मिसाल : ललगड़ी की हरी गाड़ी

Submitted by Hindi on Fri, 07/27/2012 - 13:24
Source
दैनिक जागरण, 23 जुलाई 2012
नक्सल प्रभावित और अत्यंत पिछड़े राज्य में गिना जाने वाला झारखंड के लतेहार जिले का ललगड़ी एक मिसाल कायम की है। इस गांव में ग्रामीणों के आपसी समझदारी के कारण आज तक एक भी केस-मुकदमा नहीं हुआ है। ललगड़ी गांव में 69 प्रतिशत लोग पढ़े-लिखे हैं। जहां देश में सूखे का संकट मंडरा रहा है। लेकिन ललगड़ी में व्यवस्थित इंतजाम से साल भर चारों तरफ हरियाली छाई रहती है। पंचायत में लगा आर्थिक दंड का पैसा आरोपी के खिलाफ नहीं जाता बल्कि गांव के विकास कार्य में जाना एक मिसाल है।

ज्ञान-विज्ञान के इस दौर में बड़े-बड़े शहर आधुनिकता की चाहे जितनी डींगें हांकें, सघन रूप से नक्सल प्रभावित और अत्यंत पिछड़े क्षेत्र के रूप में पहचान बना चुके लातेहार का एक गांव ललगड़ी ने जो मिसाल कायम की है, उससे पूरी दुनिया को सीख लेनी चाहिए। लातेहार नगर से दस किलोमीटर दूर इस गांव के लोगों के बीच आजतक एक भी केस-मुकदमा नहीं होना, आधुनिक शहरों को भले ही अजीब लगे, लेकिन यही सच है। ऐसा संभव हो सका है ग्रामीणों की आपसी समझदारी के कारण। यदि कोई घटना-दुर्घटना हो भी जाती है तो वे मिल-बैठकर पंचायत के माध्यम से आपस में ही सुलझा लेने की जो परिपाटी कायम कर चुके हैं, सचमुच वह आदर्श ही है। यह प्रेरणादायक भी है।

इस गांव में 69 प्रतिशत लोग पढ़े-लिखे हैं, लेकिन यहां के निवासी मुखिया महज मैट्रिकुलेट हैं, जिन पर गांव वालों का असीम विश्वास, ऊंची पंचायतों यानी विधानसभा और लोकसभा के सदस्यों के लिए एक बानगी ही है कि कैसे हर किसी को संतुष्ट रखा जा सकता है। अक्सर मानसून की मार झेलने वाले इस राज्य के इस गांव ने आपसी समझदारी से सिंचाई की जो व्यवस्था कर ली है, वह बहुत बड़ी बात है। राज्य में हालांकि सिंचाई का पूरा महकमा बैठा है, किंतु वह विशेष कुछ कर नहीं पा रहा। क्रीम कहे जाने वाले आइएएस अधिकारी, ऊंची डिग्रियों वाले इंजीनियर आदि सभी भरे पड़े हैं, पैसे का भी टोटा नहीं, लेकिन सिंचाई की पूरी व्यवस्था की कौन कहे, जल छाजन के भी पर्याप्त उपाय नहीं किए जा सके।

ऐसे में ललगड़ी ने अपने यहां मुकम्मल इंतजाम कर सालों भर खेत हरे-भरे रखने की जो मिसाल कायम की है, उससे प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए अन्य गांवों को और सीख लेनी चाहिए जल संसाधन विभाग को। दस वर्ष पहले इस गांव में डायन-बिसाही के भी मामले उठते थे, लेकिन शिक्षा के प्रसार और जागरूकता की ललक ने अब यह सामाजिक कोढ़ खत्म कर दिया है। दूसरी ओर पूरे झारखंड में डायन-बिसाही के मामलों में 1250 से अधिक लोगों के मारे जाने की घटनाएं आगाह कर रही हैं कि ललगड़ी से सबक लें।

सबसे बड़ी बात यह कि यदि पंचायत में किसी को आर्थिक दंड भी लगाया जाता है तो वह इसके खिलाफ नहीं जाता। वह रकम ग्राम कोष में जमा कर सार्वजनिक कार्यों में खर्च कर देना भी एक मिसाल ही है। पुलिस और कचहरी के लफड़े से स्वयं को मुक्त रखकर ग्रामवासी यह संदेश दे रहे हैं कि ऐसा ही हर जगह किया जाय। इससे उनके मन को तो शांति मिलती ही है, श्रम, समय और पूंजी तीनों की बचत होती है। ऐसा ही यदि हर जगह हो तो सरकार को भी तसल्ली मिलेगी, क्योंकि पुलिसिंग के मद में खर्च की बचत होगी और वह रकम विकास कार्यों में लगेगी।

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