बुंदेलखंडः फटती धरती, कांपते लोग

Submitted by Hindi on Wed, 01/04/2012 - 16:22
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चौथी दुनिया, 02 नवम्बर 2011

नदियों और पहाड़ों में रात-दिन अंधाधुंध खनन हो रहा है, बड़ी-बड़ी मशीनों से धरती छलनी की जा रही है। नदियों से निरंतर रेत और मौरंग निकाली जा रही है, पहाड़ों पर विस्फोट किए जा रहे हैं, जिससे भूगर्भ जल निकल रहा है। वैज्ञानिकों का कहना था कि बुंदेलखंड में कई वर्षों से पर्याप्त वर्षा नहीं हुई है, जिससे भूजल की कमी हो गई है, जबकि जल का दोहन बराबर किया जा रहा है और उससे जमीन के अंदर गैप बन गया है। इसीलिए तनाव पैदा हुआ और धरती फट गई। वैज्ञानिकों ने यह भी कहा था कि हो सकता है, जिस जगह धरती फटी, उसके नीचे बह रही दो विशाल धाराओं में संभवत: प्रभावित क्षेत्रों का भूजल चला गया हो और उसकी वजह से गैप बन गया, जिसके कारण धरती फट गई।

बुंदेलखंड में बेतरतीब ढंग से खनन और भूजल दोहन के चलते खतरे की घंटी बज चुकी है। हमीरपुर में सबसे अधिक 41 हजार 779 हेक्टेयर मीटर प्रतिवर्ष भूजल दोहन हो रहा है। महोबा, ललितपुर एवं चित्रकूट में खनन माफिया नियम-कायदों को तिलांजलि देकर पहाड़ के पहाड़ समतल भूमि में बदल रहे हैं। ललितपुर में डायस्फोर, पैराप्लाइट, राक फास्फेट, ग्रेनाइट एवं इमारती पत्थरों के भंडार हैं। उच्चतम न्यायालय द्वारा रोक के बावजूद वन क्षेत्र वाले जनपदों में इमारती पत्थरों का खनन जारी है। यमुना, बेतवा और केन में बालू माफियाओं ने नदी के पेटे को चीर डाला है। खनन माफिया और नेता काले कारोबार से खूब फल-फूल रहे हैं, जनता ने मजबूरन आत्महत्या को मुक्ति का पर्याय समझ लिया है। वर्ष 2010-11 में भारत सरकार के भूगर्भ निदेशालय द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, उत्तर प्रदेश के 72 में से 40 जिले अति दोहित की श्रेणी में हैं। यहां पानी का भंडार घट रहा है। आंकड़ों के अनुसार, यहां प्रतिवर्ष एक लाख 92 हजार हेक्टेयर मीटर पानी का दोहन किया जा रहा है, जबकि भूगर्भ जल विकास दर दोहन की अपेक्षा अत्यंत कम है। बांदा, चित्रकूट, महोबा एवं हमीरपुर में भूगर्भ जल उपलब्धता 20 लाख 24 हजार 627 हेक्टेयर बताई गई है, जिसमें सबसे कम भूगर्भ जल हमीरपुर (महोबा सहित) में उपलब्ध है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हमीरपुर के अलावा ललितपुर, झांसी और जालौन में जल संकट बरसात की कमी के कारण हुआ है। बुंदेलखंड पर गहरी नजर रखने वाले शिव प्रसाद भारती बताते हैं कि बुंदेलखंड उत्तर प्रदेश के 7 और मध्य प्रदेश के 21 जिलों में फैला एक विस्तृत क्षेत्र है। हमीरपुर यमुना और बेतवा के मध्य बसा है। बुंदेलखंड अपनी वन संपदा, खनिज संपदा और शूरवीरता के कारण पूरी दुनिया में जाना जाता है। पानी की कमी, गरीबी और भुखमरी यहां की मुख्य समस्याएं हैं। पिछले चार-पांच सालों से यहां धरती फटने की नई समस्या पैदा हो गई है, जिसने किसानों को संकट में डाल दिया है। बीते 14 जून को हमीरपुर के मदारपुर गांव में एक अजीब घटना हुई। रात में 700 मीटर लंबाई में धरती फट गई, जिसकी चौड़ाई ढाई मीटर और गहराई 8-10 फीट थी। इसके बाद भरुआ सुमेरपुर में जमीन फटने एवं तीन मकानों में दरार पड़ने और फिर एक जुलाई को भिलावा मेरापुर में धरती फटने की घटना हुई। इसके पहले 2007 एवं 2008 में भी धरती फटने की घटनाएं हो चुकी हैं। धरती फटने से कहीं धुआं निकला, कहीं पानी निकल पड़ा और कहीं जोरदार आवाज निकली, जिससे ग्रामीण भयभीत हुए।

