ग्लोबल वार्मिंग और जन स्वास्थ्य

Submitted by Hindi on Wed, 06/20/2012 - 12:18
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नेशनल दुनिया (कायाकल्प पत्रिका), 08 जून 2012

डेंगू प्रसार के लिए जिम्मेदार मच्छर पहले समुद्रतल से 1000 मीटर से ज्यादा की ऊंचाई पर नहीं पाये जाते थे, लेकिन वातावरण में हुई ताप वृद्धि के बाद अब ये कोलम्बिया के एन्डिम पर्वतों पर भी पाए जाते हैं। वैश्विक तापक्रम बढ़ने से पृथ्वी पर रोगों का बोझ भी बढ़ना तय है। इसलिये जनस्वास्थ्य की चिंता करने वाले लोगों को सेहत के साथ-साथ प्रकृति और पृथ्वी की भी चिंता करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिये कि विकास की आपाधापी में प्रकृति का बुरा हाल नहीं होना चाहिये।

वातावरण में बढ़ते तापमान के कारण ऐसे कई रोग जो पहले ऊष्णकटिबंधीय इलाकों तक सीमित थे, का विस्तार अब अपेक्षाकृत ठंडे क्षेत्रों में भी हो रहा है। सामान्य तौर पर तापमान और उच्च आर्द्रता स्तर रोग वाहकों के भौतिक क्षेत्र में विस्तार को सहयोग करता है। इसके कारण मलेरिया, डेंगू ज्वर, पीतज्वर, विषाणु जनित मस्तिष्क शोध जैसे रोगों के प्रसार की संभावना बढ़ जाती है। उदाहरण के लिये डेंगू बुखार के प्रसार के लिये जिम्मेदार मच्छर पहले समुद्रतल से 1000 मीटर से ज्यादा की ऊंचाई पर नहीं पाये जाते थे, लेकिन वातावरण में हुई ताप वृद्धि के बाद अब ये कोलम्बिया के एन्डिम पर्वतों पर (लगभग 2200 मीटर की ऊंचाई पर) पाए गए हैं। पिछले कुछ वर्षों से ये इंडोनेशिया में भी पाए जा रहे हैं जबकि यह क्षेत्र मलेरिया और डेंगू मच्छरों से अब तक मुक्त था। मौसम की प्रचंड स्थिति जैसे मूसलाधार बारिश में सूखा रोग भी प्रकोप की स्थिति उत्पन्न कर देती है। विशेषकर ऐसे इलाके जहां रोगों के उपचार और बचाव के इंतजाम अपर्याप्त है वहां स्थिति और विकट होती है।

जलवायु परिवर्तन और मच्छर जनित रोग


सब जानते हैं कि मच्छर एक भयानक रोग वाहक है। यह अनेक घातक रोगों के प्रसार के लिये जिम्मेदार होता है। मच्छरों से होने वाले डेंगू, मलेरिया, कालाजार, मस्तिष्क शोथ, फाइलेरिया, रिफ्ट वैली बुखार, रॉस रिवर बुखार, पश्चिमी नील विषाणु, जापानी मस्तिष्क शोथ आदि प्रमुख हैं। मच्छर तापमान के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं। मलेरिया वाहक मच्छर आमतौर पर 16 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान को सहन नहीं कर पाते। डेंगू के प्रसार के लिए जिम्मेदार मच्छर की प्रजाति शरद ऋतु में 10 डिग्री सेल्सियस तापमान से नीचे जीवित नहीं रह पाते। ऐसा ही 40 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान पर मच्छरों के जीवित रहने की सम्भावनाएं भी नहीं बचती। यदि वातावरण में पर्याप्त नमी हो तो अपेक्षाकृत गर्म तापमान में मच्छरों की संख्या उनके काटने की दर और सक्रियता में वृद्धि हो जाती है। इसके चलते होने वाले रोग भी बढ़ जाते हैं।

मच्छरमच्छरनये शोध बताते हैं कि वातावरण का तापमान यदि 1 से 2 डिग्री सेल्सियस भी बढ़ गया तो हर साल 5 से 8 करोड़ नये मलेरिया रोगी बीमारों की कतार में जुड़ जाएंगे। यह भी संकेत हैं कि वातावरण में बदलाव एवं ताप वृद्धि से उच्च अक्षांश वाले इलाकों में भी मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया जैसे मच्छर जनित रोगों के वृद्धि की संभावना है। फिलहाल दुनिया की 45 फीसद आबादी ऐसे जलवायु मंडल में निवास करती है जहां मलेरिया एवं मच्छर जनित रोगों की संभावना ज्यादा है।

बदलती जलवायु और डेंगू


डेंगू भी मच्छरों से फैलने वाला जानलेवा रोग है। पिछले कुछ सालों में यह एक अंतर्राष्ट्रीय जनस्वास्थ्य समस्या बन कर उभरा है। यह रोग दुनिया के ऊष्णकटिबंधीय एवं ऊपोष्ण क्षेत्रों में पाया जाता है। इसके लक्षणों में ज्वर, पित्तियां, मांशपेशियां, जोड़ों में दर्द तथा शरीर में कमजोरी महसूस होती है। कभी-कभी यह रोग डेंगू हेमोरेजिक फीवर या डेंगू रक्त ज्वर के रूप में घातक भी हो जाता है। डेंगू रक्त ज्वर सबसे पहले 1950 ई. में फिलीपींस और थाईलैंड में देखा गया था। इसमें शरीर के अंदर रक्तस्राव, प्रघात आदि के कारण कभी-कभी रोगी की मृत्यु भी हो जाती है। डेंगू का खतरा इतना ज्यादा है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इसके लिये वैश्विक अलर्ट जारी किया हुआ है। संगठन के आकलन के अनुसार हर साल दुनिया में कोई 5-6 करोड़ लोग इस रोग की चपेट में आकर जान गवां देते हैं। इस रोग का वाहक एक खास मच्छर एब्रीज इजिप्टाई है जो ठंड नहीं झेल पाता और गर्मी के खत्म होने और बरसात के शुरू होने पर अपना तांडव दिखाता है। मच्छर की यह प्रजाति अच्छी वर्षा वाले क्षेत्रों में पनपती है।

