आदिवासी क्षेत्रों के विशेषाधिकार समाप्त करने की साजिश

Submitted by Hindi on Sun, 02/12/2012 - 10:56
Printer Friendly, PDF & Email
Source
सर्वोदय प्रेस सर्विस, फरवरी 2012

लंबे इंतजार के बाद राजस्थान में पेसा कानून को लेकर बनाए गए नियम जब सार्वजनिक हुए तो यह बात सामने आई कि इनके माध्यम से आदिवासी समुदाय की स्वायत्ता को समाप्त करने का प्रयत्न किया गया है। आवश्यकता इस बात की है कि राज्य सरकार की इस कार्यवाही का विरोध किया जाए और इस बात के प्रयास किए जाए कि देशभर में आदिवासी समुदाय के लिए अनुकूल नियम बने। इस कानून की मूल भावना को बनाए रखा जाए। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए राजस्थान सरकार को शीघ्र ही पेसा कानून के नियमों का जरूरी सुधार करना चाहिए। अन्य राज्य सरकारों को भी चाहिए कि वे उचित व न्यायसंगत नियम बनाकर पेसा कानून को उसकी मूल भावना के अनुकूल लागू करें।

आदिवासी बहुल जिले यानि ‘शैडयूल्ड’ क्षेत्रों को जिन्हें संविधान में विशेष तौर पर रेखांकित किया गया है, उनके लिए वर्ष 1996 में संसद ने विशेष तौर पर पंचायत राज का एक अलग कानून बनाया गया, जिसे संक्षेप में पेसा कानून कहा जाता है। इस कानून में आदिवासी क्षेत्रों की विशेष जरूरतों का ध्यान रखते हुए और यहां ग्रामसभा को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया गया था। आदिवासी मामलों के अधिकांश विशेषज्ञों ने यह माना है कि यदि इस कानून को पूरी ईमानदारी से लागू किया जाए तो इससे आदिवासियों को राहत देने व उनका असंतोष दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान मिल सकता है। पर दुख की बात यह है कि एक अच्छा और महत्वपूर्ण कानून बनाने के 16 वर्ष बाद भी किसी भी राज्य में पेसा कानून का सही क्रियान्वयन इसकी मूल भावना के अनुरूप नहीं हुआ है। कानून के सही क्रियान्वयन के लिए इस कानून की मूल भावना के अनुकूल जो नियम बनाने चाहिए थे वे ही ठीक से नहीं बनाए गए हैं। परिणाम यह है कि अनावश्यक विस्थापन, पर्यावरण विनाश, वन- कटान आदि समस्याओं को रोकने में व आदिवासियों की आजीविका के आधार को मजबूत करने में जो भूमिका यह कानून निभा सकता था वह संभव नहीं हो पाई है।

हाल ही में राजस्थान में इस मुद्दे ने जोर पकड़ा है। वहां के जन-संगठन लंबे समय से पेसा कानून के नियम बनाने के लिए सरकार को कह रहे थे। लंबे इंतजार के बाद पिछले वर्ष सरकार ने नियम घोषित किए तो कानून की मूल भावना के अनुकूल न पाए जाने के कारण इनका व्यापक स्तर पर विरोध हुआ है। राजस्थान के आदिवासी क्षेत्रों में लगभग 25 वर्षों से कार्यरत आस्था संस्था, राजस्थान आदिवासी अधिकार मंच व उसके सहयोगी संगठनों ने इन नियमों के विस्तृत आकलन के बाद मुख्यमंत्री, पंचायत राज मंत्री व विभिन्न अधिकारियों को लिखे पत्रों में इन नियमों में जरूरी सुधार करने की मांग की है। इन संगठनों द्वारा किए गए आकलन के अनुसार जो नियम बनाए गए उनमें परम्परागत आदिवासी समुदाय के गांव को परिभाषित ही नहीं किया गया है। इन नियमों में निर्दिष्ट ग्रामसभाओं का आयोजन एवं उनके संचालन की पूरी प्रक्रिया की जिम्मेदारी ग्राम पंचायत के सचिव एवं विकास अधिकारी द्वारा नामित व्यक्ति को सौंप दी गई है।

