लघु हिमालय के सैंज जलागम में सतही जल संसाधनों की उपलब्धता पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

Submitted by Hindi on Mon, 12/26/2011 - 11:53
Source
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, चतुर्थ राष्ट्रीय जल संगोष्ठी, 16-17 दिसम्बर 2011
भारत के हिमाचल प्रदेश राज्य में सैंज जल सम्भरण की रूपरेखाभारत के हिमाचल प्रदेश राज्य में सैंज जल सम्भरण की रूपरेखाजल एक अति महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है, जिसके बिना हमारा अस्तित्व असम्भव है। आई.पी.सी.सी. की नवीनतम रिपोर्ट के आधार पर 20वीं शताब्दी में पृथ्वी का औसत वार्षिक तापमान लगभग 0.74 ± 0.180C बढ़ा व 21वीं शताब्दी के अंत तक यह तापमान विश्व के विभिन्न भागों में 1.40 से लेकर 5.80 तक बढ़ सकता है। पृथ्वी के इस बढ़ते हुए तापमान का हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियरों व उनसे संबंधित जल संसाधनों पर भारी प्रभाव पड़ने की संभावना है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए सैंज जलागम, जोकि हिमाचल प्रदेश राज्य के लघु हिमालय परिक्षेत्र के कुल्लू जिले में स्थित है, को एक ईकाई प्रतिनिधि के रूप में चयनित किया गया है। प्रस्तुत शोध में सैंज जलागम के सतही जल संसाधनों का जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में अवलोकन किया गया है।

सैंज जलागम लगभग 741 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ है व इसकी संमुद्र तल से न्यूनतम ऊंचाई लगभग 900 मीटर व अधिकतम ऊंचाई 6100 मीटर है। स्रोत से लेकर निकास तक इस जल संभरण की लंबाई लगभग 55 कि.मी. है। जलागम के जलग्रहण क्षेत्र में ऊँचाई के साथ-साथ वर्षा की मात्रा, हिम आवरण व ग्लेशियरों से छादित क्षेत्र में परिवर्तन देखने को मिलता है। इस शोध में प्रयोग किए गए जलवायु व नदी के निस्सारण से संबंधित 24 वर्ष (1981-2004) के आंकड़े भाखड़ा ब्यास प्रबंध बोर्ड, पंडोह से एकत्रित किए गए हैं। सैंज जलागम के आंकड़ों का विश्लेषण दर्शाता है कि 1981-2004 के मध्य इस जलागम में वर्षा के प्रारूप में कोई विशेष उतार-चढ़ाव का क्रम नहीं पाया गया परन्तु नदी के जल के निस्सारण में काफी कमी पाई गई।

विश्लेषण से यह भी पता चला कि नदी के जल का निस्सारण न केवल घटा बल्कि दिसम्बर, जनवरी व अप्रैल के महीनों में इसमें महत्वपूर्ण कमी भी दर्ज की गई। इन महीनों में नदी के जल निस्सारण की यह कमी मुख्यतः जलागम के उच्च क्षेत्रों में अधिक मात्रा में हुए हिमपात को दी जा सकती है। सैंज जलागम के निस्सारण में यह कमी इस क्षेत्र में स्थापित विद्युत परियोजनाओं के लिए एक चुनौती साबित हो सकती है। अतः आने वाले समय में नीति निर्धारकों को विद्युत व सिंचाई परियोजनाओं को स्थापित करने से पहले काफी सोच विचार करना होगा। यह शोध पत्र विशेषतः कृषि विशेषज्ञों, जल संसाधन नीति निर्माताओं व खासतौर पर बांध अभियन्ताओं को भविष्य में जल संसाधानों से संबंधित निर्णयों में सहायता प्रदान करने में मददगार साबित होगा तथा आने वाले समय में इस क्षेत्र में जल संसाधनों के विकास की प्रभावी नीति बनाने में भी मदद करेगा। इस अध्ययन से सिंचाई व जलविद्युत परियोजनाओं के सतत् विकास की प्रक्रिया को भी बल मिल सकेगा।

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