गंगा बचेगी तो हम बचेंगे

Submitted by Hindi on Sat, 04/14/2012 - 15:40
Source
अमर उजाला, 28 मार्च 2012

बांध निर्माण का गंगा और उसकी अनेक सहायक नदियों पर प्रतिकूल असर पड़ा है। बहुत जल्दबाजी में सही लाभ-हानि का मूल्यांकन के बिना ही ऐसी अनेक परियोजनाओं को संदेहास्पद परिस्थितियों में मंजूरी दी गई थी। इसका एक असर तो यह हो रहा है कि गंगा व उसकी सहायक नदियों का लंबी दूरी तक बहाव बहुत कम हो जाएगा। इसका जैव-विविधता, जीव-जंतुओं और आसपास के गांवों, सब पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।

गंगा की रक्षा संबंधी आवश्यक कार्य चाहे पीछे छूट रहे हैं, पर कम से कम देश में इस बारे में एक व्यापक मान्यता तो बनी है कि गंगा की रक्षा एक बड़ी प्राथमिकता बननी चाहिए। अब इसके साथ एक व्यापक समझ यह बननी चाहिए कि गंगा की रक्षा के लिए पर्वतीय क्षेत्र में गंगा व इसकी सहायक नदियों के बहाव की रक्षा बहुत जरूरी है। गंगा का अधिकांश हिस्सा मैदानी क्षेत्र में है, पर नदी का पर्वतीय क्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण है। यहां पर्वतीय क्षेत्र से हमारा तात्पर्य केवल ऊंचे पर्वत से नहीं हैं, अपितु इसमें फुटहिल व तराई-भावर का क्षेत्र भी है। इस क्षेत्र में हरिद्वार और ऋषिकेश जैसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थान हैं, तो इसी क्षेत्र में गंगा मैदानी में उतरती है। इन्हीं पहाड़ों से यमुना जैसी गंगा की सबसे महत्वपूर्ण नदी भी उतरती है।

हिमालय के पर्वतीय और नीचे के तराई-भावर क्षेत्र में वनों की क्या स्थिति है, मिट्टी और जल संरक्षण की क्या स्थिति है, भू-स्खलन की कितनी आशंकाएं हैं, पहाड़ों की अस्थिरता बढ़ रही है या नहीं, ये सब सवाल गंगा और उसकी सहायक नदियों के लिए महत्वपूर्ण हैं। नदियों के जल-ग्रहण क्षेत्र जितने हरे-भरे रहेंगे, उनकी जीवनदायिनी क्षमता भी उतनी ही बढ़ेगी, क्योंकि एक ओर तो ये वन नदी में पानी और मिट्टी आने से रोकते हैं, दूसरी ओर सूखे मौसम में वे पहले से संरक्षित जल को नदी में धीरे-धीरे छोड़ते रहते हैं। वनों के कटाव तथा अनियमित खनन से नदियों के लिए खतरा बढ़ता है और नदी का बहाव अधिक खतरनाक रूप लेने की आशंका बढ़ती है। यदि स्थानीय ग्रामीण अपनी जरूरत लायक कुछ रेत और पत्थर लेते हैं, तो इससे कोई क्षति नहीं होती। पर जब लगातार रेत और पत्थर उठाए जाते हैं, तो नदी के बहाव पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

हाल के वर्षों में यही होता रहा है। गंगा और उसकी सहायक नदियों में बड़े पैमाने पर खनन करने वाले तत्व एक बड़े माफिया का रूप ले चुके हैं। सत्ताधारियों में उनकी गहरी पैठ बताई जाती है। वे नियमों की परवाह नहीं करते। जितनी अनुमति है, वे उससे कहीं अधिक खनन करते हैं। इससे गंगा और उसकी सहायक नदियों की बहुत क्षति हो रही है। इस क्षति के विरोध में ही संन्यासी निगमानंद ने लंबा उपवास करे जीवन का बलिदान दिया था। फिर भी भू और खनन माफिया पर अंकुश नहीं लगा। कुछ महीने पहले जब उत्तराखंड के चुनाव की ओर ध्यान केंद्रित था, तब खनन कार्य ने और तेजी पकड़ी थी। उत्तराखंड की नई सरकार को चाहिए कि खनन पर शीघ्र अंकुश लगाए।

बांध निर्माण का भी गंगा और उसकी अनेक सहायक नदियों पर प्रतिकूल असर पड़ा है। बहुत जल्दबाजी में सही लाभ-हानि का मूल्यांकन के बिना ही ऐसी अनेक परियोजनाओं को संदेहास्पद परिस्थितियों में मंजूरी दी गई थी। इसका एक असर तो यह हो रहा है कि गंगा व उसकी सहायक नदियों का लंबी दूरी तक बहाव बहुत कम हो जाएगा। इसका जैव-विविधता, जीव-जंतुओं और आसपास के गांवों, सब पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। फिर निर्माण प्रक्रिया भी ऐसी रही है कि ग्रामीणों के खेत-खलिहानों, वनों-चरागाहों की बहुत क्षति हो रही है। भूकंप प्रभावित क्षेत्र डायनामाइट के विस्फोटों से और अस्थिर हो रहे हैं। जहां लोग पहले ही आपदाओं के खतरे में रहते हैं, वहां ऐसी सुरंगों वाली बांध परियोजनाएं बनाई जा रही हैं, जिनसे लोग बहुत असुरक्षित महसूस करते हैं।

वैसे गंगा के संदर्भ में पर्वतीय क्षेत्र में बनने वाले टिहरी बांध परियोजना से लेकर मैदानों में बनने वाली फरक्का परियोजना विवादों के केंद्र में रही है। सवाल केवल प्रभावित लोगों ने ही नहीं, अनेक विशेषज्ञों ने भी उठाए हैं। हाल ही में गंगा की सहायक नदी कोसी पर नेपाल में बड़ा बांध बनाने की जो परियोजना चर्चित हो रही है, उसे वर्षों पहले उससे जुड़े अधिक खतरों के कारण त्याग दिया गया था। अब समय आ गया है कि इन सवालों पर समग्रता से विचार कर निर्णय किए जाएं, ताकि गंगा और उसकी सहायक नदियों, उसमें पल रहे जीवों तथा आसपास के ग्रामीणों- सबकी रक्षा हो सके।

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