केंचुआ: एक सदाबहार हलवाहा

Submitted by Hindi on Mon, 03/26/2012 - 13:51
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सर्वोदय प्रेस सर्विस, 19 मार्च 2012

अब हमें मिट्टी के संरक्षण और संवर्धन पर जोर देना चाहिए। गोबर खाद, हरी खाद, कम्पोस्ट खाद, केंचुआ खाद, जीवामृत आदि से जमीन को उपजाऊ बनाया जा सकता है। कई स्थानों पर ऐसे प्रयोग किए भी जा रहे हैं। इन सबसे जैव पदार्थ और सूक्ष्म जीवाणु मिट्टी को जीवित बनाए रखने के लिए जरूरी है। केंचुआ भूमि को भुरभुरा, पोला और हवादार बनाने में लगा रहता है। वह जमीन की एक सतह से दूसरी सतह में घूमता है जिससे जमीन हवादार बनती है। वह सदाबहार हलवाहा है। यानी वह बखरनी कर देता है।

म.प्र. के होशंगाबाद जिले के रोहना गांव के रूपसिंह अब रासायनिक खेती को छोड़कर जैविक खेती कर रहे हैं। वे कहते हैं खेतों की मिट्टी नशीली हो गई है। हर साल रासायनिक खाद की मात्रा बढ़ाकर डालनी पड़ती है। इससे लागत तो बढ़ती है पर उपज नहीं बढ़ती। जबकि जैविक खेती में क्रमशः लागत कम होती जाती है और उपज भी उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है। साथ ही मिट्टी में भी सुधार होता जाता है। उनका कहना है कि उनके खेत की मिट्टी अनुपजाऊ और सख्त हो चली थी। मिट्टी को उर्वर बनाने वाले सूक्ष्म जीवाणु खत्म हो गए थे। लेकिन जबसे जैविक खेती पुनः प्रारंभ की तब से मिट्टी भुरभुरी, पोली और हवादार हो गई है। केंचुआ खाद, नडेप खाद और जीवामृत के प्रयोग से मिट्टी को उपजाऊ बनाने वाले सूक्ष्म जीवाणु पुनः जीवित हो चले हैं। हर साल मिट्टी सुधरती जा रही है और उत्पादन भी बढ़ रहा है।

दरअसल, खेतों की मिट्टी का बंजर होना, रासायनिक खादों के बेजा इस्तेमाल का ही नतीजा है। हरित क्रांति के नाम पर शुरू की गई रासायनिक खेती में कीटनाशक, फफूंदनाशक, कृमिनाशक, चूहेमार दवाएं, खरपतवार नाशक व रासायनिक खादों का अंधाधुंध प्रयोग किया गया। इससे हमारी खेती का जो नुकसान पिछले सैकड़ों सालों में नहीं हुआ, वह चार-पांच दशकों में हो गया। इसने हमारे एवं हमारे पशुओं के स्वास्थ्य को भी प्रभावित किया है। मिट्टी कोई मृत वस्तु नहीं बल्कि जीवित संरचना है। इसमें प्राकृतिक रसायनों के साथ असंख्य जैव पदार्थ हैं। इसमें अनगिनत जीव-जंतु, बैक्टीरिया, फफूंद, शैवाल आदि मौजूद हैं। ये जैव पदार्थ या सूक्ष्म जीवाणु मिट्टी में ही पोषित और बढ़ते जाते हैं और सभी मिल-जुलकर अपना-अपना काम चुपचाप निस्वार्थ भावना से करते रहते हैं, जिससे मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बनी रहती है। अच्छी मिट्टी बनने में हजारों साल का समय लगता है और उतना ही समय बंजर जमीन की जगह लेने में उसे लगता है। मिट्टी में जीवन सूक्ष्म जीवाणु प्रदान करते हैं और वे ही फसल की बढ़वार में मददगार होते हैं।

दरअसल, मिट्टी का जीवन उसमें प्रवाहित वायु और जैव पदार्थों की मात्रा पर ही निर्भर करता है। जैव पदार्थों की मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि मिट्टी में वायु की प्रचुरता, जल ग्रहण और जल निकासी ठीक ढंग से हो। मिट्टी में मौजूद ये सूक्ष्म जीव जैव पदार्थों को गलाकर उसको पौष्टिक मृदा में परिवर्तित कर देते हैं। यह पौष्टिकता संपन्न मृदा ही भूमि की ऊपरी सतह बनाती है और यही जमीन का सबसे उर्वर भाग होता है। कृषि में मिट्टी महत्वपूर्ण स्थान रखती है। कृषि इसी पर आधारित है। भूमि की उचित देखभाल न होना उत्पादकता की कमी का एक प्रमुख कारण है। मुख्य रूप से मिट्टी के तीन प्रकार बताए जाते हैं- रेतीली, मटियारी और दूमट। रेतीली (सैरा) मिट्टी में जैव पदार्थ बहुत कम होते हैं किन्तु उनके कणों के बीच में अंतर बहुत बड़ा होता है। इसलिए यह पानी जल्दी सोख लेती है। दूसरी तरफ मटियारी मिट्टी में चिकनी मिट्टी की मात्रा अधिक होती है और ऐसी मिट्टी में पानी नीचे नहीं समाता बल्कि जमा रहता है जिससे पौधे पानी में सड़ जाते हैं। जबकि दूमट मिट्टी में जैव पदार्थ की मात्रा व कणों के बीच का अंतर ठीक अनुपात हो जाता है इसलिए ऐसी मिट्टी खेती के लिए सबसे अच्छी मानी जाती है।

