सरकार के उपेक्षा की शिकार गंगा

Submitted by Hindi on Wed, 06/20/2012 - 11:24
Source
शुक्रवार, जून 2012
सामाजिक कार्यकर्ता भरत झुनझुनवाला द्वारा दायर की गई आरटीआइ से पता चला है कि उत्तराखंड सरकार ने गंगा और उसकी सहायक नदियों में 557 बांधों का निर्माण करने की योजना बनाई है। ये बांध जंगल, खेत व चारागाह सबको लील जाएंगे। टिहरी बांध ने पूर्व में काफी तबाही मचाई है और सन 1970 से हुए बांध विस्थापितों को सरकार आज तक पुनर्स्थापित नहीं कर पाई है। इन सबके बावजूद उत्तराखंड सरकार बांध निर्माण अभियान में पूरी तरह जुटी हुई है। सरकार जल संरक्षण योजनाएं विकसित करने की बजाय बस बांध बनाए जा रही है जो नाजुक इकॉलॉजी को बिगाड़ रहे हैं।

17 अप्रैल को बैठक में किसी भी प्रदेश के मुख्यमंत्री ने गंगा पर बनाए जा रहे बांधों का विरोध नहीं किया। कहने के लिए भले ही इन राज्यों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगे हुए हैं, लेकिन उनके रखरखाव को लेकर राज्य सरकारों की लापरवाही भी किसी से छिपी नहीं है। इनमें से अधिकांश या तो खराब पड़े होते हैं या फिर बिजली की अनुपलब्धता के चलते बंद पड़े होते हैं। सरकार की नजर उस गंगाभक्त पर भी नहीं गई, जो गंगा में हो रहे खनन को लेकर दो महीने से ज्यादा समय से आमरण अनशन पर था और अंततोगत्वा अपने प्राण गंवा बैठा।

देश की करीब 40 प्रतिशत आबादी के जीवन का आधार गंगा नदी बेसिन है, लेकिन गोमुख से निकलने वाली गंगा का पानी ऋषिकेश और हरिद्वार से उतरते ही पीने योग्य नहीं रह जाता। कानपुर, इलाहाबाद और वाराणसी होते हुए गंगा जब पटना पहुंचती है तो वह इंसान के नहाने के लायक भी नहीं रह जाती। सिर्फ गंगा ही नहीं, बल्कि उसकी प्रमुख सहायक नदी यमुना और काली, कृष्णा, गोमती, दामोदर, पांडु, पांवधोई, मंदाकिनी, सई, आमी आदि की स्थिति भी गंभीर है। वाराणसी में कहने के लिए गंगा, वरुणा, नाद, पीली और असि नदियां हैं, लेकिन इनमें से महज गंगा और वरुणा का ही अस्तित्व बचा हुआ है, शेष विलुप्त हो चुकी हैं। गंगा को लेकर पर्यावरणविदों, समाजसेवियों, संतों और राजनीतिज्ञों द्वारा की गई अपीलें, अनशन, यात्रा, उपवास सब अभी तक निरर्थक साबित हुए हैं। 1985 में राजीव गांधी द्वारा बनाए गए ‘गंगा एक्शन प्लान’ से लेकर फरवरी 2009 में बनाए गये ‘राष्ट्रीय गंगा बेसिन अथॉरिटी’ तक गंगा को प्रदूषण-मुक्त कराने में सरकार जितने रुपए बहा चुकी है, उससे कहीं ज्यादा गंगा में गंदगी घुल चुकी है।

सीएजी (कैग) की रिपोर्ट बताती है कि गंगा और उसकी सहायक नदियों में पानी की गुणवत्ता बरकरार रखने के लिए 15 साल से अधिक समय में 901.71 करोड़ रुपये खर्च किए जाने के बाद भी लक्ष्य प्राप्ति की कोई आशा नजर नहीं आ रही है। गंगा में प्रथम श्रेणी के 29 शहरों (जिनकी आबादी एक लाख से अधिक है), द्वितीय श्रेणी के 23 शहरों (जिनकी आबादी 50 हजार से एक लाख के बीच है) और 48 कस्बों का म्युनिसिपल सीवेज डाला जाता है। गंगा और उसकी सहायक नदियों से सटे शहरों में प्रतिदिन लगभग 50,440 लाख लीटर सीवेज उत्पन्न होता है। गंगा के प्रति केंद्र सरकार सचमुच कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि उसने जिस राष्ट्रीय गंगा बेसिन प्राधिकरण को बनाया है, उसके लिए वह बीते तीन साल में महज तीन बैठकों के लिए ही समय निकाल पाई है।

17 अप्रैल को प्राधिकरण की तीसरी बैठक में इसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने स्वयं माना था कि गंगा में प्रतिदिन गिराए जाने वाले 290 करोड़ लीटर गंदे पानी में से सिर्फ 110 करोड़ लीटर पानी का शोधन हो पाता है। गंगा में बढ़ते प्रदूषण के लिए राज्य सरकारों को जिम्मेदार ठहराते हुए उन्होंने अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की, वहीं दूसरी ओर पांच राज्यों की ओर से गंगा को गंदगी से मुक्ति दिलाने के लिए कोई ठोस प्रारूप पेश नहीं किया। अथॉरिटी की उस बैठक में शामिल होने के लिए सिर्फ उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड के ही मुख्यमंत्री शामिल हुए। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को शायद गंगा का मुद्दा इतना गंभीर नहीं लगा होगा, इसीलिए उनकी तरफ से उनके वित्त मंत्री अमित मित्रा ही औपचारिकता निभाने के लिए पहुंचे।

