चूल्हे पर चढ़ता चिंकारा

Submitted by Hindi on Mon, 01/16/2012 - 13:59
Source
संडे नई दुनिया, 15-21 जनवरी 2012

थार में रहने वाले ग्रामीण विशेषकर बिश्नोई जाति आज भी पेड़ों और वन्यजीवों की रक्षा के प्रति ग्रामीण संकल्प नहीं भूली है। ये लोग आज भी इनकी रक्षा के लिए अपनी जान देने तक से नहीं चूकते। करीब एक दशक पहले एक बिश्नोई युवक निहालचंद वन्यजीवों की रक्षा की कोशिश में शिकारियों से लड़ते हुए अपनी जान पर खेल गया। बाद में इस घटना पर ‘विलिंग टू सैक्रीफाइस’ फिल्म भी बनाई गई। फिल्म को स्लोवाक गणराज्य में हुए फिल्म महोत्सव में पुरस्कृत भी किया गया।

राजस्थान का राज्य पशु चिंकारा एक तरफ तो अपनी खूबसूरती के कारण आभिजात्य लोगों की रुचि और तस्करों के निशाने पर है तो दूसरी तरफ इसे सरकार की बेरुखी का भी सामना करना पड़ रहा है। हाल में बाड़मेर और बीकानेर जिलों में इसके शिकार के मामले सामने आए हैं। इन निरीह पशुओं की समस्या यह है कि फिल्मी सितारों से लेकर सरहद पर देश की रक्षा करने वाले सैनिकों तक की क्रूरता का सामना करना पड़ रहा है। इन वन्यजीवों के लिए निराशा भरे इस माहौल में मरु प्रदेश की बिश्नोई जाति ने लगातार आशा की किरण जरूर जला रखी है। ये लोग सैकड़ों सालों से इन वन्यजीवों की रक्षा के लिए अपनी जान तक देने से नहीं चूक रहे। बहरहाल, चिंकारा के शिकार की हाल की क्रूर घटना नवंबर महीने के अंतिम दिनों में बाड़मेर जिले की शिव तहसील में सामने आई।

सीमा पर चल रहे सेना के युद्धाभ्यास के दौरान नीमला साजीतडा सैन्य क्षेत्र में सेना की 88 आर्म्ड वर्कशॉप मेस से राजस्थान वन विभाग की टीम ने 25 नवंबर को चिंकारा के तीन कटे सिर और कुछ पैरों सहित 15 किलो मांस बरामद किए। वन विभाग ने पांच सैन्यकर्मियों के खिलाफ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया। सेना ने भी इस मामले में कोर्ट ऑफ इनक्वायरी का आदेश जारी कर दिया है। इसके साथ ही बीकानेर इलाके में सेना की महाजन फायरिंग रेंज में भी चिंकारा के शिकार का कथित मामला सामने आया, हालांकि सेना ने यहां पर ऐसे किसी भी वन्यजीव के शिकार का खंडन किया है। उन्होंने कहा है कि यहां से बरामद मांस मुर्गे का था। फिलहाल मामले की जांच चल रही है।

संरक्षित क्षेत्र में निश्चिंत भिड़ते काले हिरणसंरक्षित क्षेत्र में निश्चिंत भिड़ते काले हिरणराजस्थान में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि जब चिंकारा का शिकार सुर्खियों में आया है। वर्ष 1998 में भी अभिनेता सलमान खान जोधपुर में अपनी एक फिल्म की शूटिंग के दौरान चिंकारा का शिकार किया था। मामले में उन्हें निचली अदालत से पांच साल की सजा भी हो चुकी है। सलमान पर आरोप था कि सितंबर 1998 में 'हम साथ-साथ हैं' की शूटिंग के दौरान उन्होंने काले हिरण और चिंकारा के शिकार किए थे। निचली अदालत सलमान को 26 सितंबर की रात ककानी गांव में काले हिरण और 28 सितंबर की रात भावद गांव घोड़ा फार्म में दो चिंकारा के शिकार मामले में दोषी मानती है। इस मामले में सैफ अली खान, सोनाली बेंद्रे और तब्बू पर भी आरोप तय हो चुके हैं।

