घना में रौनक तो है साइबेरियाई सारस नहीं

Submitted by Hindi on Mon, 02/13/2012 - 10:35
Source
संडे नई दुनिया, 12-18 फरवरी 2012

साइबेरियाई सारस सहित यहां आने वाले सभी विदेशी पक्षी शाकाहारी होते हैं जो कि यहां कि वनस्पतियों पर निर्भर रहते हैं जबकि सभी प्रकार के देशी पक्षी मांसाहारी होते हैं। इनके लिए यहां मिलने वाली वनस्पतियों और मछलियों के साथ दूसरे जीव-जंतुओं के लिए प्राकृतिक तौर पर बहकर आने वाला पानी ही चाहिए। घना की झीलों को ऐसा पानी देने का एकमात्र स्रोत राजस्थान के करोली जिला स्थित पांचना बांध था जिसका पानी घने के साप स्थित अजान बांध को दिया जाता था वहां से यह पानी घना में आता था लेकिन पिछले सालों के दौरान पांचना बांध से घना को पानी देना बंद कर दिया गया था।

किसी समय साइबेरियाई सारस (साइबेरियन क्रेन) के लिए विश्वविख्यात रहे राजस्थान के भरतपुर जिले में स्थित केवलादेव पक्षी विहार घना में इस बार चंबल से मिले पानी से रौनक लौट आई है। सुंदर और दुर्लभ पक्षियों के कलरव से घना फिर से आबाद हो गया है। पिनटेल डक, कूट, स्पॉटेड बिल्ड डक जैसी विदेशी और पेंटेड स्टॉर्क, स्पूनबिल, ओपन बिल, स्टॉर्क आदि देशी पक्षियों ने केवलादेव का वैभव पुनः लौटा दिया है। पिछले कई साल से घना में चली आ रही पानी की कमी ने इस पक्षी अभ्यारण्य के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर दिया था। केवलादेव को वर्ष 1985 में विश्व प्राकृतिक धरोहर की सूची में शामिल किया गया था जबकि 1981 में इसे राष्ट्रीय पक्षी उद्यान का दर्जा दिया गया था। पिछले एक दशक से लगातार पानी के सूखते स्रोत के कारण केवलादेव विश्व प्राकृतिक धरोहर सूची के मापदंडों पर खरा नहीं उतर पा रहा था। 2,873 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में पक्षियों की करीब 375 से अधिक प्रजातियां मौजूद हैं।

देसी और प्रवासी पक्षियों के कलरव से गूंजने लगा है घना का केवलादेव पक्षी विहारदेसी और प्रवासी पक्षियों के कलरव से गूंजने लगा है घना का केवलादेव पक्षी विहारराजस्थान में पिछले साल मानसून की मेहरबानी के कारण पांचना बांध पानी से लबालब हो गया था। राज्य सरकार के निर्देशों के बाद पांचना बांध का पानी केवलादेव घना राष्ट्रीय पक्षी उद्यान के लिए पानी छोड़ा भी गया था लेकिन वह पर्याप्त नहीं था। इस बार चंबल से घना को भरपूर मात्रा में पानी मिलने के कारण यहां की नौ झीलों में से सात तो पूरी तरह लबालब भर चुकी हैं। इसकी वजह से इस बार यहां देशी और प्रवासी पक्षियों ने जमकर घोंसले बनाए। घना के पेड़ों पर बनाए गए घोंसलों से इन पक्षियों की संख्या भी इस बार खूब बढ़ रही है। प्रवासी पक्षियों के बच्चे घोंसलों के बाहर निकलकर जीवन की उड़ान सीखने में लगे हुए हैं। मार्च के महीने तक यह उद्यान इन पक्षियों के कलरव से गूंजता रहेगा। इसके बाद सभी पक्षी अपने-अपने मूल स्थानों को लौट जाएंगे। चंबल से मिले पानी ने जहां घना की झीलों की प्राकृतिक अवस्था को लौटाने में मदद की है वहीं इस पानी के साथ आई मछलियों से घना में पक्षियों को भरपूर भोजन भी मिल रहा है। सर्दियों में यहां साइबेरियाई सारस का पूरा समूह आता था जो पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र होता है।

