रियो+20 के नतीजों से महिला संगठन निराश

Submitted by Hindi on Mon, 07/02/2012 - 11:29

दुनियाभर में महिलाओं में गुस्सा है कि सरकारें महिलाओं के रिप्रोडक्टिव राइट्स को जेंडर समानता और टिकाऊ विकास के लिये आवश्यक नहीं मान पायी हैं। रियो+20 के जिस दस्तावेज को राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों ने अंगीकार किया है उसमें इस बारे में कोई उल्लेख नहीं है, जबकि दुनियाभर में रिप्रोडक्टिव राइट्स को मानवाधिकारों का हिस्सा माना जाता है। ब्राजील के महिला संगठनों की एक सदस्य ने कहा कि ब्राजील में तो महिला अधिकारों के बारे में पहली बार इतनी बहस हो रही है।

रियो द जनीरो: दुनियाभर के 200 से ज्यादा महिला संगठनों के मेजर ग्रुप (डब्ल्यूएमजी) ने टिकाऊ विकास को लेकर संयुक्त राष्ट्र के रियो+20 सम्मेलन के नतीजों पर निराशा और क्षोभ प्रकट किया है। सम्मेलन के दो दिन बाद 24 जून को रियो में जारी अपने बयान में डब्ल्यूएमजी ने कहा कि विश्व की सरकारें महिलाओं, भावी पीढ़ियों और संवेदनशील धरती की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पायी हैं। रियो+20 सम्मेलन के दौरान विशेष रूप से सक्रिय महिला ग्रुप वीमेन इन यूरोप फॉर ए कॉमन फ्यूचर (डब्ल्यूईसीएफ) की कार्यकारी निदेशक सस्का गैबीजॉन ने कहा कि दो साल की मेहनत के बाद रियो+20 सम्मेलन सम्भव हो पाया लेकिन दुर्भाग्य से महिला अधिकारों और टिकाऊ विकास की प्रक्रिया में भावी पीढ़ियों के बारे में कुछ हासिल नहीं हो पाया। महिलाओं ने दिन-रात अपने अधिकारों के लिये काम किया लेकिन भविष्य के लिये कुछ हासिल नहीं हो पाया।

उन्होंने कहा कि यह अत्यंत दुख का विषय है कि रियो+20 सम्मेलन में जो स्वागत वाला बिलबोर्ड लगा था उसमें सबसे बड़ी तेल और हाइड्रो कम्पनियों में से एक ‘पेत्रोबास’ का ‘लोगो’ लगा था। यह इसलिये कहना पड़ रहा है क्योंकि तेल क्षेत्र की कम्पनियां टिकाऊ विकास की अवधारणा के ठीक विपरीत काम कर रही हैं। रियो+20 सम्मेलन के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका में रहे दूसरे ग्रुप ‘डेवलपमेंट अल्टरनेटिव्स विद वीमेन फॉर ए न्यू एरा’ (डॉन) की कार्यकारिणी सदस्य अनीता नायर ने कहा कि टिकाऊ विकास की अवधारणा में रिप्रोडक्टिव राइट्स के महत्व को स्वीकार न किया जाना निराशाजनक है। दुनियाभर में महिलाओं में गुस्सा है कि सरकारें महिलाओं के रिप्रोडक्टिव राइट्स को जेंडर समानता और टिकाऊ विकास के लिये आवश्यक नहीं मान पायी हैं। रियो+20 के जिस दस्तावेज को राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों ने अंगीकार किया है उसमें इस बारे में कोई उल्लेख नहीं है, जबकि दुनियाभर में रिप्रोडक्टिव राइट्स को मानवाधिकारों का हिस्सा माना जाता है।

ब्राजील के महिला संगठनों की एक सदस्य ने कहा कि ब्राजील में तो महिला अधिकारों के बारे में पहली बार इतनी बहस हो रही है; जबकि समाज, आर्थिकी और विकास में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। रियो+20 सम्मेलन के दौरान महिलाओं के रिप्रोडक्टिव राइट्स पर प्रेस और मीडिया ने काफी ध्यान दिया है। इस सबके बावजूद सच तो यही है कि ब्राजील सहित अधिकतर लातिन अमेरिकी देशों में रिप्रोडक्टिव राइट्स जैसी कोई चीज नहीं है।

गैबीजोन ने कहा कि रियो+20 सम्मेलन में सरकारों को गरीबी दूर करने और पर्यावरण क्षरण को रोकने, समाज के सबसे कमजोर तबकों के हितों की सुरक्षा के लिये तथा महिलाओं के अधिकारों को लागू करने के सम्बंध में साहस भरे कदम उठाने का मौका मिला था लेकिन उन्होंने इसे गवां दिया। साहस भरे कदम नहीं उठाये जाने से अब गरीबी, असमानता और पर्यावरण को नुकसान बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।

उन्होंने कहा कि रियो+20 ने हमें ऐसा कोई रास्ता नहीं दिखाया है जो पैराडाइम शिफ्ट की ओर ले जाये, जबकि धरती पर मानवता को बचाने के लिये ऐसा जरूरी है। गैबीजोन ने जोर देकर कहा कि टिकाऊ समाज के लिये जरूरी है कि प्रकृति और संस्कृति को बिकाऊ न समझा जाय। यह भी जरूरी है कि महिलाओं, आदम समाजों अर्थात आदिवासियों इत्यादि के मानवाधिकार संरक्षित रहें। उन्होंने कहा कि तमाम मानवाधिकार प्रकृति के सानिध्य में ही फलफूल सकते हैं और ऐसी ही स्थितियों वाला भविष्य हमें चाहिये।

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सुरेश नौटियालसुरेश नौटियालपत्रकारिता के विभिन्न आयामों और पक्षों के जीवन्त रूप सुरेश नौटियाल कलम को हथियार ही मानते हैं। खुशहाल और अपने सपनों के उत्तराखण्ड के साथ-साथ धरती की सुन्दर पारिस्थितिकी के

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