वैश्विक तापवृद्धि और श्वसन संबंधी रोग


आम आदमी को यह प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं पड़ता कि ग्लोबल वार्मिंग से श्वसन तंत्र संबंधी समस्याएं भी तेजी से बढ़ रही है। देखा जा रहा है कि वातावरण में तापवृद्धि से उत्पन्न धूल कणों के कारण श्वास एवं फेफड़े संबंधी रोग तेजी से बढ़ रहे हैं। वायुमंडल में गर्मी बढ़ने से स्स्पेंडेड पर्टिकुलेट मैटर (एसपीएम) की मात्रा बढ़ कर खास संबंधी समस्याएं उत्पन्न कर रही है। इसके साथ-साथ पराग, धुएं, मिट्टी, फफूंद, राख अन्य रसायनिक पदार्थ हवा में तैर कर लोगों के श्वास में जाकर अनेक घातक रोग उत्पन्न कर रहे हैं। उच्च तकनीक के नाम पर स्प्रे पेंट, रसायनिक उद्योग, मोटर गाड़ी, धुंए आदि एसपीएम के बड़े स्रोत हैं। ये इतने हल्के होते हैं कि तैर कर श्वास के माध्यम से मनुष्य के फेफड़े को रोगग्रस्त कर देते हैं। इससे श्वास के रोग, दमा, फाइब्रोसिस, फेफड़े का कैंसर आदि हो रहे हैं।

एरोसॉस


एरोसॉस किसी गैस में निलंबित ठोस द्रव के सूक्ष्म कणों को कहते हैं। ये प्राकृतिक भी हो सकते हैं। प्राकृतिक एरोसॉस में ज्वालामुखी, धूल, जंगल या घास के मैदानों की आग आदि से उत्पन्न गैस होते हैं। ऐसे ही उद्योग, मोटर गाड़ी, जीवाष्मों को जलाने आदि से भी एरोसॉस हवा में तैरते रहते हैं। ये सूक्ष्म कणों के रूप में मनुष्य के शरीर में पहुंच कर कई मुसीबतें खड़ी कर सकते हैं। जैसे खांसी, छाती में जलन, फेफड़े तकलीफ, कमजोरी, दमा, दिल के दौर आदि रोग उत्पन्न कर सकते हैं।

विविक्त काला कार्बन


हम जानते हैं कि ग्रीन हाउस गैसों में कार्बन डाइऑक्साइड मिथे, नाइट्रस ऑक्साइड, जलवाष्प और अन्य संघटक सम्मलित होते हैं। काला कार्बन काले धुंए का प्रमुख संघटक है। यह काला तत्व निर्माण कार्य से जुड़ी मशीनों बसों, ट्रकों, जेनरेटरों, फैक्ट्री के धुंए या डीजल गाड़ियों से निकलता है। आज के ग्लोबल वार्मिंग में लगभग 47 योगदान कार्बन डाइऑक्साइड, 16 प्रतिशत काला कार्बन, 14 प्रतिशत मिथेन तथा 4 प्रतिशत नाइट्रस ऑक्साइड का है। वातावरण में गर्मी के बढ़ने की वजह से वर्षा का अम्लीकरण, समुद्र स्तर में वृद्धि, तटिय क्षेत्रों में जलाप्लावन तथा कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव सम्मलित है।

विद्युत क्षेत्रों में परिवर्तन


सर्द हवाओं, टाइफन और बर्फीले तूफानों से पहले वायु मंडलीय विद्युत क्षेत्रों में बदलाव तंत्रिका और श्वसन तंत्र से संबंधित रोगों को प्रमुखता से बढ़ाता है। इसमें काली खांसी, दमा, खास नली का शोथ, गले में खराश, जोड़ों का दर्द और रीढ़ की हड्डी के रोग शामिल हैं। इस तरह के मौसमी परिस्थितियों में पाचन संबंधी रोग जैसे दस्त और पेचिस भी प्रबल होते हैं। गर्म और नम वातावरण मच्छर, मक्खियों, चूहों, कीटों जैसे रोग वाहकों और जीवाणुओं की वृद्धि के लिये भी अनुकूल होता है। स्पष्ट है कि वैश्विक तापक्रम बढ़ने से पृथ्वी पर रोगों का बोझ भी बढ़ना तय है। इसलिये जनस्वास्थ्य की चिंता करने वाले लोगों को सेहत के साथ-साथ प्रकृति और पृथ्वी की भी चिंता करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिये कि विकास की आपाधापी में प्रकृति का बुरा हाल नहीं होना चाहिये।

(लेखक राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त होम्योपैथी चिकित्सक हैं)

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