भागीरथी नदी का दर्द

Submitted by Hindi on Tue, 05/29/2012 - 11:58
Source
जनसत्ता, 25 मई 2012
भागीरथी नदी के अविरल प्रवाह को रोकने और अनावश्यक छेड़छाड़, नदी को बांधने की कोशिश और तटों पर खनन बदस्तूर जारी है। गोमुख के पास चट्टानों पर साधु-संतों के लंगोट तथा बहते पानी के साथ मैले अंगोछे तैरते रहते हैं, गुटखे के खाली पाउच और सिगरेट के डिब्बे जगह-जगह बिखरे पड़े रहते हैं। गंगोत्री जाने वाले सैलानी खाना खाकर थालियों में बचा-खुचा खाना उस पानी के हवाले कर दिया जाता है जो पहाड़ से उतर कर भागीरथी में मिल जाता है। भागीरथी के दर्द को बता रहे हैं विजय विद्रोही।

छोटी-बड़ी पनबिजली परियोजनाओं की वजह से भागीरथी अचानक सूख कर एक नाले में बदल जाती है और कुछ किलोमीटर बाद सुरंग से निकलती है पानी की तगड़ी बौछार। भागीरथी फिर पहाड़ों के बीच इठलाती हुई कुलांचे मारने लगती है। लोहारीनाग पाला एक बड़ी परियोजना है, जिस पर काम अटका हुआ है। लोगों का कहना था कि छोटी-छोटी परियोजनाएं बनें, ताकि बिजली भी मिले और भागीरथी को कम नुकसान पहुंचे।

पिछले दिनों जब संसद के दोनों सदनों में गंगोत्री से लेकर ऋषिकेश तक गंगा की अविरल धारा को बनाए रखने पर बहस चल रही थी, उस समय मैं गंगोत्री में था। दिल्ली की चिलचिलाती धूप से बिल्कुल अलग वहां कड़ाके की सर्दी थी। गंगा, यों कहा जाए कि भागीरथी का पानी बर्फ जैसा ठंडा था। सुबह पांच बजे से ही भक्तों के स्नान का सिलसिला शुरू हो गया था। कुछ लोग स्नान के बाद अपने अंगवस्त्र भागीरथी में बहा रहे थे। बाहर निकल कर वहीं छोटे होटलों में चाय पी रहे थे; गुटखा खा रहे थे और उसका रैपर भागीरथी के हवाले कर रहे थे। दो साल पहले गंगोत्री से गोमुख की पैदल यात्रा पर जाना हुआ था। सुबह गंगोत्री से निकले और शाम तक भोजवासा पहुंचे। वहां रात बिताने के बाद सुबह पांच किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई तय कर गोमुख पहुंचे। वहां गोमुख के पास चट्टानों पर साधु-संतों के लंगोट पड़े थे, बहते पानी के साथ मैले अंगोछे तैर रहे थे, गुटखे के खाली पाउच और सिगरेट के डिब्बे जगह-जगह बिखरे पड़े थे। भक्त स्नान के बाद साथ में थर्मस में चाय लेकर आए थे। भयंकर सर्दी में चाय पीने का अलग ही मजा था, लेकिन कागज या प्लास्टिक के खाली ग्लास भागीरथी में बहाए जा रहे थे। वहीं अमेरिका से आए एक पर्यटक ने कहा कि हमारे यहां लोग नदी को मां नहीं मानते, लेकिन उसे साफ रखते हैं। आप देखिए, गंगा को मैला करने का सिलसिला तो गोमुख से ही शुरू हो गया है।