दरअसल, चिंकारा राजस्थान का राज्य पशु ही नहीं है बल्कि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत बाघ की तरह ही शेड्यूल 1 का वन्यजीव है और इसका शिकार करने पर सात वर्ष तक की जेल का प्रावधान है। फिर भी इनकी संख्या में तेज गिरावट देखी जा रही है। वर्ष 2009 में प्रदेश में 37,758 चिंकारा थे जो वर्ष 2010 में घटकर 34,970 ही रह गए। पश्चिमी राजस्थान में भी इनकी तादाद घट रही है। थार के मरुस्थल में वर्ष 2009 में 3,076 चिंकारा थे जो अगले साल घटकर 2,743 रह गए। साफ जाहिर है कि बड़े पैमाने पर चिंकारा का शिकार किया जा रहा है। राजस्थान वन्यजीव और पर्यावरण कमेटी के सदस्य राजपाल सिंह कहते हैं कि थार के मरुस्थल में रहने वाले स्थानीय निवासी चिंकारा के शिकार की शिकायत लगातार करते आ रहे हैं लेकिन प्रशासन मसले को गंभीरता से नहीं ले रही है। चिंता की बात यह है कि इस अवैध कार्य में सेना का नाम भी सामने आया है।

बिश्नोई समुदाय के एक व्यक्ति के पास निर्भय विचरण करते चिंकाराबिश्नोई समुदाय के एक व्यक्ति के पास निर्भय विचरण करते चिंकारादूसरी तरफ स्थानीय लोग, खासकर पश्चिमी राजस्थान के बिश्नोई लोग चिंकारा के साथ परिवार के सदस्य की तरह व्यवहार करते हैं और उनसे बेइंतहा प्यार करते हैं। बिश्नोइयों के गांवों में हिरण और चिंकारा परिवार के बच्चों की भांति पाले जाते हैं। यूं भी बिश्नोइयों का वन्यजीवों और पर्यावरण के प्रति समर्पण अनुपम है। चिंकारा शिकार मामले में भी सलमान खान को सलाखों के पीछे पहुंचाने में बिश्नोई समाज की भूमिका अहम रही है। पर्यावरण संरक्षण के लिए मर मिटने की इस जाति ने ऐसी मिसाल कायम की है जो इतिहास के पन्नों पर सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। सन 1730 में जोधपुर के पास खेजडली गांव में राजा की सेना से खेजड़ी के पेड़ों की रक्षा करते बिश्नोई समाज के 363 स्त्री-पुरुषों को पेड़ों के साथ ही काट डाला था। इस घटना में एक महिला अमृता देवी के नेतृत्व में 83 गांवों के 363 बिश्नोई लोग पेड़ों को काटने से बचाने के लिए उससे लिपट गए थे। इनमें बच्चे, बूढ़े, जवान, महिलाएं सभी शामिल थे। बिश्नोइयों के लिए पर्यावरण और वन्यजीवों की रक्षा करना उनका जीवन सिद्धांत है।

यह बिश्नोइयों के गुरू जंभेश्वर द्वारा तय 29 जीवन-सिद्धांतों में से एक है। यह समाज राजस्थान में मुख्य रूप से पश्चिमी इलाके मारवाड़ में निवास करता है। मारवाड़ का ज्यादातर भाग रेगिस्तानी होने के कारण वैसे ही यहां वनों और वन्यजीवों की कमी है उस पर पिछले कुछ सालों के दौरान सरकारी जमीनों विशेषकर गोचर भूमि पर अतिक्रमण ने वन्यजीवों की रक्षा के प्रति चिंता और बढ़ाई है। सरकार ने चिंकारा को राज्य पशु तो घोषित कर दिया है लेकिन उसकी सुरक्षा के प्रति वह कोई खास प्रयास करती नजर नहीं आ रही है। यहां तक कि ग्रामीण जब अपनी आंखों के सामने इसका शिकार होता देखते हैं और शिकायत करते हैं तब भी सरकारी अमला उसके प्रति गंभीरता नहीं दिखाता है।

पर्यावरण प्रेम की डोर से बंधी बिश्नोई समुदाय की महिलाएं वृक्ष पूजती हुईंपर्यावरण प्रेम की डोर से बंधी बिश्नोई समुदाय की महिलाएं वृक्ष पूजती हुईंबहरहाल, थार में रहने वाले ग्रामीण विशेषकर बिश्नोई जाति आज भी पेड़ों और वन्यजीवों की रक्षा के प्रति ग्रामीण संकल्प नहीं भूली है। ये लोग आज भी इनकी रक्षा के लिए अपनी जान देने तक से नहीं चूकते। करीब एक दशक पहले एक बिश्नोई युवक निहालचंद वन्यजीवों की रक्षा की कोशिश में शिकारियों से लड़ते हुए अपनी जान पर खेल गया। बाद में इस घटना पर ‘विलिंग टू सैक्रीफाइस’ फिल्म भी बनाई गई। फिल्म को स्लोवाक गणराज्य में हुए फिल्म महोत्सव में पुरस्कृत भी किया गया। अपने स्तर पर वन्यजीवों की रक्षा में जुटे बिश्नोई समाज को यदि सरकार का समर्थन मिल जाए तो इलाके में एक भी वन्यजीव शिकारियों के हत्थे न चढ़े।

Email :- kapil.bhatt@naidunia.com

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