये किया जा सकता है।

अतः ऐसी विधियाँ भी हैं जिनके द्वारा 75-95 प्रतिशत जल का उपयोग पौधों के लिये किया जा सकता है। ऐसी विधियों में स्प्रिंकलर तथा ड्रिप सिंचाई विधियाँ हैं। इन विधियों का प्रयोग करके जहाँ जल की बचत की जा सकती है वहीं खाद आदि की खपत में भी कमी आती है जिससे पैसा भी बचाया जा सकता है। इस प्रकार से हम देखते हैं कि यथा आवश्यकता तथा दक्ष सिंचाई के साधन अपनाकर हम सिंचाई जल की बड़ी बचत कर सकते हैं जो दूसरे खेतों की सिंचाई अथवा मनुष्य की अन्य आवश्यकताओं के काम में लाया जा सकता है।

जल प्रबन्धन


फसलों को आवश्यकतानुसार सिंचाई उपलब्ध कराकर उनमें अधिकतम उत्पादन प्राप्त करना ही जल प्रबंधन का मुख्य उद्देश्य है। अतः यह धारण कि सिंचाई जल जितना अधिक मात्रा में फसलों को दिया जायेगा, उतनी ही अधिक पैदावार होगी एक भ्रम है। विभिन्न प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि प्रत्येक फसल के लिये जल की आवश्यकता अलग-अलग होती है और इस आवश्यकता को जानने से फसल उत्पादन में बढ़ोत्तरी संभव है। उससे अधिक मात्रा न केवल सिंचाई का खर्च बढ़ायेगी बल्कि खेतों के ऊसर बनने की प्रक्रिया भी प्रारम्भ करेगी।

यहाँ यह जानना भी आवश्यक है कि फसल की पैदावार तथा जल मात्रा का सीधा संबंध नहीं है बल्कि यह संबंध एक चक्र के रूप में है जिसका अर्थ है कि जल की शुरुआती मात्रा से तो पैदावार अधिक बढ़ती है, परंतु जैसे-जैसे हम मात्रा को बढ़ाते है पैदावार उतनी नहीं बढ़ती। एक स्थिति तो ऐसी आती है जहाँ पैदावार बढ़ने के बजाय घटना शुरू हो जाती है। इससे संबंधित एक तथ्य और भी जान लेना आवश्यक है कि सिंचाई करने से उपज बढ़ती तो जरूर है परंतु सिंचाई पर भी कुछ न कुछ धन व्यय होता है अतः इस बात को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि कहीं सिंचाई पर आने वाला व्यय प्राप्त होने वाली बढ़ी उपज से अधिक तो नहीं है। यदि ऐसा है तो ऐसी सिंचाई का न करना ही बेहतर है।

आप अपनी फसल का सिंचाई नियोजन उपलब्ध जल के अनुसार कर सकते हैं। यदि आपके पास जल की कमी है तो केवल संवेदनशील स्थितियों में ही पानी दें इससे आपको 80 प्रतिशत तक उपज मिल सकती है। यदि आपके पास पानी है परंतु उसकी कीमत 20 प्रतिशत फसल से अधिक है तो भी आप शेष पानी न दें। संवेदनशील स्थिति प्रत्येक फसल के लिये ‘ताज मूल’ स्थिति ही होती है। यदि उस समय सिंचाई न की गई अथवा वर्षा न हुई तो फसल समाप्त हो सकती है शेष स्थितियों में फसल पर असर तो पड़ेगा परंतु उतना नही। गेहूँ के मामले में अति संवेदनशील स्थितियाँ दो होती हैं: 1. ताज मूल अवस्था तथा 2. गांठ बनने की अवस्था।

इन दोनों स्थितियों में पानी दिया जाना अत्यंत आवश्यक होता है। यदि इन स्थितियों में पानी नहीं दिया जाता है कि तो फसल समाप्त हो सकती है।

आवश्यकता


जिस प्रकार मनुष्य को अपनी शारीरिक आवश्यकताओं हेतु जल की आवश्यकता पड़ती है वैसे ही पौधों को भी अपनी जरूरतें पूरी करने के लिये जल की आवश्यकता पड़ती है। मनुष्यों की भाँति पौधों के लिये भी जल एक आवश्यक संसाधन है अर्थात जल के बिना न मनुष्य रह सकते हैं और न ही पौधे। वातावरण को नम बनाये रखने के लिये भी पौधे जल प्रदान करने का सशक्त माध्यम हैं अर्थात पौधे जमीन से जल लेकर तने और पत्तियों के माध्यम से वातावरण को जल देते हैं। दूसरे शब्दों में वातावरण द्वारा जल की मांग पौधों में जल संचार के कारण बनती है। पौधों के लिये आवश्यक कई प्रकार के खनिज तत्व, रासायनिक यौगिक मिट्टी में मौजूद रहते हैं। लेकिन पौधे उन्हें ग्रहण नहीं कर सकते। जल उन तत्वों को घोलकर पौधों की पत्तियों तक पहुँचता है। पत्तियाँ सूर्य के प्रकाश में संश्लेषण द्वारा आवश्यक तत्व पौधों को देती हैं तथा जल को बाहर निकाल देती है जिसे वाष्पोत्सर्जन प्रक्रिया कहते हैं। इस प्रक्रिया में पौधे की संरचना को बढ़ाने में कुल जल का 1 प्रतिशत भाग ही व्यय होता है शेष 66 प्रतिशत वाष्पोत्सर्जन द्वारा वातावरण ग्रहण कर लेता है। अर्थात पौधों को दो कार्यों के लिये जल की आवश्यकता है 1. पौधों की संरचना के लिये कितना जल चाहिए; 2. वाष्पोत्सर्जन में कितना जल लगेगा।

