क्या नहरों से नलकूपों पर शिफ्ट होगी सिंचाई

Submitted by Hindi on Thu, 05/10/2012 - 12:02

सिंचाई हेतु जहां एक भी समर्सिबल पहुंच गया हैं, वहां आसपास के कई ट्युबवेल, कुंए, तालाब और हैंडपम्पों की छुट्टी हो गई है। पीने का पानी पाने के लिए समर्सिबल मालिक की मिन्नतें करनी पड़ रही है। कुंए बड़ी तेजी के साथ खाली लोटे में तब्दील हो रहे हैं। क्या इस नये परिदृश्य को नजरअंदाज किया जा सकता है? इसे नजरअंदाज कर नलकूपों को प्रोत्साहित करने की नई योजना बनाना कितना जायज है? नहर या नलकूप? देश में नदियों की बदहाली के मद्देनजर यह लंबी बहस का विषय हो सकता है।

ताज्जुब इस बात का नहीं कि भारत सरकार के जल संसाधन मंत्रालय नहरों के स्थान पर नलकूपों को प्रोत्साहित करने का सुझाव दे रहा है। कारण कि भारत का जल संसाधन मंत्रालय हमेशा से ही और तरीकों की बजाय, जल निकासी व जल निकासी की जरूरत बढ़ाने के हालात पैदा करने वाली परियोजनाओं को ज्यादा मंजूरी देती रही है। ताज्जुब इस बात का है कि इसे एक ऐसा प्राधिकरण सुझा रहा है, जिसका काम ऐसे इलाकों में जल प्रबंधन सुनिश्चित करना है, जहां खेती सीधे-सीधे बारिश पर निर्भर करती है-राष्ट्रीय वर्षाजल क्षेत्र प्राधिकरण। यदि यह सुझाव सिर्फ बुंदेलखंड जैसे वर्षाजल सिंचित इलाके के लिए है, तो मामला और भी खतरनाक और तत्काल प्रभाव से हस्तक्षेप का है। बुंदेलखंड नलकूप नहीं, तालाब, कुंए और नदियों पर ही जिंदा रह सकता है। लेकिन चूंकि बात पूरे देश के बारे में कही गई थी। अतः इसका आकलन ज्यादा व्यापक मायने में किया जाना चाहिए। व्यापक मायने यह हो सकता है कि आगे सरकार की प्राथमिकता में सिंचाई बांध व नहरें नहीं, नलकूप होंगे। क्या सरकार, सिंचाई के नहरी तंत्र और सिंचाई बांधों से अजीज आ चुकी है? नहरों पर सरकारी नियंत्रण आसान नहीं होता। नहरें जब-तब तोड़ ली जाती है, तो क्या सरकार निजी नलकूपों को सरकारी मदद के जरिए भूजल नियंत्रण की किसी नई योजना पर काम कर रही है? प्रधानमंत्री जी ने भूजल को भूमालिकों की मिल्कियत से निकाल कर सरकारी नियंत्रण में लाने का जो संकेत दिया था, उससे शंका होना स्वाभाविक है।

उल्लेखनीय है कि गत् 27 अप्रैल को बुंदेलखंड पैकेज की समीक्षा करने लखनऊ पहुंचे राष्ट्रीय वर्षाजल क्षेत्रीय प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. जे.एस. सामरा ने कुछ ऐसे ही संकेत दिए हैं। अपने लखनऊ प्रवास के दौरान डॉ. सामरा ने निजी नलकूपों हेतु सब्सिडी देने की वकालत की। उन्होंने छोटे काश्तकारों को सरकार द्वारा सामूहिक नलकूप स्थापित कर प्रबंधन हेतु काश्तकार समिति को सौंप देने की बात की। उन्होंने कहा कि पंजाब, हरियाणा और गुजरात की तरह देश के दूसरे राज्यों में भी वह नलकूपों के लिए अलग बिजली फीडर हैं। इससे नलकूपों को बिना बाधा बिजली मिलना संभव हो जाता है। उनकी राय थी कि नलकूपों को ग्राम्य विद्युतीकरण योजना के तहत् प्राथमिकता पर बिजली दी जाये। शुक्र है उन्होंने समाजवादी पार्टी के घोषणा पत्र के मुताबिक मुफ्त बिजली और पानी मुहैया कराने का सुझाव देने की बात नहीं कही।