नर्मदा कछार की काली कपासीय मिट्टी (ब्लैक कॉटन सॉइल) है। इसका रंग कहीं भूरा तो कहीं गहरा काला होता है। मिट्टी की रचना मटियारी है। यहां कम पानी या असिंचित अवस्था में भी अच्छी फसलें होती थी। काली मिट्टी गेहूं और अन्य फसलों के लिए बहुत अच्छी मानी जाती है। इसमें गहरी जुताई की जरूरत नहीं होती तथा जहां बिना सिंचाई की खेती होती थी। इस क्षेत्र की खेती-किसानी का अध्ययन कर चुके शिक्षाविद् कमल महेन्द्रु बताते हैं कि यहां हल की जुताई नहीं होने के कई कारण हैं - एक तो यहां बारिश के मौसम में खूब पानी गिरता था लेकिन उसके बाद पानी गिरेगा कि नहीं, यह तय नहीं था। खेत में अधिक समय तक नमी बनी रहे इसलिए बक्खर से उसे छोल देते थे। यानी जब घास-फूस खरपतवार हो जाए तो उसकी छुलाई कर देते थे। छोलना मतलब जैसे दाढ़ी को छोलते (छांटते) हैं उसी तरह जमीन की छुलाई। यानी बक्खर भी ज्यादा गहरा नहीं जाना चाहिए। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। सिंचाई आने के बाद ट्रेक्टर से जुताई होने लगी व कल्टीवेटर आ गए।

केंचुआ कृषि के लिए बहुत ही फायदेमंद हैंकेंचुआ कृषि के लिए बहुत ही फायदेमंद हैंइस बीच पशुओं की संख्या कम हो गई और कृषि क्षेत्र का रकबा बढ़ता चला गया। सिंचाई आने से फायदे तो हुए लेकिन इसके नुकसान भी कुछ कम नहीं है। ज्यादा सिंचाई से होशंगाबाद जिले की काली चिकनी मिट्टी वाली जमीन जो भरपूर उपजाऊ थी, आज दलदल में तब्दील होती जा रही है और जमीन में लवणीयता और क्षारीयता बढ़ती जा रही है। विख्यात गांधीवादी बनवारीलाल चौधरी और उनकी संस्था ग्राम सेवा समिति ने 70 के दशक के उत्तरार्ध में इस इलाके में मिट्टी बचाओ अभियान चलाया था। इस मुहिम से प्रसिद्ध पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र भी जुड़े थे। आज इसकी अगली कड़ी में समिति के द्वारा सुरेश दीवान के नेतृत्व में जैविक खेती की मुहिम चलाई जा रही है जिससे रूपसिंह जैसे कई किसान जुड़े हुए हैं।

यानी अब हमें मिट्टी के संरक्षण और संवर्धन पर जोर देना चाहिए। गोबर खाद, हरी खाद, कम्पोस्ट खाद, केंचुआ खाद, जीवामृत आदि से जमीन को उपजाऊ बनाया जा सकता है। कई स्थानों पर ऐसे प्रयोग किए भी जा रहे हैं। इन सबसे जैव पदार्थ और सूक्ष्म जीवाणु मिट्टी को जीवित बनाए रखने के लिए जरूरी है। केंचुआ भूमि को भुरभुरा, पोला और हवादार बनाने में लगा रहता है। वह जमीन की एक सतह से दूसरी सतह में घूमता है जिससे जमीन हवादार बनती है। वह सदाबहार हलवाहा है। यानी वह बखरनी कर देता है। ऐसी जमीन में ही पौधों को हवा-पानी मिलता है जिससे उनमें बढ़वार होती है। इसी प्रकार किसान अन्य उपाय भी करते आ रहे हैं। इनमें से एक है कि अगर खेत में ढलान है तो उसके विपरीत जुताई करते है जिससे मिट्टी पानी में न बहे। इसी प्रकार पेड़ की टहनियां या लकड़ी की मोटी लकड़ियां नदी-नालों में बिछा देते हैं जिससे मिट्टी रुक जाती है और पानी बहकर निकल जाता है। इसके अलावा, बिना जुताई की खेती, वृक्ष खेती, भूमि को ढंककर रखना, मेड़ बनाना, हरी खाद लगाना, भूमि पर फैलनी वाली फसलें लगाना आदि भी मिट्टी संरक्षण के उपाय हैं।

यानी हमें टिकाऊ खेती की ओर बढ़ना होगा। पर्यावरण और मिट्टी-पानी का संरक्षण करना होगा। मेढ़बंदी व भू तथा जल संरक्षण के उपाय करने होंगे। हमारी खेती में पशुओं का भी महत्वपूर्ण स्थान है। पशु ऊर्जा और गोबर खाद का महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। इसी विविधीकरण की टिकाऊ खेती में अपार संभावनाएं हैं। पारंपरिक हल-बक्खर की खेती में टिकाऊपन तथा पारिस्थितिकीय संतुलन की क्षमता है। अगर हम इस ओर आगे बढ़े तो हमारे निराश किसानों को उम्मीद की किरण दिखाई देगी।

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