माइक नहीं, फावड़ा उठाने का दिन -भूजल दिवस

Submitted by Hindi on Thu, 05/24/2012 - 17:27

भूजल संरक्षण संबंधी शासकीय निर्देशों को मानने की समझदारी उत्तर प्रदेश के प्रशासन व समाज दोनों ने दिखाई होती, तो सच मानिए कि उत्तर प्रदेश के पानी और धरती दोनों का चेहरा बदल गया होता। धरती पर डराती सूखी लकीरे, हरे से भूरा होता भूगोल और बेपानी कटोरे न होते। नतीजा दुखद है कि पूरे उत्तर प्रदेश का पानी उतर रहा है। उत्तर प्रदेश के हर इलाके में संकट की आहट साफ सुनाई दे रही है।

यह हकीकत है कि उत्तर प्रदेश के शासन ने भूजल संरक्षण के लिए कागजों पर बहुत कुछ किया है। लेकिन समाज के साथ मिलकर उन्हें जमीन पर उतारने का काम अभी बहुत बाकी है। काश! हर बरस आने वाले 10 जून के इस भूजल दिवस पर हम जाग जाते। काश! इसे हम महज एक आयोजन न मानकर संकल्प, समीक्षा और भूजल संरक्षण आदेशों व सुदर काम के सम्मान का मौका बना पाते। माइक संभालने की बजाय फावड़ा उठा पाते। किंतु यह हो नहीं पा रहा। जानने की बात है कि उत्तर प्रदेश देश का पहला प्रदेश है, जिसने मनरेगा के तहत तालाबों के नाम पर बन रही चारदीवारियों की बड़ी बेवकूफी सुधारकर उसे पानी आने के रास्ते की तरफ से पूरा खुला रखने का आदेश जारी किया। मनरेगा तालाबों के लिए जगह के चुनाव में समझदारी भरे निर्णयों का होना अभी बाकी है।

उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश के राजस्व परिषद द्वारा जारी चारागाह, चकरोड, पहाड़,पठार व जल संरचनाओं की भूमि को किसी भी अन्य उपयोग हेतु प्रस्तावित करने पर रोक लगाने, अन्य उपयोग हेतु पूर्व में किए गये पट्टे-अधिग्रहण रद्द करने, निर्माण ध्वस्त करने तथा संरचना को मूल स्वरूप में लाने को प्रशासन की जिम्मेदारी बताने वाली अधिसूचना भी एक मिसाल ही है। शासन के दोहराये निर्देशों और अदालतों द्वारा बार-बार तलब किए जाने के बावजूद चुनौतियों से दूर ही रहने की प्रवृति और इच्छाशक्ति के अभाव ने शासन द्वारा उठाये ऐसे ऐतिहासिक कदम को भी कारगर नहीं होने दिया। इसका ठीकरा सिर्फ सरकार के सिर फोड़कर बचा नहीं जा सकता; समाज भी उतना ही दोषी है।

10 जून को भूजल दिवस मनाकर जनभागीदारी सुनिश्चित करने का शासनादेश है। किंतु क्या भूजल दिवस महज एक दिखावटी आयोजन भर होकर नहीं रह गया है? उत्तर प्रदेश के भूगर्भ जल विभाग ने पिछले कई सालों में कई गर्व करने लायक शासनादेश भी जारी किए। कुछ चुनिंदा अच्छे आदेशों की चर्चा मैने इसी पोर्टल पर दर्ज अपने लेख- “आदेश बहुतेरे: पालना सिफर’’ में की है। किंतु यह उत्तर प्रदेश का दुर्भाग्य है कि उनकी पालना के नाम पर गौरव लायक उसके पास कुछ भी नहीं है। हकीकत यह है कि अगर भूजल संरक्षण संबंधी उक्तशासकीय निर्देशों को मानने की समझदारी उत्तर प्रदेश के प्रशासन व समाज दोनों ने दिखाई होती, तो सच मानिए कि उत्तर प्रदेश के पानी और धरती दोनों का चेहरा बदल गया होता। धरती पर डराती सूखी लकीरे, हरे से भूरा होता भूगोल और बेपानी कटोरे न होते। नतीजा दुखद है कि पूरे उत्तर प्रदेश का पानी उतर रहा है।

पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण उत्तर प्रदेश के हर इलाके में संकट की आहट साफ सुनाई दे रही है। बुंदेलखंड मे फिर आत्महत्याओं का दौर शुरू हो गया है।’’ कहीं रोटियां कम पड़ गई हैं पेट भरने के लिए। कहीं अनाज इतना हैं कि बोरे कम पड़ गये हैं संजोकर रखने के लिए।’’ यह कैसा विरोधाभास है! रोटी की कमी और बिन ब्याहे बेटी को घर बिठाकर रखने की बेबसी मौत का सबब बन रही है। पेड़ कटान और अनियंत्रित खदान है कि कोई रोकने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। सरकार के पास लड़की, जवान, बूढ़ा सभी को काम देने की दुनिया भर की योजनायें हैं। कौशल उन्नयन की राष्ट्रीय परिषद है। ग्रामीण और कुटीर उद्योगों के लिए खादी ग्रामोद्योग है, लेकिन बुंदेलखंड को मौत की बेबसी से उबारने के लिए क्या कुछ भी नहीं? पैकेज का पैसा भी लालच और नादानी के पानी में व्यर्थ ही बह रहा है। यू पी ए के तीन साल का रिपोर्ट कार्ड हकीकत है या बुंदेलखंड के श्मशान पर लिखा सच?

खैर! निर्णयों की ऐसी बेसमझी, हावी ठेकेदारी, विभागों के बीच तालमेल का अभाव, समग्र सोच और हर काम के लिए सरकार की ओर ताकने की लाचारी बदस्तूर जारी रही, तो फिर भूजल दिवस दिखावटी होकर रह जायेंगे और उत्तर प्रदेश सब कुछ होते हुए भी बेपानी। आखिर क्या नहीं है उ.प्र. के पास? अच्छा वर्षा औसत, गहरे एक्यूफर, तालाबों की बड़ी सूची, नदियों का विशाल संजाल, बागवानी और वानिकी की अकूत संभावनायें, क्रियान्वयन के लिए पहले से मौजूद केंद्र और राज्य स्तरीय योजनायें और बजट भी। सभी कुछ तो है। यूं भी आपात स्थितियां बजट और योजना देखकर नहीं आती। प्रदेश में तेजी से उतरता भूजल प्रमाण है कि भूजल के मामले में यह आपात स्थिति ही है।

अतः समाज को भी चाहिए कि वह इस आपात स्थिति से निबटने के लिए किसी योजना और बजट का इंतजार न करे। उठाये फावड़ा-कुदाल और टोकरे। जुट जाये बारिश से पहले पानी के कटोरों को साफ करने में। पालों को पक्का करने में। ताकि जब बारिश की पहली फुहार आये, तो ये कटोरे प्यासे न रह जायें। हम इनकी प्यास का इंतजाम करें। हमारी प्यास का इंतजाम ये खुद बखुद कर देंगे। जरूरत है कि अच्छे आदेशों की पालना सुनिश्चित की जाये। हम खुद तय करें कि सामान्य और आपात स्थितियों में एक तय गहराई से नीचे पानी न निकालना है, न किसी को निकालने देना है। बस! फिर देखियेगा कि बारिश की हर बूंद संजोना एक दिन कैसे खुद ब खुद आवश्यक हो जायेगा। भूजल दिवस मनाना सफल हो जायेगा। क्या इस भूजल दिवस पर है कोई, जो इस पहल का पहरुआ बनकर आगे आये?

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