पौधे की संरचना में कितना जल लगेगा यह पौधे के गुणसूत्र पर निर्भर करता है। अर्थात यह पौधे की फसल पर निर्भर है कि पौधे अपनी संरचना हेतु कितना जल लेते हैं। वाष्पोत्सर्जन में लगने वाला जल वातावरण की स्थिति पर निर्भर करता है। अगर वातावरण में अधिक जल ग्रहण करने वाली परिस्थितियाँ हैं तो जल अधिक लगेगा और अगर परिस्थितियाँ कम जल ग्रहण करने वाली हैं तो कम जल की आवश्यकता होगी।

साधारणतया निम्न कारक वाष्पोत्सर्जन मांग को प्रभावित करते हैं


सूर्य के प्रकाश की तीव्रता;, सूर्य के प्रकाश की अवधि;, हवा की गति;, वायुमण्डल में जल की उपस्थिति (सापेक्ष आर्द्रता), विषुवत रेखा से स्थान की दूरी तथा समुद्र तल से ऊँचाई।

जल आवश्यकता को प्रभावित करने वाले फसल के गुणसूत्र तथा जलवायु दो ऐसे मुख्य कारक हैं जिनसे जल आवश्यकता प्रभावित होती है। फसल या पौधे के गुणसूत्र एक जाति से दूसरी जाति एवं प्रजाति में अलग-अलग हो सकते हैं पौधों की विभिन्न स्थितियाँ उसकी जल मांग को प्रभावित करती रहती हैं। इसके साथ ही तीसरा कारक मिट्टी है अर्थात मिट्टी की संरचना उसकी पानी रोकने की क्षमता अर्थात जल की आवश्यकता पर प्रभावी असर डालती है। यदि मिट्टी की संरचना इस प्रकार है कि उसमें जल का प्रवेश आसानी से हो तथा उसके कण उस जल को अवशोषित कर पौधे को सुगमता से उपलब्ध करा दें, वह पौधे के लिये सर्वश्रेष्ठ है।

एक ही फसल की परिपक्वता अवधि से उसकी जल की मांग घटती बढ़ती है तथा कुछ स्थितियाँ ऐसी होती हैं जो संवेदनशील कहलाती हैं अर्थात इन स्थितियों में यदि पौधे/फसल को पानी न मिले तो उपज में कमी हो जायेगी। फसल की जल आवश्यकता गणना के कई ढंग हैं।

equation वैसे तो आज के युग में यह कार्य कम्प्यूटर की मदद से मिनटों में किया जा सकता है। उसके लिये बने बनाये सॉफ्टवेयर आते हैं जिसमें आवश्यक आंकड़े भरने के बाद फसल के लिये जल की आवश्यकता विभिन्न फसलों के लिये पानी की आवश्यकता निम्नवत है।

 

विभिन्न फसलों के लिये जल आवश्यकता

फसल

पानी की आवश्यकता (मिमी.)

फसल

पानी की आवश्यकता (मिमी.)

चावल

800-2500

मिर्च

500

गेहूँ

450-650

सूरजमुखी

350-500

सरगम

450-650

कास्टर

500

मक्का

500-800

बीन

350-500

गन्ना

1500-2500

पत्ताभोगी

380-500

मूंगफली

500-700

मटर

350-500

रूई

700-1300

केला

1200-2200

सोयाबीन

450-700

संतरा

900-1200

तम्बाकू

400-600

पाईनऐपल

700-1000

टमाटर

600-800

संतरा

350-400

आलू

500-700

रागी

400-450

प्याज

350-350

अंगूर

500-1200

 

सम्पर्क


योगेश कुमार सिंघल, Yogesh Kumar Singhal
सिंचाई विभाग, उत्तर प्रदेश, Irrigation Department, Uttar Pradesh


भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान पत्रिका, 01 जून, 2012

इस रिसर्च पेपर को पूरा पढ़ने के लिए अटैचमेंट देखें



Disqus Comment

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

नया ताजा