प्राकृतिक संसाधनों के नियंत्रण के अधिकार को गांवसभा के स्थान पर संयुक्त वन प्रबन्धन समिति को दिया गया है जो पेसा कानून के विपरीत है। गौण वन उपज पर आदिवासी समुदाय के स्वामित्व को नकार दिया गया है। इससे संबंधित सारे अधिकार वन विभाग एवं राजस संघ को दे दिए गए हैं, जो पेसा कानून में प्रदत्त मालिकाना हक के अधिकारों का हनन है। नियमों से ऐसा प्रतीत होता है कि ग्रामसभा का कार्य केवल सरकारी अधिकारियों के निर्देशों का पालन करना मात्र है। भूमि अधिग्रहण के मामले में परामर्श को गांव सभा के बजाय पंचायती राज संस्थाओं के स्तर पर रखा गया है। भूमि अतिक्रमण को रोकना, बेदखली की शक्तियां, उधार पर धन देने के नियंत्रण, गांवसभा के क्षेत्रों में अवैध मदिरा के संबंध में विशेष कानूनों में पेसा की मूल भावना के अनुसार बदलाव करने के स्थान पर पहले से लागू कानून की शक्तियों को ही मान्य किया गया है एवं उनके आधार पर संबंधित विभाग के अधिकारियों को निर्णय लेने के लिए अधिकार दिए गए हैं।

कर्ज पर नियंत्रण की शक्ति को राज्य सरकार द्वारा पूर्व में अधिसूचना जारी कर ग्रामसभा और पंचायत को सहायक रजिस्ट्रार के अधिकार प्रदान किए गए थे परन्तु नए नियमों में इस संदर्भ में ग्रामसभा के अधिकारों को ही समाप्त कर दिया है। नियमों के विस्तृत आकलन के बाद इन जन संगठनों का निष्कर्ष यह है कि इन अधिसूचित नियमों में पेसा अधिनियम को राज्य एवं केंद्रीय सरकार द्वारा जारी पेसा अधिनियम की मूल भावना को तोड़-मरोड़ कर नष्ट किया गया है। पेसा कानून से आदिवासियों को बहुत उम्मीदें रही हैं। यह जरूरी है कि इस कानून की मूल भावना को बनाए रखा जाए। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए राजस्थान सरकार को शीघ्र ही पेसा कानून के नियमों का जरूरी सुधार करना चाहिए। अन्य राज्य सरकारों को भी चाहिए कि वे उचित व न्यायसंगत नियम बनाकर पेसा कानून को उसकी मूल भावना के अनुकूल लागू करें।

Comments

Submitted by Francis khalkho (not verified) on Mon, 09/18/2017 - 14:27

Permalink

महोदय

 सेवा में सविनय निवेदन यह हैं की मैं फ्रांसिस खलखो जिसे मेरी नानी ने अपनी जमीन हम तीन भाइयो को हमारी सेवा से खुश हो कर दान के रूप में हम तीन भाई के नाम कर दे. पर यहाँ पर एक विस्वनाथ साहू नाम का एक पैसे वाला दबंग ब्यक्ति मेरी जमीन पर 7 सालो से अपने कब्जे में लिया हुवा हैं !तथा हमारे हमारी जमीं खली कहने पर वो हमें जान से मार डालने की धमकियां देता हैं ! अतः श्री मान से आग्रह हैं की हमें हमारी जमीन वापसी कराकर हमारी सहायता करे!     आपका बिस्वासी फ्रांसिस खलखो

Add new comment

This question is for testing whether or not you are a human visitor and to prevent automated spam submissions.

9 + 11 =
Solve this simple math problem and enter the result. E.g. for 1+3, enter 4.

More From Author

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

Latest