ओडिशा के आदिम निवासियों का संघर्ष

Submitted by Hindi on Fri, 07/06/2012 - 16:27
Source
सप्रेस/थर्ड वल्र्ड नेटवर्क फीचर्स, 06 जुलाई 2012

प्रभावशाली लोगों द्वारा हथियाई गई जमीनों को वापस लेना बड़ी चुनौती है क्योंकि वे न्यायालय के आदेशों के बावजूद अभी इसके लिए तैयार नहीं हैं। औद्योगिकरण एवं खनन को प्रोत्साहन देने में सरकार एवं उद्योग के बीच का गठजोड़ आदिवासी समुदाय की जीविका पर लगातार संकट खड़े कर रहा है।

केओंझार उड़ीसा के सबसे निर्धन जिलों में से एक है। यह घने जंगलों एवं दुर्गम रास्तों से अटा पड़ा है व प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं भी यहां कमोवेश अनुपस्थित हैं तथा गांव मुख्य सड़कों से जुड़े हुए भी नहीं हैं। जुआंग और भुयान यहां निवास करने वाली दो आदिम जनजातियां हैं। अपनी जीविका के लिए ये मुख्यतया कृषि और वन आधारित खाद्य उत्पादों पर निर्भर हैं। ये पीढि़यों से झूम खेती कर रहे हैं और अपने स्थानीय पारम्परिक ज्ञान पर विश्वास रखते हैं। लेकिन खेती के आधुनिक तरीके अपनाने की वजह से ये अपना पारम्परिक ज्ञान भूलते जा रहे हैं।

औद्योगिकीकरण और विकास परियोजनाओं के क्रियान्वयन से इन आदिवासी समुदायों पर जबरदस्त नकारात्मक प्रभाव पड़ा है और उनके भूमि एवं वन संसाधनों संबंधित अधिकारों को नकारा जा रहा है। झूठे वायदे करके समृद्ध एवं शक्तिशाली कंपनियां इस क्षेत्र में मौजूद लौह अयस्क, स्फटिक, चूना पत्थर, मैंगनीज आदि खनिज पदार्थों को हथिया लेना चाहती हैं। इससे यहां की मिट्टी, पानी के स्त्रोतों और वनों पर भी विपरीत प्रभाव पड़ रहा है।

सरकार ने तो समूचा जोड़ा विकासखंड ही 48 कंपनियों को समर्पित कर लाखों हेक्टेयर भूमि खनन के लिए इन्हें सौंप दी है। वर्तमान में कुल भूमि में से 10 प्रतिशत से अधिक पर खेती संभव नहीं है। इसी तरह पूरा गंद्यमर्दन पर्वत श्रृंखला भी जिसके अंतर्गत जिले के बांसपाल, हरिचंदनपुर, तेलकोई एवं झूमपुरा विकासखंड आते हैं, में रहने वाले हजारों आदिवासी परिवारों की कीमत पर, इन कंपनियों को खनन के लिए सौंप दी गई है। इसके परिणामस्वरूप जो समुदाय इन पहाडि़यों पर झूम खेती और सदाबहार जलस्रोतों पर निर्भर थे, वे प्रभावित हुए हैं।

इसके अलावा अवैध भूमि हस्तांतरण, वाणिज्यिक वृक्षारोपण गतिविधियों एवं बड़े पैमाने पर हो रहे वन विनाश से भूमिहीनता, पर्यावरणीय प्रदूषण एवं समुदायों का विस्थापन हुआ है। इससे कृषि से जीविका चलाने पर भी बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। भूमिहीन होने के बाद उन्हें अब उद्योगों में भी काम नहीं मिल पा रहा है क्योंकि वे उस तरह के काम में कुशल नहीं हैं। औद्योगिकीकरण की वजह से जिले में गरीबों एवं अमीरों के बीच की खाई भी बढ़ रही है। व्यापक औद्योगिकीकरण से क्षेत्र में पानी की कमी भी हो रही है साथ ही मिट्टी की नमी भी समाप्त होती जा रही है।