इन घटनाओं की जानकारी प्रशासन तक पहुंचाई गई तो घटनास्थलों पर लोगों के आने-जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। अगस्त 2007 में जब पहली बार जिगनी (हमीरपुर) में धरती फटने की घटना हुई तो वहां 350 फीट लंबी और एक फीट चौड़ी दरार पड़ गई थी। ज्यादातर लोगों ने उसका वैज्ञानिक कारण जानने का प्रयास नहीं किया, बल्कि देवताओं के नाराज होने और बुंदेलखंड को श्राप देने जैसी बातें चर्चा में थीं। जब धरती फटने की लगातार हो रही घटनाओं के संबंध में जिला प्रशासन ने शासन को लिखा तो फरवरी 2008 में वैज्ञानिकों की एक टीम आई, जिसने घटनास्थलों का दौरा करके अपनी रिपोर्ट तैयार की। वैज्ञानिकों का कहना था कि बुंदेलखंड में कई वर्षों से पर्याप्त वर्षा नहीं हुई है, जिससे भूजल की कमी हो गई है, जबकि जल का दोहन बराबर किया जा रहा है और उससे जमीन के अंदर गैप बन गया है। इसीलिए तनाव पैदा हुआ और धरती फट गई। वैज्ञानिकों ने यह भी कहा था कि हो सकता है, जिस जगह धरती फटी, उसके नीचे बह रही दो विशाल धाराओं में संभवत: प्रभावित क्षेत्रों का भूजल चला गया हो और उसकी वजह से गैप बन गया, जिसके कारण धरती फट गई। वैज्ञानिकों का आशय यह था कि बुंदेलखंड में पानी की कमी ही इसका मुख्य कारण है।

केंद्रीय जल आयोग और जल संसाधन मंत्रालय के ताजा आंकड़े बताते हैं कि बुंदेलखंड में 4 लाख 42 हजार 299 हेक्टेयर मीटर भूमिगत पानी बचा है। एक लाख 92 हजार 549 हेक्टेयर मीटर हर वर्ष जल दोहन हो रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वार्षिक दोहन के मामले में बुंदेलखंड में हमीरपुर सबसे आगे है (1995 से पहले महोबा हमीरपुर में शामिल था)। हमीरपुर का वार्षिक भूजल दोहन 41 हजार 779 हेक्टेयर मीटर बताया गया। संभवत: इसी कारण यहां धरती फटने की घटनाएं अधिक हो रही हैं। सबसे कम भूजल दोहन 10 हजार 642 हेक्टेयर मीटर चित्रकूट में हो रहा है। केंद्रीय जल आयोग और जल संसाधन मंत्रालय का कहना है कि आने वाले समय में खेतों और लोगों के जीवनयापन के लिए पानी का संकट बढ़ सकता है। भूगर्भ विज्ञानी सईद उल हक कहते हैं कि पानी की समस्या हमारी खुद की पैदा की हुई है। यहां बारिश के पानी के संचयन और जल प्रबंधन को लेकर गंभीरता से काम नहीं किया गया।