खैर! डॉ. सामरा का तर्क है कि देश में 65 फीसदी सिंचाई नलकूप से होती है। नहरों में प्रति हेक्टेयर ढाई लाख रुपये के निवेश की जरूरत होती है। नलकूपों में सवा लाख रुपए प्रति हेक्टेयर। नहरों में पानी बर्बाद ज्यादा होता है। नलकूप पानी का कम दोहन करते हैं। नहरों की तुलना में नलकूप से सिंचाई करने वाले खेतों में उत्पादन ज्यादा होता है। नहरों में 100 फीसदी पैसा सरकार लगाती है। नलकूप में 100 फीसदी पैसा किसान लगाता है। अतः जरूरी है कि केंद्र सरकार नलकूप से सिंचाई करने वाले किसानों को सहूलियत दी जाये। उन्होंने बताया कि सरकार इस बाबत् एक नई योजना पर काम कर रही है। उन्होंने सिंचाई की फव्वारा पद्धति अपनाने की सलाह भी दी।

समर्सिबल भूजल को खत्म कर रहा हैसमर्सिबल भूजल को खत्म कर रहा हैमै नहरों के दुष्परिणामों से भली-भांति वाकिफ हूं। मैं नलकूपों की जरूरत से भी इंकार नहीं करता। लेकिन यदि डॉ. सामरा के सुझाव सचमुच देश को नहरी सिंचाई से हटाकर नलकूप सिंचाई की ओर ले जाने का संकेत हैं, तो अधिक सतर्क हो जाने की आवश्यकता है। कारण कि देश के 70 फीसदी भूजल एक्युफर सुरक्षा की लक्ष्मण रेखा पहले ही पार कर चुके हैं। मौजूदा नलकूप नीचे उतर रहे हैं। सिंचाई हेतु जहां एक भी समर्सिबल पहुंच गया हैं, वहां आसपास के कई ट्युबवेल, कुंए, तालाब और हैंडपम्पों की छुट्टी हो गई है। लोगों को ट्युबवेल के पाइप कबाड़ में बेचने पड़ रहे हैं और पीने का पानी पाने के लिए समर्सिबल मालिक की मिन्नतें करनी पड़ रही है। कुंए बड़ी तेजी के साथ खाली लोटे में तब्दील हो रहे हैं।

क्या इस नये परिदृश्य को नजरअंदाज किया जा सकता है? इसे नजरअंदाज कर नलकूपों को प्रोत्साहित करने की नई योजना बनाना कितना जायज है? नहर या नलकूप? देश में नदियों की बदहाली के मद्देनजर यह लंबी बहस का विषय हो सकता है। लेकिन फिलवक्त इतना तो कहा ही जा सकता है कि सामरा साहब! नलकूपों को प्रोत्साहन देने का सुझाव आगे बढ़ाने से पहले कम से कम यह निश्चित कर ही लीजिए कि भूगर्भ में निकालने लायक पानी का भंडार हमेशा बचा रहेगा। आखिरकार वर्षाजल क्षेत्रों के राष्ट्रीय प्राधिकरण के मुखिया हैं आप! जितना जोर आज जल निकासी पर है, जब तक उससे ज्यादा जोर जल संचयन पर सुनिश्चित नहीं हो जाता, तब तक नलकूपों का प्राथमिकता पर आना क्या संकट ग्रस्त एक्युफर की बढ़ती संख्या में और इजाफा नहीं करेगा? यदि हां, तो नहर के स्थान पर नलकूप को आगे लाने के इस सुझाव का मायने क्या है? सोचिए और हमें भी बताइए।

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

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स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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