नदियों को ऊपर नहीं, भीतर से जोड़ने की जरूरत

Submitted by Hindi on Fri, 03/02/2012 - 11:37

जिन नदियों को यह कहकर दूसरी नदियों से जोड़ा जा रहा है, उनके पानी में लगातार कमी आ रही है। नदियों में निर्मल जल नहीं, जहर बह रहा है। प्रदूषण मुक्ति के लिए सरकार पहले ही कर्ज और मशीनों के खेल में फंसी हुई है। समस्या के मूल पर चोट करने की प्रवृत्ति यहां भी दिखाई नहीं दे रही। नदियों को धरती के ऊपर से नहीं, बल्कि धरती के भीतर से जोड़ने की जरूरत है। यह काम प्रकृति अनुकूल होकर ही किया जा सकता है। अंततः समाधान वही है। बड़ा खतरा यह है कि तब तक काफी देर हो चुकी होगी। भारत की नदियों पर इतने ढांचे बन चुके होंगे। भूगोल से इतनी छेड़छाड़ हो चुकी होगी कि कई पीढ़ियों तक भरपाई संभव नहीं होगी।

भारत सरकार की राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी खुश है कि नदी जोड़ पर सुप्रीम कोर्ट का निर्देश आ गया है। अब तो इसे समयबद्ध कार्यक्रम बनाकर लागू करना ही होगा। विलंब होने से लागत बढ़ेगी ही। इस बिना पर निर्देश के जायज होने से भला कौन इंकार कर सकता है। यूं भी कोर्ट सुप्रीम कहा जाता है, लेकिन राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी तो देश में पानी की समृद्धि लाने के लिए बनी एजेंसी है। पिछले एक दशक में उसके समक्ष नदी जोड़ की अव्यावहारिकता को लेकर जो तर्क रखे गये, उनसे कम से कम उसे तो आशंकित होना चाहिए था। वह इतनी खुश क्यों हैं। शायद इसलिए कि सरकारी इंजीनियर को बड़ा बजट, बड़े ढांचे, बड़ी परियोजनायें और अपनी मेजरमेंट बुक से ज्यादा कुछ प्रिय नहीं होता। तोड़क होने के बावजूद उन्हें नदी जोड़ भायेगा ही। नदी जोड़ परियोजना के अव्यावहारिक, अप्राकृतिक कर्ज बढ़ाने वाली और अंततः विनाशकारी होने से उन्हें क्या मतलब! लेकिन जिन्हें मतलब है, भविष्य उनकी चुप्पी पर भी सवाल उठायेगा।

काश! दूसरा पक्ष भी बताया जाता


मालूम नहीं क्यों, अदालत को विलंब के पीछे के जायज कारणों के बारे में बताया नहीं गया? क्यों नहीं बताया गया कि नदियां निर्जीव सड़कें नहीं होती कि उन्हें जहां चाहे जोड़ दिया जाये? प्रत्येक नदी की एक भिन्न जैविकी होती है। भिन्न जैविकी की नदी से जोड़ने के नतीजे खतरनाक हो सकते हैं। नदी को नहर समझने की गलती नही की जानी चाहिए। नदी जोड़ हेतु बनने वाले बांध व विशाल जलाशय पहले ही विवाद व विनाश से जुड़े हुए हैं। विवाद व विनाश को बढ़ाने वाले अनुभवों की बिना पर ही यह परियोजना अभी तक विलंबित रही। कोई उन्हें बताये कि बाढ़ भी जरूरी है। बाढ़ सिर्फ नुकसान पहुंचाती हो, ऐसा नहीं है। बाढ़ अपने साथ लाती है उपजाऊ मिट्टी, मछलियां और सोना फसल का। बाढ़ के कारण ही आज गंगा का उपजाऊ मैदान है। बंगाल का माछ-भात है।

बाढ़ नुकसान नहीं करती है। नुकसान करते हैं तो बाढ़ की तीव्रता और टिकाऊपन। तटबंध व बांध इस नुकसान को रोकते नहीं, बल्कि और बढ़ाते ही हैं। नदी प्रवाह मार्ग में बनने वाले जलाशय गाद बढ़ाते हैं। बढ़ती गाद नदी का मार्ग बदलकर नदी को विवश करती है कि वह हर बाढ़ में नये क्षेत्र को अपना शिकार बनाये। नये इलाके होने के कारण जलनिकासी में वक्त लगता है। बाढ़ टिकाऊ हो जाती है। पहले तीन दिन टिकने वाली बाढ़ अब पूरे पखवाड़े कहर बरपाती है। नदी को बांधने की कोशिश बाढ़ की तीव्रता बढ़ाने की दोषी हैं। तीव्रता से कटाव व विनाश की संभावनायें बढ़ जाती हैं। पूरा उत्तर बिहार इसका उदाहरण है। नदी जोड़ में प्रस्तावित बांध और जलाशय बाढ़ घटायेंगे या बढ़ायेंगे? कोई बताये।

