गोदामों में सड़ रहा अनाज

Submitted by Hindi on Sat, 07/28/2012 - 11:54
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दि संडे पोस्ट
भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) ने अपनी भंडारण क्षमता बढ़ाने के लिए कोई सार्थक पहल नहीं की है। नतीजा, न तो हम अतिरिक्त उत्पादन को गोदामों में सुरक्षित रख पा रहे हैं और न वक्त-जरूरत जनसामान्य को उपलब्ध करा भूख से होने वाली मौतों को रोक पा रहे हैं। ऐसे में रिकॉर्ड उत्पादन का सार्थक उपयोग नहीं हो पा रहा है और खुले में, गोदामों में करोड़ों टन अनाज सड़ने और खबरों की सुर्खियों में रहने को अभिशप्त है। अनाज को सड़ते देख, सर्वोच्च न्यायालय तक को तीखी टिप्पणी करनी पड़ती है, पर हमारे कर्णधारों के कानों पर जूं नहीं रेंगती।

देश में हर साल करीब साठ लाख टन अनाज या तो चूहे खा जाते हैं या फिर वो सड़ जाते हैं। अगर अनाज को सही ढंग से रखा जाए तो इससे 10 करोड़ बच्चों को एक साल तक खाना खिलाया जा सकता है। करोड़ों का अनाज उचित भंडारण के अभाव में वर्षा, सीलन, कीड़ों और चूहों के कारण नष्ट हो जाता है। यह सिलसिला कब रुकेगा किसी को पता नहीं।

बर्बाद हो रहा है, वहीं सरकार संसद में खाद्य सुरक्षा कानून लाने की बात करती है। राजनीतिक पार्टियां इस मुद्दे पर एक दूसरे की टांग खींचने और अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए ज्यादा इच्छुक दिख रही हैं। कृषि मंत्री को क्रिकेट से फुरसत ही नहीं मिलती कि वह इसे दुरुस्त करने के लिए पुख्ता इंतजाम करें संर्वोच्च न्यायालय का सरकार और कृषि मंत्री को अनाज सड़ाने की जगह गरीबों-भूखों में मुफ्त बांट देने का निर्देश एक फटकार से कम नहीं। आम आदमी के नाम पर सरकार में दुबारा वापसी करने वाली कांग्रेस आम आदमी के प्रति कितना उदासीन हो चुकी है यह अदालत के आदेश से स्पष्ट पता चलता है। देश में जहां एक तिहाई आबादी को दो वक्त की रोटी मयस्सर नहीं, वहीं लाखों टन अनाजों का गोदामों में सड़ना तंत्र के खोखलेपन का परिचायक है। एक ओर कमरतोड़ महंगाई और दूसरी तरफ गोदामों में सड़ते अनाज।

भारत की 135 करोड़ जनता में आज करीब 37 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर कर रही है। इनमें से 22 फीसदी ग्रामीण और शेष 15 प्रतिशत आबादी शहरों में निवास करती है। वहीं दूसरी ओर देश भर में करीब 72 लाख टन से अधिक गेहूं गोदामों में सड़ रहा है। सरकार संसद में खाद्य सुरक्षा कानून लाने की बात करती है। लेकिन दूसरी तरफ सरकार के पास लाखों टन बर्बाद होते अनाज को बचाने के लिए कोई उपाय नहीं है। हद तो यह हो गई कि देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को भी देश के कृषि मंत्री ने महत्व देना उचित नहीं समझा। देश के कृषि मंत्री का ध्यान बर्बाद होते अनाज की तरफ कम और क्रिकेट की सट्टेबाजी के भंवर में फंसे पाकिस्तानी खिलाड़ियों की ओर ज्यादा है। गोदाम में सड़ते अनाज को गरीबों में बांटने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को नहीं मानना केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार को महंगा पड़ा।

एक तरफ सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया वहीं संसद में उन्हें इस मुद्दे पर विपक्षी दलों ने आड़े हाथों लिया। इस मुद्दे पर वे लोकसभा में सफाई देते नजर आये। विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर कृषि मंत्री से इस्तीफे तक की मांग की। जिस देश में करोड़ों लोग भुखमरी के शिकार हों, वहां अनाज की बर्बादी पूरे देश को शर्मसार करती है। जनता के इस दुःख का देश के सर्वोच्च न्यायालय को अभास हुआ और उसने अपनी टिप्पणी में इसकी झलकी दी। न्यायालय ने कहा कि अगर अनाज यूं ही खुले में बर्बाद हो रहे हैं तो उन्हें गरीबों में बांट देना बेहतर है। कृषि मंत्री शरद पवार को न्यायालय की यह टिप्पणी सही नहीं लगी, उन्हें यह बेमानी लगी। अब पवार ने यह स्वीकार कर लिया है कि सरकार बर्बाद होने से पहले अनाज बांटने के देश की सर्वोच्च अदालत के निर्देशों का पालन करेगी। वैसे कृषि मंत्री की देखरेख में खाद्यान्नों की बर्बादी का सिलसिला बेधड़क चल रहा है।

