अब नहीं लौटेंगे सारस

Submitted by Hindi on Wed, 04/11/2012 - 14:05
Source
नेशनल दुनिया, 08-14 अप्रैल 2012

प्राकृतिक भोजन और पानी की कमी के कारण यहां आने वाले हर प्रकार के पक्षियों की तादाद में भारी कमी आई है। अब यहां आम लोगों को देखने के लिए शायद ही कुछ शेष रह गया है। हालांकि इस साल घना को चंबल का पानी मिलने से इसमें फिर से परिंदों की रौनक लौटने लगी है लेकिन साइबेरियन सारस के बिना केवलादेव का वैभव अधूरा ही कहा जा सकता है दूसरी तरफ राज्य पक्षी का दर्जा पाए पक्षी गोडावण का अस्तित्व भी खतरे में नजर आ रहा है।

राजस्थान में परिंदों पर पिछले कुछ सालों में जिस तरह का संकट आया है और सरकार का वन विभाग इनको बचाने या इनका संरक्षण करने के प्रति जिस तरह की उदासीनता और लापरवाही से काम कर रहा है उसके चलते कई प्रजातियों का इस प्रदेश से अस्तित्व ही समाप्त हो गया और बहुत सी ऐसी हैं जो समाप्ति के कगार पर पहुंच चुकी हैं। भरतपुर स्थित प्रसिद्ध घना पक्षी विहार से साइबेरियन क्रेन सहित विभिन्न तरह के परिंदों का जहां अस्तित्व ही समाप्त हो चुका है वहीं अब राज्य पक्षी गोडावण के साथ गिद्ध भी विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुके हैं। पर्यावरण प्रेमी चिंतित हैं, लेकिन सरकार की गंभीरता कहीं नजर नहीं आ रही है। सर्दियों के मौसम में राजस्थान के केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में साइबेरियन सारस क्रेनः का बसेरा अब हमेशा के लिए समाप्त हो गया है। राजस्थान सरकार के वन विभाग और पक्षी प्रेमियों का मानना है कि हजारों मील दूर साइबेरिया के ठंडे इलाके से आने वाले इस खूबसूरत पक्षी के भारत में दिखाई देने की उम्मीद अब समाप्त हो चुकी है। इंटरनेशनल क्रेन फाउंडेशन के मुताबिक भारत आने वाले सारसों की प्रजाति समाप्त हो चुकी है।

वर्ल्ड वाइड फाउंडेशन फॉर नेचर की रिपोर्ट भी इस ओर इशारा करती है कि इस पक्षी ने भारत से मुंह मोड़ लिया है। राजस्थान के भरतपुर स्थित केवलावेद राष्ट्रीय उद्यान जिसे स्थानीय भाषा में घना कहा जाता है, साइबेरियन सारसों का शीतकालीन बसेरा रहा है। कुल 28.73 वर्ग किलोमीटर में फैले इस उद्यान में कभी देशी-विदेशी पक्षियों की 366 प्रजातियां पाई जाती थीं। साइबेरियन क्रेन यहां हर साल अपने जाड़े का मौसम बिताने के लिए पांच हजार किलोमीटर का सफर तय करके साइबेरिया से यहां आते थे। आखिरी बार 2001-02 की सर्दियों में यहां साइबेरियन क्रेन का केवल एक ही जोड़ा आया, उसके बाद तो इस पक्षी ने केवलादेव की ओर फिर रुख नहीं किया। साइबेरियन सारसों के संरक्षण कार्य में लगे विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत के केवलादेव उद्यान में आने वाले साइबेरियन सारस पूरे तौर समाप्त हो गए हैं।

साइबेरियन सारससाइबेरियन सारसअब घना में साइबेरियन सारसों की वापसी की आशा नहीं की जानी चाहिए। उनके अनुसार घना में पानी की निरंतर हो रही कमी इन सारसों की यहां से विदाई की एक वजह मानी जा सकती है। केवलादेव को सन् 2003 से पांचना बांध से पानी नहीं मिल रहा है। पानी की कमी की वजह से साइबेरियन क्रेन के मुंह मोड़ने की बात तो दीगर है केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान ही बर्बादी के कगार पर पहुंच गया है। यहां हर साल आने वाले 25 से 26 हजार पक्षियों की तादाद कम रह गई है। प्राकृतिक भोजन और पानी की कमी के कारण यहां आने वाले हर प्रकार के पक्षियों की तादाद में भारी कमी आई है। अब यहां आम लोगों को देखने के लिए शायद ही कुछ शेष रह गया है। हालांकि इस साल घना को चंबल का पानी मिलने से इसमें फिर से परिंदों की रौनक लौटने लगी है लेकिन साइबेरियन सारस के बिना केवलादेव का वैभव अधूरा ही कहा जा सकता है दूसरी तरफ राज्य पक्षी का दर्जा पाए पक्षी गोडावण का अस्तित्व भी खतरे में नजर आ रहा है।