बुंदेलखंड में दिल्ली के बराबर बारिश होती है, किंतु यहां की मिट्टी में ग्रेनाइट होने के कारण जल संचयन में कठिनाई है। फिर भी यदि ईमानदारी से जल प्रबंधन होता तो यह समस्या नहीं पैदा होती। पानी की कमी के कारण चित्रकूट मंडल की सबसे कम कृषि उत्पादन वाली सर्वाधिक 18 न्याय पंचायतें हमीरपुर की हैं। जन प्रतिनिधियों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि नदियों और पहाड़ों में रात-दिन अंधाधुंध खनन हो रहा है, बड़ी-बड़ी मशीनों से धरती छलनी की जा रही है। नदियों से निरंतर रेत और मौरंग निकाली जा रही है, पहाड़ों पर विस्फोट किए जा रहे हैं, जिससे भूगर्भ जल निकल रहा है, इसलिए तत्काल खनिज दोहन पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। जल की उपलब्धता और भूगर्भ जलस्तर बढ़ाने के लिए बुंदेलखंड राहत पैकेज में तालाब, चेकडैम और नहरों के निर्माण की योजनाएं बनाई गईं, लेकिन उनके कार्यान्वयन में कोताही का आलम यह है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी समस्या जस की तस है।

फरवरी 2008 में वैज्ञानिकों द्वारा रिपोर्ट पेश किए जाने पर शासन ने काफी गंभीरता दिखाई थी। तत्कालीन मुख्य सचिव अतुल कुमार गुप्ता ने कहा था कि जिन स्थानों पर धरती फटी है, वहां भूमि संरक्षण का कार्य प्राथमिकता के आधार पर किया जाएगा, किंतु तीन वर्षों के बाद भी स्थिति जस की तस है। ललितपुर में जहां पत्थर माफिया अपनी तिजोरियां भरने में लगे हैं, वहीं खदानों में कार्यरत मजदूरों को सिल्कोसिस नामक जानलेवा बीमारी मजदूरी शुरू करने के सात सप्ताह बाद ही जकड़ लेती है। खांसी, जुकाम और बुखार से शुरू होने वाली सिल्कोसिस एक वर्ष पूरा होते-होते मजदूरों की मौत पक्की कर देती है। इस दौरान सीने में दर्द और मुंह से खून गिरने की शिकायत होने लगती है। यह बीमारी सिलिका नामक धूल की वजह से पैदा होती है, जो पत्थर काटते समय श्वांस लेने पर फेफड़ों में जमा हो जाती है और उन्हें कमजोर कर देती है। इस बीमारी का अभी तक कोई इलाज संभव नहीं है, इसलिए प्रतिवर्ष सैकड़ों मजदूर मौत के मुंह में जा रहे हैं।

फटी हुई जमीन को देखते लोगफटी हुई जमीन को देखते लोग1986 में सिल्कोसिस से पीड़ित 16 मजदूरों की एक साथ मौत होने पर तत्कालीन सांसद शरद यादव ने राज्यसभा का ध्यान इस समस्या की ओर खींचा था, तब केंद्र सरकार ने इस रोग की पहचान एवं उपचार के लिए डॉ. एच एन सैय्यद के नेतृत्व में राष्ट्रीय व्यवसायिक स्वास्थ्य संस्थान, अहमदाबाद के एक विशेषज्ञ दल को सर्वेक्षण हेतु ललितपुर भेजा था। उक्त दल ने इस क्षेत्र के 500 से अधिक मजदूरों में सिल्कोसिस के लक्षण पाए थे। वर्तमान में ग्राम नाराहट, डोगराकला, पाली, जाखलौन, धौर्रा, कपासी, मादोन, बंट, पटना, पारोट, राजघाट, भरपतुरा, मदनपुर एवं सौरई आदि के पास स्थित पत्थर खदानों में काम करने वाले खनिक इस बीमारी के शिकार हैं। बेतरतीब खनन के परिणामस्वरूप पर्यावरण को काफी नुकसान हुआ। क्रशरों और बालू के अवैध खनन के चलते यहां की जीवनदायिनी नदी बेतवा के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया है। बीते पांच वर्षों में आजीविका पर बढ़ते संकट के कारण 267 लोगों ने आत्महत्या करके इसे अभागा क्षेत्र बना दिया।

