भूजल पर संकट

Submitted by Hindi on Thu, 05/17/2012 - 10:46
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हम सम्वेत
बढ़ते जनसंख्या और शहरीकरण के विस्फोट की वजह से सबसे ज्यादा असर भूजल पर पड़ा है। इसके अंधाधुंध दोहन से आज भूजल संकट में है। भूजल की बढ़ती समस्या से निपटने के लिए कई राज्यों ने भूमिगत जलकर्षण के बारे में कानून बनाए हैं या कानून बनाने पर विचार कर रहे हैं। जहाँ कानून बने हैं, वहाँ उनकी व्यापक अनदेखी भी हुई है। भूजल पर बढ़ते संकट को उजागर कर रही हैं स्वाति शर्मा।

पचास के दशक से भूमिगत जल के उपभोग में विस्फोटक बढ़ोतरी हुई है। शहरी क्षेत्रों के निकट जनसंख्या वृद्धि और औद्योगिकरण के कारण भूमिगत जल संसाधनों पर दबाव बढ़ता गया है। इससे भूमिगत जल का स्तर गिरता जा रहा है। यह समस्या उन इलाकों में अधिक गंभीर है जहां चट्टानें सख्त हैं या पुनर्भरण का स्तर बहुत कम है। साथ ही भूमिगत जल में अक्सर प्रदूषक प्रवेश कर जाते हैं, अनेक तटवर्ती क्षेत्रों में क्षारीय तत्वों की घुसपैठ भी एक समस्या है।

जल मानव की रोजमर्रा की आवश्यकताओं में से एक है इसीलिए यह जरूरी है कि समाज अपने जल संसाधनों का उचित प्रबंधन एवं उसका समान वितरण सुनिश्चित करे। जल की विभिन्न कार्यों में उपयोगिता सर्वविदित है, जो कि चर्चा का विषय नहीं है, असली मुद्दा इसकी उपलब्धता है। हमारे देश में हर वर्ष कुल 4000 अरब घनमीटर (बीसीएम) वर्षा होती है। देश के आंतरिक पुनर्भरण जल संसाधन करीब 1953 बीसीएम वार्षिक हैं जिनमें से उपभोग करने योग्य जल संसाधन प्रतिवर्ष 1086 बी.सी.एम. होते हैं। इनमें सतह और भूमिगत संसाधन क्रमश: 690 बी.सी.एम. तथा 396 बी.सी.एम. हैं। जनसंख्या में विस्फोटक वृद्धि के कारण प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता कम होती जा रही है। जल की कुल घरेलू और सार्वजनिक आवश्यकता में पशुओं की जल आवश्यकता भी शामिल है। उपरोक्त उद्देश्यों के अलावा उद्योग, बिजली उत्पादन, अंतर्देशीय नौवहन और पारिस्थितिकीय उद्देश्यों के लिए भी जल की आवश्यकता पड़ती है। किंतु भूमिगत जल की मांग मुख्य रूप से केवल सिंचाई, घरेलू और सार्वजनिक उपयोग, औद्योगिक और बिजली आपूर्ति के लिए की जाती है।

आंकड़ों के मुताबिक भूमिगत जल की कुल आवश्यकता सन् 2010 में 252 बी.सी.एम., 2025 में 282 बी.सी.एम. और 2050 में 428 बी.सी.एम. हो जाएगी। चूंकि उपयोग योग्य भूमिगत जल केवल 396 बी.सी.एम. है इसीलिए अनुमान है कि 2050 तक भूमिगत जल का भारी दोहन किया जाएगा। मांग और आपूर्ति के बीच के बढ़ते असंतुलन को देखते हुए भूमिगत जल के अंधाधुंध और अत्यधिक इस्तेमाल पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। भूमिगत जल अत्यंत महत्वपूर्ण संसाधन है। आमतौर पर यह मान लिया जाता है कि कुंओं से निकलने वाला जब सर्व व्यापक है और हमेशा उपलब्ध रहेगा। किंतु अगर समय और स्थान के अनुसार इसका समुचित प्रबंधन नहीं किया गया तो यह संसाधन भी समाप्त हो सकता है। पचास के दशक से भूमिगत जल के उपभोग में विस्फोटक बढ़ोतरी हुई है। शहरी क्षेत्रों के निकट जनसंख्या वृद्धि और औद्योगिकरण के कारण भूमिगत जल संसाधनों पर दबाव बढ़ता गया है। इससे भूमिगत जल का स्तर गिरता जा रहा है।

यह समस्या उन इलाकों में अधिक गंभीर है जहां चट्टानें सख्त हैं या पुनर्भरण का स्तर बहुत कम है। साथ ही भूमिगत जल में अक्सर प्रदूषक प्रवेश कर जाते हैं, अनेक तटवर्ती क्षेत्रों में क्षारीय तत्वों की घुसपैठ भी एक समस्या है। भूमिगत जल स्तर में गिरावट के व्यापक सामाजिक एवं आर्थिक परिणाम है। ग्रामीण और शहरी उपभोक्ताओं में प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है और कहीं-कहीं तो संघर्ष तक की नौबत आ गई है। जल स्तर गिरने से ग्रामीण समुदायों के बीच आर्थिक अंतर भी बढ़ जाता है। गरीब किसान सिंचाई स्रोत से वंचित रह जाते हैं, जबकि अमीर किसान गहरे कुएं बनाने व बोरिंग करने में सफल हो जाते हैं। बड़े पैमाने पर गिरता जलस्तर ऊर्जा की खपत को बढ़ा देता है क्योंकि पानी अधिक नीचे से पंप करने में अधिक ऊर्जा खर्च होती है। मोटे तौर पर भारत के बिजली उत्पादन का 30.5 प्रतिशत हिस्सा वर्तमान में भूमिगत जल को पंप करने में खर्च हो रहा है।