झील के जीव-जंतु हैं इनका आहारझील के जीव-जंतु हैं इनका आहारपानी की कमी के कारण पिछले एक दशक से साइबेरियाई सारस केवलादेव नहीं पहुंच रहे हैं। इंटरनेशनल क्रेन फाउंडेशन के मुताबिक साइबेरिया से भारत आने वाले सारसों की प्रजाति अब संभवतः समाप्त हो चुकी है। कुछ समय पहले जारी वर्ल्ड वाइल्ड फाउंडेशन फॉर नेचर की रिपोर्ट ने भी इस ओर इशारा किया था कि अब इस पक्षी ने भारत से मुंह मोड़ लिया है। वैसे तो घना हर तरह के पक्षियों के कलरव से चहकता रहता था लेकिन जिस चिड़िया का आकर्षण पक्षी प्रेमियों को विदेशों से भी घना खींच लाता था वह था साइबेरिया से आने वाला साइबेरियाई सारस। ये पक्षी दूसरे परिंदों की तरह हर साल यहां जाड़े का मौसम बिताने के लिए पांच हजार किलोमीटर का सफर तय करके सुदूर उत्तरी ध्रुव के निकट साइबेरिया से यहां आते थे।

पर्पल हेरोनपर्पल हेरोनसाइबेरियाई सारसों के संरक्षण में लगी मास्को स्थित अंतर्राष्ट्रीय संस्था साइबेरियाई सारस फ्लाइवे कॉर्डीनेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक सन् 1960 की सर्दियों में 60 साइबेरियाई सारस यहां पर देखे गए थे जबकि प्रसिद्ध पक्षीविद् वाल्किन शा के अनुसार सन् 1964-65 में घना में 200 साइबेरियाई सारस थे। इसके बाद 1967-68 में इंटरनेशनल क्रेन फाउंडेशन के सह-संस्थापक रानस्वे ने यहां इनकी संख्या सौ के करीब मानी थी। जानकारों के मुताबिक केवलादेव में 1991 में 23 साइबेरियाई सारस अपने शीतकालीन प्रवास पर आए थे। इसके बाद यहां आने वाली साइबेरियाई सारसों की तादाद में निरंतर कमी आती गई और आखिरी बार सन् 2001-02 में यहां पर साइबेरियाई सारस का केवल एक ही जोड़ा आया था। उसके बाद इस पक्षी ने इस उद्यान की ओर कभी रुख नहीं किया। जानकारों का मानना है कि घना में निरंतर पानी की कमी और साइबेरिया से भारत आने के रास्ते में होने वाले क्रेनों के शिकार के कारण ही इन पक्षियों का यहां आना बंद हो गया।

पानी की बहुतायत ने लौटाई पार्क की रौनकपानी की बहुतायत ने लौटाई पार्क की रौनकदरअसल, घना की छिछले पानी की झीलें और उनमें पैदा होने वाले जीव-जंतु और वनस्पतियां ही यहां देशी-विदेशी पक्षियों को आकर्षित करती हैं। इसमें दिलचस्प बात यह है कि साइबेरियाई सारस सहित यहां आने वाले सभी विदेशी पक्षी शाकाहारी होते हैं जो कि यहां कि वनस्पतियों पर निर्भर रहते हैं जबकि सभी प्रकार के देशी पक्षी मांसाहारी होते हैं। इनके लिए यहां मिलने वाली वनस्पतियों और मछलियों के साथ दूसरे जीव-जंतुओं के लिए प्राकृतिक तौर पर बहकर आने वाला पानी ही चाहिए। घना की झीलों को ऐसा पानी देने का एकमात्र स्रोत राजस्थान के करोली जिला स्थित पांचना बांध था जिसका पानी घने के साप स्थित अजान बांध को दिया जाता था वहां से यह पानी घना में आता था लेकिन पिछले सालों के दौरान पांचना बांध से घना को पानी देना बंद कर दिया गया था।

झील में तैरता पिनटेल डकझील में तैरता पिनटेल डकऐसा राजनीतिक कारणों से हुआ। इस संबंध में उच्चतम न्यायालय में एक याचिका भी दायर की गई थी जिस पर न्यायालय की सेंट्रल एंपावर्ड कमेटी ने घना को उसके हक का पर्याप्त पानी प्राथमिकता के आधार पर देने के निर्देश दिए थे लेकिन इसके बावजूद पार्क को पानी नहीं दिया गया। पानी की कमी की वजह से घना से साइबेरियाई सारसों ने तो मुंह मोड़ ही लिया था यह उद्यान भी बर्बादी के कगार पर पहुंच गया था। यहां आने वाले पक्षियों की तादाद भी बहुत कम रह गई थी लेकिन अब घना को पानी मिलने से फिर से जीवनदान मिल गया है। यहां पक्षियों का कलरव लौटने से पर्यटन व्यवसाय को भी पंख लग गए हैं। इस बार घना को सर्दियों के शुरू होने से पहले ही चंबल से पानी मिलने लग गया था जिसके कारण इसकी रौनक लौटने के साथ ही देशी विदेशी सैलानी भी बड़ी तादाद में यहां पक्षियों का वैभव देखने को उमड़ रहे हैं।

Email : kapil.bhatt@naidunia.com

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