इस बैठक में किसी भी प्रदेश के मुख्यमंत्री ने गंगा पर बनाए जा रहे बांधों का विरोध नहीं किया। कहने के लिए भले ही इन राज्यों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगे हुए हैं, लेकिन उनके रखरखाव को लेकर राज्य सरकारों की लापरवाही भी किसी से छिपी नहीं है। इनमें से अधिकांश या तो खराब पड़े होते हैं या फिर बिजली की अनुपलब्धता के चलते बंद पड़े होते हैं। उत्तराखंड की पूर्ववर्ती भाजपा सरकार ने गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए ‘स्पर्श गंगा अभियान’ चलाकर इसकी ब्रांड एंबेसडर हेमा मालिनी को बनाया था, लेकिन दूसरी तरफ गंगा में हो रहे खनन को लेकर उसने आंख मूंद रखी थी। सरकार की नजर उस गंगाभक्त पर भी नहीं गई, जो गंगा में हो रहे खनन को लेकर दो महीने से ज्यादा समय से आमरण अनशन पर था और अंततोगत्वा अपने प्राण गंवा बैठा।

न्यायालय के आदेश के बावजूद आज भी उन तमाम शहरों से गंगा में कल-कारखानों का कचरा, चमड़ा फैक्ट्रियों का गंदा पानी, केमिकल आदि सीधे गिराया जा रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा 1985 में शुरू किया गया। ‘गंगा एक्शन प्लान’ सरकारी भ्रष्टाचार की गंदगी में समाहित हो चुका है और उस गंदगी ने गंगा को और गंदा कर दिया है। कानपुर में, जहां गंगा सबसे दयनीय हालत में होती है, 800 से ज्यादा चमड़े की फैक्टरियां पहले की तरह आज भी हर रोज गंगा को दूषित कर रही हैं। गंगा में प्रदूषण की जब बात चलती है तो अक्सर गंगोत्री से लेकर हरिद्वार, कानपुर, इलाहाबाद और पटना जैसे बड़े शहरों के प्रति ही चिंता प्रकट की जाती है मगर गंगा किनारे बसे छोटे शहरों और कस्बों के प्रदूषण को नजरंदाज कर दिया जाता है।

गंगा के किनारे विचारमग्न स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंदगंगा के किनारे विचारमग्न स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंदमेरठ का मखदूमपुर हो या बिजनौर का नरौरा या फिर कन्नौज और फर्रुखाबाद जैसे शहर, यहां के घाटों और जल की स्थिति पर चर्चा नहीं की जाती। क्या इनकी गंदगी से गंगा अप्रभावित रहती हैं? केंद्र सरकार गंगा की गंदगी को दूर करने के लिए अब राष्ट्रीय गंगा आयोग बनाने का नया सगूफा छोड़ रही है। केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्री जयंती नटराजन लोकसभा को भरोसा दिला रही हैं कि वे राज्य सरकारों के साथ मिलकर नए सिरे से कार्य योजना तैयार करेंगी। गंगा को प्रदूषण-मुक्त करने के लिए राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन मैनेजमेंट प्लान भी तैयार किया गया है। इसके अलावा ‘गंगा नॉलेज सेंटर’ बनाकर लोगों के साथ गंगा संरक्षण संबंधी जानकारियां साझा करने की योजना भी है। गंगा नदी पर बने जल विद्युत संयंत्रों की क्षमता में कटौती का भी जयंती नटराजन ने आश्वासन दिया है।

उनका मंत्रालय गंगा पर बने जल विद्युत संयंत्रों की क्षमता में कटौती करने की वैधानिकता का अध्ययन भी कर रहा है। सब है, मगर कागजों पर ज्यादा है, वक्तव्यों में ज्यादा है। ये नौकरशाही तौर-तरीका है। जिनसे लोगों को उलझा दिया जाता है। उधर जल कार्यकर्ता भरत झुनझुनवाला द्वारा दायर की गई आरटीआइ से पता चला है कि उत्तराखंड सरकार ने गंगा और उसकी सहायक नदियों में 557 बांधों का निर्माण करने की योजना बनाई है। इसके विपरीत अपनी ही सरकार द्वारा दी गई जानकारी को झुठलाते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री नारायण सामी इस आंकड़े को झुठलाते हैं। वे सिर्फ पूर्व में बन चुके तीन बांधों और 11 बांधों के निर्माणाधीन होने की बात करते हैं।

उधर मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त राजेंद्र सिंह के अनुसार उन्होंने हाल ही में उत्तराखंड की यात्रा के दौरान पाया कि अलकनंदा, मंदाकिनी और भागीरथी पर 39 बांध प्रस्तावित हैं जबकि आठ बांधों पर काम चल रहा है, वहीं आठ बांध पहले से ही तैयार हो चुके हैं। बांधों की संख्या में की जा रही बाजीगरी को इस तरह समझा जा सकता है कि नारायण सामी के आंकड़ों से इतर वन एवं पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन इस समय 14 बांधों के प्रोजेक्ट पर काम चलने और 39 बांध प्रस्तावित होने की बात करती हैं। इससे जाहिर है कि इस सरकार के एक हाथ को दूसरा क्या कर रहा है, इसका पता ही नहीं है, तो क्या करेगी यह गंगा की सफाई?

Disqus Comment

More From Author

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

नया ताजा