भूमिगत जल की बढ़ती समस्या से निपटने के लिए कई राज्यों ने भूमिगत जलकर्षण के बारे में कानून बनाए हैं या कानून बनाने पर विचार कर रहे हैं। जहाँ कानून बने हैं, वहाँ उनकी व्यापक अनदेखी भी हुई है। इतना ही नहीं भूमिगत जल के विकास को बढ़ावा देने के लिए कई सरकारी संगठन भी विकसित किए गए। लेकिन ये संगठन केवल भूमिगत जल की खोज और ऋण आबंटन का कार्य करते रहे, नियमन या प्रबंधन के लक्ष्य ध्यान में नहीं रखे गए। भूमिगत जल संसाधनों के अत्यधिक दोहन के मूल में बिजली से चलने वाले पंपों का प्रसार, संसाधनों की विशिष्टता, जनसांख्यिकीय परिवर्तन व सरकारी नीतियां कारण रही हैं। ऊर्जा-चालित पंपिग प्रौद्योगिक की सहज उपलब्धता भूमिगत जल संसाधानों के अत्यधिक विकास में स्पष्ट घटक है। किसानों के लिए पानी पंप करने की लागत भी कम होती है। अत: वे जल संरक्षण की परवाह किए बिना अधिक से अधिक जल निकालते रहते हैं। जल का उपयोग किया और बाकी बेच दिया। गुजरात के कई किसान तो शुष्क व वर्षा के मौसमों में अलग-अलग दरों पर पानी बेचते हैं। इससे किसान को तो लाभ होता है, पर जल भंडारों के दोहन की गति बढ़ जाती है और भूमिगत जल संसाधान के ह्रास की दर भी बढ़ जाती है।

अत्यधिक दोहन से बढ रहा है भूजल संकटअत्यधिक दोहन से बढ रहा है भूजल संकटभूमिगत जल से जुड़े तीन ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर नीतिगत निर्णय लेना आवश्यक है-
1. भूमिगत जल संसाधनों को लेकर गांवों व शहरों के बीच प्रतिस्पर्धा।
2. जल की कमी वाले ऐसे क्षेत्रों में इसकी समान उपलब्धता।
3. ऊर्जा आबंटन और पंपिग के लिए मूल्य वसूल करना।

राष्ट्रीय जलनीति के तहत घरेलू जलापूर्ति को कृषि उपयोग से अधिक प्राथमिकता मिलती है। किंतु शहरी जलापूर्ति में घरेलू और औद्योगिक इस्तेमाल के बीच अंतर करना कठिन है। इतना ही नहीं ताजा नीतियों में शहरी उपभोक्ता आवश्यकता पड़ने पर ग्रामीण क्षेत्रों में कुएं खुदवा सकते हैं। इसका प्रत्यक्ष दुष्प्रभाव गांवों में पेयजल और खेतों की सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता पर पड़ सकता है। यदि कुआं खोदने के लिए ऋण उपलब्धता संबंधी अंकुश लगाए जाते हैं तो इसका असर उन समूहों पर अधिक पड़ेगा जिनके पास सीमित संसाधान हैं। अधिक धनवान किसान सरकारी ऋण पर निर्भर न रहकर निजी पूंजी का उपयोग कर सकते हैं। अत: भूमिगत जल के दोहन पर नियंत्रण रखने वाले प्रबंधकों को चाहिए कि वे समानता के पहलू पर अधिक ध्यान केंद्रित करें। बिजली के दाम और जल पंपिंग के लिए उसकी उपलब्धता तीसरा क्षेत्र है, जिस पर ध्यान देना जरूरी है। फ्लैट दर से नि:शुल्क बिजली देने की नीतियां भले ही राजनीतिक दृष्टि से लोकप्रिय हों, उनसे जल और बिजली दोनों के ही इस्तेमाल में लापरवाही की जाती है। प्रति यूनिट मूल्य लेने से बिजली और उससे पंप किए गए पानी, दोनों के ही कारगर उपयोग को बढ़ावा मिलेगा।

भूमिगत जल के अति उपभोग से आज जो समस्याएं आज पैदा हुई हैं, उनका कारण संसाधनों का ठीक से प्रबंधन न होना है और भूमिगत जल की सहज सुलभता है। अत: इस संबंध में कानून तो आवश्यक हैं लेकिन भूमिगत जल संबंधी प्रत्येक कानून ऐसा होना चाहिए कि वह भूस्वामियों, नगरपालिकाओं, स्थानीय स्वशासी निकायों, भूमिहीनों, प्रथम तथा बाद के उपभोक्ताओं सभी के हितों का ख्याल रखे। ऐसा कोई भी कानून राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों में निहित संवैधानिक मूल्यों और मौलिक अधिकारों के अंतर्गत जीने के अधिकार के अनुरूप होना चाहिए। हालांकि भारतीय स्थितियों में कानून व प्रबंधन के नियमों का पालन भी एक बड़ी चुनौती है। लेकिन चाहे कुछ हो भूमिगत जल का संरक्षण तो करना ही होगा, क्योंकि अगर इसका ह्रास इसी तरह जारी रहा, तो भविष्य में जो संकट उत्पन्न होगा, उससे बचना असंभव होगा।

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