बुंदेलखंड में विकास के नाम पर बर्बादी का मंजर

Submitted by Hindi on Thu, 03/29/2012 - 14:57
Source
दैनिक भास्कर -ईपेपर, 28 मार्च 2012

जहां नदी, तालाब व जंगल पर हमला सबसे ज्यादा हुआ, वहीं आत्महत्याएं हुईं, जैसे बांदा, महोबा, हमीरपुर और चित्रकूट में। इसी इलाके से करीब 70 हजार लोगों के पलायन का आंकड़ा है। यह बुंदेलखंड का वह हिस्सा है, जहां के जंगल आज पूरी तरह खत्म हो चुके हैं। यहां खनन पर कोई नियंत्रण नहीं है। तालाबों पर बड़े पैमाने पर कब्जे हैं। भूजल स्तर में प्रतिवर्ष 5 से 50 सेमी तक की सबसे ज्यादा गिरावट है। समझने की बात है कि अंग्रेजों के आने के बाद का पहला बड़ा अकाल उत्तरी बुंदेलखंड के हमीरपुर और बांदा में ही आया।

वर्ष 2003 से 2006 के मध्य बुंदेलखंड में हुई आत्महत्याओं तथा पलायन का शोर पूरी दुनिया में कुछ इस कदर मचा कि इलाके का कष्ट व लाचारी देखने के नाम पर बुद्धिजीवियों की जो भीड़ यहां आई, उसने यहां की बेशकीमती प्रकृत्ति का पता दुनिया के बाजार को बता दिया। रासायनिक प्रदूषण से मुक्त सस्ती जमीन और विशुद्ध देसी नस्ल के मवेशियों की खबर सुनकर यहां बकरी फार्म भी आ रहे हैं, औषधि फार्म भी और कचरा फैलाने वाले उद्योग भी। वन व खनिज संपदा के लुटेरे यहां पहले से थे ही। केन-बेतवा नदी जोड़ से आने वाली बर्बादी व अशांति की धमक भी यहां सुनाई दे ही रही है। कुल मिलाकर जमीन हड़पो अभियान वालों की निगाहें यहां गड़ गई हैं और उन्हें मदद करने वाली सड़क और रेल की पटरियां पहुंचने लगी हैं। इसी बीच यहां बड़ा पैकेज भी आ गया है। साथ में आए हैं भ्रष्टाचार के अनेक मौके।

इसी पैसे से जल संचयन के ढांचे कुछ ऐसे बनाए जा रहे हैं कि उनमें पानी तो नहीं रुक रहा, पैसा जरूर पानी की तरह बहकर कई जेबों में जा रहा है। आरोप तो यह भी लगा है कि कई जगह ढांचे बनाए बगैर ही बारिश के बाद बह गया दिखा दिया गया है। दरअसल सूख गए सतही पानी को वापस संजोने की संजीदा कोशिश की जगह इंजीनियरों की रुचि भूगर्भ का पानी खींचने वाली मशीनों में ज्यादा रहती है। वही हो रहा है। पानी प्रबंधन के नाम पर इंडिया मार्का हैंडपंप और गहरे नलकूप लग रहे हैं। नतीजा? कुएं और छोटे तालाब सूख रहे हैं। मनरेगा के तहत बने तालाबों में पानी आने के रास्ते हैं ही नहीं। नहरों में पहले ही धूल उड़ रही है। इससे बुंदेलखंड में सिंचाई और पेयजल का नया संकट खड़ा हो रहा है।

कमीशनखोर यह समझने को तैयार नहीं हैं कि धरती के नीचे बहुत कम गहराई पर ग्रेनाइट, चूना और पत्थर की चट्टानी परत की वजह से बुंदेलखंड के पानी के एक्यूफर बहुत उथले हैं। यह इलाका भूजल की लूट की इजाजत नहीं देता। सतही जल का संचयन ही यहां की खेती, मवेशी व समृद्धि का प्राणाधार है। जल की समृद्धि का आधार होते हैं- नदी, तालाब, मेड़बंदियां और जंगल। चंदेलों ने इन्हीं को समृद्ध कर यहां की समृद्धि कायम रखी। उसी काल के तालाबों से प्रेरित होकर लिखी गई पुस्तक 'आज भी खरे हैं तालाब' ने कई को प्रेरित किया। ध्यान देने की बात है कि जहां नदी, तालाब व जंगल पर हमला सबसे ज्यादा हुआ, वहीं आत्महत्याएं हुईं, जैसे बांदा, महोबा, हमीरपुर और चित्रकूट में। इसी इलाके से करीब 70 हजार लोगों के पलायन का आंकड़ा है।

यह बुंदेलखंड का वह हिस्सा है, जहां के जंगल आज पूरी तरह खत्म हो चुके हैं। यहां खनन पर कोई नियंत्रण नहीं है। तालाबों पर बड़े पैमाने पर कब्जे हैं। भूजल स्तर में प्रतिवर्ष 5 से 50 सेमी तक की सबसे ज्यादा गिरावट है। समझने की बात है कि अंग्रेजों के आने के बाद का पहला बड़ा अकाल उत्तरी बुंदेलखंड के हमीरपुर और बांदा में ही आया और जब 21वीं सदी का पहला अकाल (2003-2005) आया, तो सबसे बुरा असर भी इसी इलाके में पड़ा। यूं बुंदेलखंड में अकाल का जिक्र मोहम्मद बिन तुगलक के भारत प्रवेश के वक्त भी मिलता है। किंतु इतिहास गवाह है कि बुंदेलखंड में अकाल का पहला सबसे बुरा व लंबा दौर तब आया, जब 19वीं सदी में अंग्रेजों ने जंगलों का अधिग्रहण किया। शुरू में चालीसा का अकाल, फिर 1809-10,1865 से 1889 का पच्चीसा का अकाल और फिर पूरी 20वीं सदी बुंदेलखंड के हिस्से में अकाल ही अकाल लाई। बुंदेलखंड में अकाल प्रकृति नहीं लाई। अकाल लाए अंग्रेज और डकैत। इनकी करतूतों ने ही जंगल को खत्म कर दिया।

इस इलाके में 950 मिमी. का औसत वार्षिक वर्षा कम नहीं कहलाएगी। राजस्थान व गुजरात में बुंदेलखंड से काफी कम बारिश के कई इलाके हैं, लेकिन वहां किसानों ने कभी आत्महत्याएं नहीं कीं। उन्होंने कम पानी के बावजूद अपने मवेशी, जंगल व चारागाहों को मरने नहीं दिया। बारिश की हर बूंद को संजोने के लिए सरकार का इंतजार नहीं किया। मोटा अनाज बोया। धान व सोयाबीन का लालच नहीं किया। लेकिन बुंदेलखंड में जंगल कटान, तालाबों पर कब्जे व भयानक खनन को रोकने की हिम्मत किसी सरकार में दिखाई नहीं दे रही। खान, क्रेसर मालिक व लकड़ी के ठेकेदार ही यहां के नियंता हैं। ताज्जुब है कि लोग भी थोड़ा-बहुत हल्ला मचाने के बाद चुप बैठ गए हैं। लगता है उन्हें बदलाव की कोई उम्मीद नहीं है।

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

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स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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