गैर कानूनी भूमि हस्तांतरण पर रोक :-


इस क्षेत्र में आदिवासी परिवारों की भूमि का गैर आदिवासियों को हस्तांतरण आम बात है। गैर सरकारी संगठनों के प्रयत्नों के परिणामस्वरूप 36 परिवारों ने मुकदमे दायर किए एवं उन्हें 24 एकड़ भूमि वापस मिली। इस बीच करीब 11581 किसानों ने भूमि अधिकार के लिए आवेदन किया। इसमें से 566 परिवारों को भूमि रिकार्ड में अपना नाम दर्ज करवाने में सफलता मिल पाई है। इसी तरह वन भूमि अधिकार अधिनियम के अंतर्गत परियोजना क्षेत्र के 1096 परिवारों एवं कुल क्षेत्र में 50544 परिवारों ने इस अधिनियम के अंतर्गत आवेदन किया है। करीब 48 ग्राम समुदायों ने समुदाय स्वामित्व के लिए भी आवेदन किया है। इसी तरह अन्य परियोजना क्षेत्रों में 122 जुआंग एवं अन्य आदिवासी परिवारों ने कुल 247 मामले दर्ज कराए है, जिनमें कि स्थानीय प्रभावशाली लोगों ने उनसे गैरकानूनी रूप से जमीने ले ली थी। कुल मामलों में से 180 में राजस्व न्यायालय ने जुआंग आदिवासी परिवारों के पक्ष में निर्णय दिया है। इस सबके बीच ओडिशा सरकार उड़ीसा अधिसूचित क्षेत्र आदिवासी अचल भूमि हस्तांतरण अधिनियम में परिवर्तन कर प्रभावशाली वर्ग को खुश करना चाहती है। लेकिन केओंझार और अन्य 11 अधिसूचित जिलों की स्थानीय स्वशासी संस्थाओं एवं गैर सरकारी संगठनों ने उनकी इस पहल पर वर्ष 2006 में लगाम लगा दी थी।

वन एवं पर्यावरण का संरक्षण


इस इलाके में वर्ष 1996 से वन संरक्षण को लेकर स्थानीय समुदायों ने अभियान चला रखा है। ये तस्करों से भी वनों की रक्षा करते हैं। समुदाय ने यहां बिना उपजाए भोजन (वनों से प्राप्त) की अनेक किस्मों की पहचान की है। इनमें 16 प्रकार की जड़ें, 33 पत्तियां, 46 फल, 18 मशरूम, 5 फूल एवं 11 प्रकार के कंद शामिल हैं। इससे प्राकृतिक वनों की अनिवार्यता का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। साथ ही ये जनजातीय समुदाय को कुपोषण एवं अन्य बीमारियों से भी बचाते हैं।

इस दौरान किसानों ने खनन के विरुद्ध आवाज उठाने का जोखिम उठाया है। खनन सर्वेक्षण के खिलाफ बुधिपाड़ा गांव में अभियान भी प्रारंभ हो गया है। अब ऐसे ही अभियान अन्य कई गांवों में भी प्रारंभ हो गए हैं और सरपंच जिला कलेक्टर को अपने गांव की असहमति के दस्तावेज सौंप रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप 80 आदिवासी नेताओं के खिलाफ पुलिस रिपोर्ट भी दर्ज हुई है। लेकिन जनता के विरोध के चलते सर्वेक्षण के कार्य को रोकना पड़ा है।

जिला वन विभाग ने जुआंग बहुसंख्य क्षेत्र में 4588 हेक्टेयर भूमि पर व्यावसायिक रोपण के लिए वर्ष 2007-08 में योजना बनाई थी। लेकिन ढाई हजार आदिवासियों द्वारा विरोध के कारण विभाग को पीछे हटना पड़ा। वन विभाग यहां युकिलिप्टिस, सागवान, बबूल (खैर) आदि लगाना चाह रहा था।

सुस्थिर कृषि को प्रोत्साहन


अधिग्रहण विरोधी अभियान एवं समानांतर संघर्ष को आदिवासी समुदायों द्वारा उनकी जमीन पर सुस्थिर जीविका चलाने के लिए भी सशक्त किया जा रहा है। परम्परागत कृषि प्रणाली की जानकारी बांटने के लिए ग्राम पंचायत, विकासखंड एवं जिला स्तर पर कार्यवाहियां की जा रही हैं। इस हेतु किसानों की कार्यशालाओं का आयोजन भी कर पारम्परिक खेती के महत्व को उजागर किया जा रहा है। अनेक किसान परम्परागत खेती को पुनः अपनाया भी है, जिससे इस इलाके में खाद्यसुरक्षा में भी वृद्धि हुई है।

इन सब गतिविधियों के कारण जुआंग और भुयान समुदाय अब अपनी समस्याओं से निपटने में सक्षम हो गए हैं। लेकिन अभी भी कई चुनौतियों का सामना करना शेष है। प्रभावशाली लोगों द्वारा हथियाई गई जमीनों को वापस लेना बड़ी चुनौती है क्योंकि वे न्यायालय के आदेशों के बावजूद अभी इसके लिए तैयार नहीं हैं। औद्योगिकरण एवं खनन को प्रोत्साहन देने में सरकार एवं उद्योग के बीच का गठजोड़ आदिवासी समुदाय की जीविका पर लगातार संकट खड़े कर रहा है। इसी प्रकार पुलिस की धमकियों के कारण स्थानीय पर्यावास को सहजने की गति भी धीमी पड़ती जा रही है। एक अन्य खतरा क्षेत्र में अवांछित लोगों की उपस्थिति से पैदा हुआ है, जोकि किसानों को स्वतंत्रतापूर्वक प्रशिक्षण गतिविधि चलाने और उनके घूमने-फिरने को प्रतिबंधित कर रहे हैं।

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