अपने उद्गम पर बेदम शिप्रा नदी

Submitted by Hindi on Thu, 06/28/2012 - 08:44
Source
जनसत्ता, 25 जून 2012
मानव समाज विकास के अंधी दौड़ में इतना पागल हो गया है कि अपने जीवनदायिनी नदियों को खत्म करता जा रहा है। जो नदियां कभी मानव समाज तथा जंगलों को अपने जल से सिंचती थीं आज अपने अस्तित्व को बचाने में लगी हैं। इसी तरह हल्द्वानी में बरसाती नदी शिप्रा अपने उद्गम स्थल श्यामखेत में ही आबादी वाले इलाके के रूप में बदल चुकी है। इन छोटे-छोटे बरसाती नदियों के वजह से ही बड़ी नदियों में हमेशा पानी रहता है। लोगों के विकास की कीमत चुका रही शिप्रा नदी के बारे में बताते अंबरीश कुमार।

जिस संकट से अल्मोड़ा कई सालों से गुजर रहा है वह संकट झीलों के शहर नैनीताल और आसपास मंडराने लगा है। नैनीताल की झील का पानी कई फुट नीचे आ चुका है तो दूसरी झीलों का पानी भी घट रहा है। अंधाधुंध निर्माण के कारण पानी के स्रोत घटते जा रहे हैं। ऐसे में शिप्रा नदी को अगर नहीं बचाया गया तो अगला नंबर दूसरी नदियों का होगा।

श्यामखेत। हल्द्वानी से करीब चालीस किलोमीटर यह जगह शिप्रा नदी का उद्गम स्थल है पर अब यह आबादी वाले इलाके में बदल चुकी है और नदी को धकेल कर किनारे कर दिया गया है। अब इसे नदी तभी कहा जा सकता है जब भारी बरसात के बाद सभी नदी नालों और गधेरों का पानी इसमें समा जाए। वर्ना नदी के आगे फोटो में जो बोर्ड लगा है उसे देख लें और बोर्ड के पीछे नदी को भी तलाशने का प्रयास करें। यह बोर्ड इस नदी के दम तोड़ने की कहानी बता देता है। श्यामखेत से करीब पच्चीस किलोमीटर दूर खैरना के पास यह दूसरी पहाड़ी नदी से मिलकर कोसी में बदल जाती है। पर इससे पहले का शिप्रा नदी का सफर और उसकी बदहाली को समझने के लिए श्यामखेत आना पड़ेगा। इस नदी की मूल धारा जहां से गुजरती थी वह कंक्रीट की सड़क बन चुकी है और जो खेत थे वे पाश इलाके में बदल चुके हैं। ऊंची कीमत पर पहले जमीन बिकी फिर उन पर आलीशान घर बना दिए गए।

श्यामखेत के संजीव कुमार ने कहा -करीब दस साल पहले तक इस नदी में लगभग पूरे साल कई जगह छह फुट से ज्यादा पानी होता था और बरसात में तो इसकी बाढ़ से सड़क के ऊपर पानी बहता था। पर लोगों ने इस नदी के नीचे पत्थरों को निकाल कर सड़क से लेकर घर तक में इस्तेमाल किया और इसकी धारा भी घुमा दी गई। इस वजह से धीरे-धीरे इसमें पानी कम होने लगा तो लोगों ने इसे कूड़ेदान में बदल दिया। श्यामखेत घाटी में बसा है और चारों तरफ चीड़, देवदार और बांस के घने जंगल हैं। आस-पास की पहाड़ियों का सारा पानी इसी नदी में आकर इसे समृद्ध करता रहा है। पर विकास के नाम पर पहाड़ से गिरने वाले नालों और झरनों पर भी अतिक्रमण हुआ और पानी के ज्यादातर स्रोत धीरे-धीरे बंद होते गए। भवाली में प्रशासन ने रही सही कसर इस नदी के दोनों किनारों को बांध कर पूरी कर दी।

भवाली से गुजरें तो एक बड़ा सा नाला नजर आता है और इसमें कूड़े करकट के साथ नाली का पानी बहाया जाता है। पर यह दरअसल शिप्रा नदी है जो अब नाले में बदल चुकी है और नाला भी अतिक्रमण का शिकार है। कुमाऊं में जिस तरह से पानी के परंपरागत स्रोतों, बरसाती नालों और गधेरों को बंद किया जा रहा है, वह एक बड़े संकट का संकेत भी दे रहा है। जिस संकट से अल्मोड़ा कई सालों से गुजर रहा है वह संकट झीलों के शहर नैनीताल और आसपास मंडराने लगा है। नैनीताल की झील का पानी कई फुट नीचे आ चुका है तो दूसरी झीलों का पानी भी घट रहा है। अंधाधुंध निर्माण के कारण पानी के स्रोत घटते जा रहे हैं।

ऐसे में शिप्रा नदी को अगर नहीं बचाया गया तो अगला नंबर दूसरी नदियों का होगा। इस अंचल में कई छोटी-छोटी बरसाती नदियां हैं, जो बड़ी नदियों की जीवनरेखा की तरह काम करती है। लेकिन अब शिप्रा जैसी कई बरसाती और छोटी नदियां संकट में हैं। इन नदियों से बड़े-बड़े पत्थर और बालू हटा देने की वजह से पानी नीचे रिस जाता है जिसका असर उन नदियों पर पड़ता है जिनमें मिलकर ये उसे समृद्ध करती हैं। गढ़वाल की तरफ जहां बड़ी नदियां ग्लेशियर से निकलती हैं वहीं इस तरफ प्राकृतिक स्रोतों से। पानी के परंपरागत स्रोतों पर अतिक्रमण होने से यह संकट काफी बढ़ता नजर आ रहा है।

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