बाढ़ और सुखाड़ के कारण भीकमोबेश एक जैसे ही हैं: जलसंचयन संरचनाओं का सत्यानाश, जलबहाव के परंपरागत मार्ग में अवरोध, कब्जे, बड़े पेड व जमीन को पकड़कर रखने वाली छोटी वनस्पतियों का खात्मा, भूस्खलन, क्षरण और वर्षा के दिनों में आई कमी। इन मूल कारणों का समाधान किए बगैर बाढ़ और सुखाड़ से नहीं निपटा जा सकता। जिन नदियों को यह कहकर दूसरी नदियों से जोड़ा जा रहा है, उनके पानी में लगातार कमी आ रही है। नदियों में निर्मल जल नहीं, जहर बह रहा है। प्रदूषण मुक्ति के लिए सरकार पहले ही कर्ज और मशीनों के खेल में फंसी हुई है। समस्या के मूल पर चोट करने की प्रवृत्ति यहां भी दिखाई नहीं दे रही। नदियों में जल की मात्रा और गुणवत्ता हासिल करने के लिए लौटना फिर छोटी संरचनाओं और वनस्पतियों की ओर ही होगा। नदियों को धरती के ऊपर से नहीं, बल्कि धरती के भीतर से जोड़ने की जरूरत है। यह काम प्रकृति अनुकूल होकर ही किया जा सकता है। अंततः समाधान वही है।

बड़ा खतरा यह है कि तब तक काफी देर हो चुकी होगी। भारत की नदियों पर इतने ढांचे बन चुके होंगे। भूगोल से इतनी छेड़छाड़ हो चुकी होगी कि कई पीढ़ियों तक भरपाई संभव नहीं होगी। यह परियोजना बाढ़-सुखाड़ के समाधान और विकास के तमाम मनगढ़ंत परिणाम लाने नहीं, बल्कि भारत को कचराघर समझकर कचरा बहाने आ रहे उद्योगों के लिए पानी जुटाने, नदी में कचरा बहाना आसान बनाने तथा देश को कर्जदार बनाने आ रही है। पिछले 10 सालों से यही बात देश के हर कोने से दोहराई जा रही हैं। बावजूद इसके नदी जोड़ परियोजना सरकार की प्राथमिकता में क्यों हैं? क्या अब भारत की सरकार बाजार की बंधक बन चुकी है? यह पर्यावरण विज्ञान का नहीं, बल्कि अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान और विदेशी नीति के जानकारों का विषय है।

नदी जोड़ का तोड़ : छोटी संरचनायें और छोटी वनस्पति-


मेरे जैसे पानी के कार्यकर्ता तो यह ही जानते हैं कि बाढ़ और सुखाड़ की जिस समस्या से निपटने के लिए नदी जोड़ का नाम लिया जा रहा है, वर्षा जल संचयन के छोटी-छोटी संरचनायें उनका सही विकल्प हैं। यदि नदी जोड़ परियोजना का दस फीसदी बजट भी उचित स्थान व डिजाइन के चुनाव के साथ ताल-पाल-झाल जैसी छोटी जल संरचनाओं में लगा दिया जाये, तो न ही बाढ़ बहुत विनाशकारी साबित होगी और न ही सूखे से लोगों के हलक सूखेंगे। शर्त है कि नीति और नीयत दोनों ईमानदार हों। यदि मनरेगा के तहत हो रहे पानी के काम को ही पूरी ईमानदारी व सूझ-बूझ से किया जाता, तो ही बाढ़- सुखाड़ की समस्या से बहुत कुछ निजात मिल जाता। और छोड़िए, यदि सरकारें सिर्फ देश में मौजूद परंपरागत जल संरचनाओं को कब्जा मुक्त कराने और उन्हें उनके मूल स्वरूप में लाने का संकल्प ठान लें, तो ही कम से कम बाढ़ और सुखाड़ के बढ़ते संकट पर काफी-कुछ लगाम लग ही जायेगी। तब न नदी जोड़ की जरूरत बचेगी, न भूगोल उजड़ेगा और देश भी कर्जदार होने से बच जायेगा। उद्योगों को भी पानी होगा और नदियां भी बर्बाद होने से बच जायेंगी। तब बाढ़ विनाश नहीं, विकास का पर्याय बन जायेगी।

तो फिर क्या नहीं चलनी चाहिए तालाब, झील व दूसरी जल संरचनाओं को कब्जा मुक्त कराने की मुहिम? क्या भारत का जल संसाधन मंत्रालय इस बाबत सिविल अपील संख्या - 4787/2001, हिंचलाल तिवारी बनाम कमलादेवी आदि में सुप्रीम कोर्ट द्वारा परित आदेश दिनांक-25.07.2001 में सुझाये गये रास्ते पर बढ़ने की कोई इच्छाशक्ति दिखायेगा। इसे आधार बनाकर 08 अक्तूबर, वर्ष-2001 को उत्तर प्रदेश की राजस्व परिषद ने जंगल, तालाब, पोखर, पठार तथा पहाड़ को बचाने का एक ऐतिहासिक व सख्त शासनादेश जारी किया था। क्या केंद्रीय समेत समस्त राज्य सरकारों के संबंधित मंत्री इससे प्रेरणा लेकर कुछ कागजी और कुछ जमीनी कदम उठायेंगे या नदी जोड़ के रास्ते पर आंख मूंद पर चलते जायेंगे? माननीय केंद्रीय जल संसाधन मंत्री! आप सरीखे संजीदा व्यक्ति के मंत्रित्व काल में भी यदि भारत का पानी विश्व बैंक और यूरोपीयन कमीशन की भेंट चढ़ेगा, तो शासन से उम्मीद ही खत्म हो जायेगी। जागिये! कुछ कीजिए। वरना भविष्य आप पर भी उंगली उठायेगा।

नदी जोड़ परियोजना एक खतरनाक संकेतनदी जोड़ परियोजना एक खतरनाक संकेत
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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

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स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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