कुछ समय पहले राजस्थान सरकार के वन विभाग और विश्व प्रकृति निधि की ओर से प्रदेश में गोडावणों की कराई गई गणना में प्रदेश के कई इलाकों में इस पक्षी का अस्तित्व ही नहीं पाया गया। प्रदेश के भीलवाड़ा, जोधपुर, कोटा और बीकानेर में गोडावण समाप्त हो चुका है। जबकि दूसरे इलाकों में भी इसकी तादाद में भारी गिरावट दर्ज की गई है। वैज्ञानिक तरीके से गोडावणों की ऐसी गणना प्रदेश में बारह साल बाद की गई थी। जानकारों का मानना है कि इन पक्षियों का बढ़ता शिकार, संरक्षण के संसाधनों की भारी कमी, घास के मैदानों पर हुए अतिक्रमण व सरकारी नीतियों की वजह से ही यह पक्षी विनाश के कगार पर पहुंचा है। राजस्थान में दो दशक पूर्व गिद्धों की तादाद लाखों में हुआ करती थी। तब एक मृत जानवर पर सैकड़ों गिद्धों के झुंड का टूट पड़ना आम नजारा था। लेकिन समय बदला और आज गिद्धों के दर्शन ही दुर्लभ हो गए हैं।

सरकार के पास स्वयं के स्तर पर इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि राजस्थान में अब कितने गिद्ध बचे हैं। राज्य सरकार के सूत्र भी यह स्वीकार करते हैं कि आज राजस्थान में गिद्ध लुप्त होने के कगार पर पहुंच गए हैं। जिस कारण हर साल बड़ी संख्या में मरने वाले पालतू पशुओं के निस्तारण में भारी परेशानी आ रही है। सरकार का मानना है कि गिद्धों के इस विनाश के पीछे मुख्य कारण पालतू पशुओं के उपचार में काम में ली जाने वाली डाईक्लोफिनेक नामक दवा है। पशुपालक अपने पशुओं के उपचार में अत्यधिक मात्रा में इस दवा को काम में लेते रहे हैं। इस दवा को लेने वाले पशु का शव खाने से गिद्ध मर जाते हैं। सरकार ने इसदवा को लेने वाले पशु का शव खाने से गिद्ध मर जाते हैं। सरकार ने इस दवा की जगह पशुओं के उपचार में दूसरी वैकल्पिक दवाएं काम में लेने के निर्देश जारी कर दिए हैं वहीं पर भारत सरकार के ड्रग कंट्रोलर जनरल ने भी इस दवा को बनाने के लाइसेंस निरस्त करने के सभी राज्यों के ड्रग कंट्रोलरों को आदेश दे दिया है जिससे भविष्य में इस दवा के उपयोग की संभावना ही न रहे।

गिद्धगिद्धलेकिन प्रकृति प्रेमी सरकार के इन कदमों पर सवालिया निशान लगाते हुए नाकाफी बताते हैं। सरकार के प्रयास मात्र दिशा-निर्देश देने तक ही सीमित हैं जो इस बात को जाहिर करते हैं कि सरकार इस प्रजाति को बचाने के प्रति कितनी गंभीर है। राजस्थान में मुख्य रूप से गिद्धों की चार प्रचातियां पाई जाती हैं। ये हैं- लॉन्ग बिल्ड वल्चर, किंग वल्चर, व्हाइट बैक्ड वल्चर और इजिप्शियन वल्चर। जानकारों का मानना है कि गिद्धों की तादाद में कमी का एक बड़ा कारण उनके प्राकृतिक आवासों में कमी होना भी है। गिद्ध मुख्य रूप से पहाड़ों पर ऊंची जगहों अथवा बड़े पेड़ों में अपना घोसला बनाते हैं। पिछले दो दशकों में राजस्थान में जिस तेजी से खनन गतिविधियां बढ़ी हैं और पेड़ों की कटाई हुई हैं, उसने गिद्धों के प्राकृतिक आवासों को बुरी तरह से तबाह कर दिया है।

हालांकि अब राजस्थान का वन विभाग कह रहा है कि गिद्धों के संरक्षण के लिए राज्य के सभी वन अधिकारियों को गिद्धों की नैस्टिंग साइट्स की सुरक्षा के निर्देश जारी कर दिए हैं। विशेषकर खनन गतिविधियों को रोकने के लिए सरकार कदम उठा रही है लेकिन जानकारों को सरकार के ये दावे कोरे कागजी ही नजर आते हैं। पर्यावरण को स्वच्छ रखने में गिद्धों का योगदान बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। जानकार इनको पर्यावरण के पहरुए कहते हैं जो कि स्वच्छता के सबसे बड़े कारक हैं। राजस्थान सरकार खुद स्वीकार कर रही है कि गिद्धों के लुप्त होने के कगार पर पहुंचने की वजह से हर साल मरने वाले अनगिनत पशुओं के निस्तारण की समस्या खड़ी हो गई है। विशेषकर, अकाल के दिनों में पशुओं की मृत्यु दर में बढ़ोतरी होने के कारण यह समस्या और गंभीर हो जाती है।

Disqus Comment

More From Author

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

नया ताजा