बहरहाल, गंगोत्री से भैरव घाटी होते हुए हर्सिल पहुंचे तो बादल छाए हुए थे। हल्की बारिश भी शुरू हो गई। सड़क पर पानी के झरने बह रहे थे। दो बसों के यात्री वहां नहा और कपड़े धो रहे थे। बस के पिछले हिस्से के बक्से से गैस का चूल्हा और सिलेंडर निकाला गया, खाना बना, लोगों ने खाया और थालियों में बचा-खुचा खाना उस पानी के हवाले कर दिया गया जो पहाड़ से उतर कर भागीरथी में मिल रहा था। यहीं एक बुजुर्ग वकील ने विल्सन का किस्सा सुनाया। विल्सन अंग्रेज था। वह राजा के यहां कोई सौ साल पहले आया था। उसने हर्सिल में रहने की इजाजत मांगी, मिल गई। कुछ समय बाद उसने राजा से कहा कि वह चाहता है कि उसे लकड़ी काटने की इजाजत मिल जाए, ताकि चार पैसे बना सके। राजा ने सोचा कि आखिर कितने पेड़ काट लेगा! उसने इजाजत दे दी। विल्सन ने पेड़ कटवाने शुरू किए। पेड़ों को वह भागीरथी में बहा देता। कटे हुए तने ऋषिकेश पहुंचते और लकड़ी के कारखाने के हवाले हो जाते। भागीरथी के दोहन का सिलसिला शायद विल्सन ने ही शुरू किया था जो आज भी जारी है।

हर्सिल से गंगवानी पहुंचते ही भागीरथी पर बन रही छोटी-बड़ी पनबिजली परियोजनाओं का सिलसिला शुरू हो जाता है। यहां भागीरथी अचानक सूख कर एक नाले में बदल जाती है और कुछ किलोमीटर बाद सुरंग से निकलती है पानी की तगड़ी बौछार। भागीरथी फिर पहाड़ों के बीच इठलाती हुई कुलांचे मारने लगती है। लोहारीनाग पाला एक बड़ी परियोजना है, जिस पर काम अटका हुआ है। तीन साल पहले यहां से गुजरा था तो युद्धस्तर पर काम चल रहा था। अस्थायी घर टूट रहे थे, छोटी दुकानें और चाय के ठिए उठ चुके थे। गाड़ी से तस्वीरें लेने नीचे उतरा तो सुरक्षाकर्मी नजदीक आ गए। हम फोटो खींचते रहे। एक बोला- ‘साठ प्रतिशत काम पूरा हो गया। अब जाकर साधु-संतों को सुरंग दिखी है। इतना सरकारी पैसा बर्बाद हो रहा है।’ गंगोत्री से उत्तरकाशी पहुंचने से पहले मनेरी में भी ठीक सड़क किनारे एक पनबिजली परियोजना है। वहां सुरंग से आती पानी की बौछार सड़क तक मार करती है और सैलानी वहां खड़े होकर इसका आनंद लेते हैं। लोगों का कहना था कि छोटी-छोटी परियोजनाएं बनें, ताकि बिजली भी मिले और भागीरथी को कम नुकसान पहुंचे।

भागीरथी नदीभागीरथी नदीउत्तरकाशी से आगे चंबा की तरफ जाने पर एक तरफ गहरी घाटी में टिहरी बांध का पानी दिखता है तो दूसरी तरफ ऊंचे पहाड़। रास्ते में एक जगह चाय पीने बैठे। स्थानीय लोगों ने बताया कि हमारे यहां से बिजली निकालते हैं और हमें ही दुगनी रेट पर मिलती है। पहाड़ों पर पानी पहुंचाने से लेकर आटा चक्की तक के लिए बिजली चाहिए। लकड़ी काटने या वेल्डिंग मशीन वाले को बिजली न आने पर भूखे रहना पड़ता है। बाबाओं के आश्रम भी बिजली से ही चलते हैं। चंबा में कंप्यूटर संचालक का रोना था कि अगर बिजली आए तो कुछ धंधा हो। वहीं एक अखबार में छपा था कि उत्तराखंड सरकार अब पच्चीस से पांच सौ मेगावाट के बीच छोटी पनबिजली परियोजनाएं लेकर आएगी। क्या यह ऐसा बिंदु हो सकता है जिसे संत समाज स्वीकार करे, पर्यावरणविदों को एतराज नहीं हो और विकास की राजनीति करने वालों की बात भी बनी रहे?

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