बुंदेलखंड के प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट रोकने के लिए जब तक सार्थक पहल नहीं होती, तब तक कभी भूकंप का डर तो कभी सूखे की मार जैसी आपदाएं इस इलाके के भाग्य पर मंडराती रहेंगी। नरैनी में बड़े पैमाने पर अवैध खनन जारी है। यहां कुल 250 हेक्टेयर भूमि अनुमानित तौर पर लीज के दायरे में आती है। महोबा में कुल 330 खदानें हैं, जिनमें 2500 हेक्टेयर भूमि प्रभावित है। चित्रकूट में 272 खदानों में पत्थर तोड़ने का कार्य किया जाता है, यहां लगभग 2200-2400 हेक्टेयर भूमि खनन क्षेत्र में है। बुंदेलखंड को लेकर सियासी हमले करके जनता की अदालत में केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश में लगी मायावती सरकार का असली चेहरा यहीं देखने को मिलता है। पूरे बुंदेलखंड में खनिज व्यापारी, क्रशर मालिक और ठेकेदार गुंडा टैक्स के कारण हड़ताल करने को विवश हो गए हैं। अवैध उगाही का यह काम कभी सपा मुखिया की आंखों के तारे रहे पोंटी चड्‌ढा के आदमी कर रहे हैं, जो इन दिनों मायावती सरकार के चहेते हैं। बांदा, चित्रकूट, महोबा और झांसी में तकरीबन साढ़े पांच सौ क्रशर प्लांटों में उत्पादन पूरी तरह ठप है, हजारों मजदूर बेरोजगार हो गए हैं।

क्रशर मालिकों का कहना है कि उनसे जबरन गुंडा टैक्स वसूला जा रहा है। गिट्टी में सरकारी रॉयल्टी 68 रुपये प्रति घन मीटर और 15 प्रतिशत बिक्री कर चुकाना पड़ता है। दस टायर ट्रकों में 10 घन मीटर और छह टायर ट्रकों में छह घन मीटर गिट्टी भरी जाती है। इस तरह दस टायर ट्रक में तकरीबन 800 रुपये का सरकारी टैक्स चुकाना पड़ता है। 50 ट्रकों के लिए रॉयल्टी शुल्क 34 हजार, सेल टैक्स 6 हजार यानी कुल 40 हजार रुपये राजस्व बुक जारी कराते समय चुका दिए जाते हैं। गुंडा टैक्स राजस्व बुक यानी एमएम-11 जारी कराते समय ही खनिज विभाग के बाहर मौजूद गुंडे वसूलते हैं। यह प्रति ट्रक 1500 यानी 50 ट्रकों पर 75 हजार रुपये तत्काल देने पड़ते हैं। बांदा के सदर विधायक विवेक कुमार सिंह का कहना है कि खनिज विभाग के अधिकारियों को निर्देश देकर गुंडा टैक्स की वसूली कराई जा रही है। बबेरू विधायक विशंभर सिंह यादव का कहना है कि जबरिया वसूली नहीं होनी चाहिए। तिंदवारी विधायक विशंभर प्रसाद निषाद ने कहा कि सिंडीकेट सिस्टम से वसूली पर अधिकारी चुप हैं, सरकार मौन है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवता द्विजेंद्र त्रिपाठी ने बसपा नेताओं के अवैध खनन, आबकारी और भूमि घोटालों की सीबीआई जांच कराने की मांग की है। त्रिपाठी बताते हैं कि सत्ता में बैठे प्रभावशाली लोगों ने अवैध तरीके से पत्थर और बालू खनन के ठेके अपने चहेतों के पक्ष में करा लिए। सरकारी संरक्षण में नदियों से अनाधिकृत तरीके से बालू का अंधाधुंध खनन कराया जा रहा है। क्रशर यूनियन अध्यक्ष ध्यान सिंह, महामंत्री मिथलेश गर्ग, स्टोन मिल मालिक संजय सिंह, पंकज माहेश्वरी, सुनील बाहरी, संतोष पटेल एवं शुभलाल सिंह ने कहा कि चाहे जो हो जाए, अब वे गुंडा टैक्स नहीं देंगे।

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