आंकड़ों के मुताबिक 11,700 टन अनाज बर्बाद हुआ। भारतीय खाद्य निगम के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2008 से 2010 तक 35 मीट्रिक टन अनाज भंडारण सुविधाओं की कमी की वजह से नष्ट हो गये। उत्तर प्रदेश के हापुड़, उरई और हरदुआगंज स्थित एफसीआई गोदामों में भी हजारों टन अनाज बर्बाद हो रहे हैं। 1997 और 2007 के बीच 1.83 लाख टन गेहूं, 6.33 लाख टन चावल, 2.200 लाख टन धान और 111 लाख टन मक्का एफसीआई के विभिन्न गोदामों में सड़ गए। स्वयं कृषि मंत्री ने राज्यसभा में स्वीकार किया कि खाद्यान्नों के सड़ने की घटना एक शर्मनाक सच्चाई है। उन्होंने माना कि 6.86 करोड़ रुपये कीमत का 11,700 टन से अधिक खाद्यान्न सरकारी गोदामों में सड़ा पाया गया। खाद्यान्न की यह मात्रा छह लाख लोगों का 10 वर्षों तक पेट भरने के लिए पर्याप्त थी। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद अनाज भंडारण में पवार की उदासीनता समझ से परे है।

2003 में 19 करोड़ 2004 में 10 करोड़, 2006 में 6 करोड़, 2009 में 3 करोड़ रुपयों का नुकसान अनाज सड़ने से हुआ है जबकि इस साल भी यह नुकसान 6 करोड़ का हुआ है। पवार के अनुसार देश को 400 टन गेहूं की जरूरत होती है, जबकि देश के पास इस समय 600 टन गेहूं है। राजनीतिक पार्टियां इस मुद्दे पर भी एक दूसरे की टांग खींचने और अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए ज्यादा इच्छुक दिख रही हैं। महेन्द्रगढ़ से लेकर पंचकूला और सिरसा से लेकर झज्जर तक भंडारण में अनाज सड़ने की खबर सुर्खियां बनी हुई हैं। कलायत में हैडफेड के गोदामों में लाखों का गेहूं सड़ गया लेकिन अधिकारीगण इस पर पर्दा डालने में लगे हैं। भंडारण स्थल पर बदबू से सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि अनाज की स्थिति क्या होगी। शेड कम होने का बहाना बना कर अनाज खुले में रख दिया जाता है। इटावा का गोदाम इसका बेहतरीन उदाहरण है जहां अनाज सड़ कर पूरी तरह खराब हो चुका है।

इटावा डिपो की 13 हजार 60 मीट्रिक टन क्षमता वाले तीन गोदामों में वर्तमान में 6617 मीट्रिक टन खाद्यान्न रखा गया है। यह भंडारण अगस्त 2008 से है। आश्चर्यजनक बात यह है कि गेहूं पाया गया लेकिन एफसीआई के अधिकारी यह स्वीकार करने को तैयार नहीं। गौरतलब है कि कृषि मंत्री ने चंद दिनों पहले अनाज की बर्बादी रोकने के लिए कदम उठाने की बात कही थी। उन्होंने स्पष्ट किया था कि खुले आसमान के नीचे अनाज बर्बाद करने वाले सरकारी अफसरों को इसकी सजा भुगतनी पड़ेगी। उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा भी दर्ज किया जा सकता है। एफसीआई के अधिकारियों पर इसकी गाज गिर सकती है। इन सब के बावजूद देश में करीब 140 लाख टन अनाज के रखरखाव का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है। सवाल उठता है कि अगर एफसीआई के पास इतने गोदाम नहीं हैं तो फिर आवश्यकता से अधिक अनाज किसानों से क्यों खरीदा जाता है।

अनाजों को सुरक्षित रखने की वैकल्पिक व्यवस्था करने की जिम्मेदारी किसकी होगी? भंडारण क्षमता को अनुपातिक वृद्धि के अनुसार क्यों नहीं बढ़ाया गया? लेकिन कृषि मंत्री लगातार अनाज की बर्बादी की बात को नकारते रहे हैं। पवार के मुताबिक मीडिया अनाज सड़ने की बात को बढ़ा चढ़ाकर पेश कर रहा है। देश में भुखमरी और कुपोषित लोगों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। वहीं अनाज रखने की सही व्यवस्था नहीं होने के कारण लाखों टन अनाज भुखे लोगों के पेट में जाने के बजाय सड़ रहा है। देश में पिछले चार सालों में भुखमरी से हर रोज 83 बच्चों की मौत हो रही है। झारखंड, उड़ीसा और बिहार के हालात भी इससे अलग नहीं हैं। हर कोई सरकारी गोदामों में लाखों टन गेहूं की बर्बादी पर खून के आंसू बहा रहा है। कृषि मंत्री को क्रिकेट से फुरसत ही नहीं मिलती कि वह इसे दुरुस्त करने के लिए पुख्ता इंतजाम करे। उनके पास आश्वासन देने के अलावा और कुछ नहीं आता।

देश में हर साल करीब साठ लाख टन अनाज या तो चूहे खा जाते हैं या फिर वो सड़ जाते हैं। अगर अनाज को सही ढंग से रखा जाए तो इससे 10 करोड़ बच्चों को एक साल तक खाना खिलाया जा सकता है। करोड़ों का अनाज उचित भंडारण के अभाव में वर्षा, सीलन, कीड़ों और चूहों के कारण नष्ट हो जाता है। यह सिलसिला कब रुकेगा किसी को पता नहीं। आधुनिक तकनीक, नये तौर तरीकों और रासायनिक खादों के इस्तेमाल से पैदावार लगातार बढ़ रहा है। इसके बावजूद अनाज भंडारण की क्षमता में वृद्धि के गंभीर प्रयास कभी दिखाई नहीं दिए। देश में भूख से हो रही मौत पर स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री चिंता जता चुके हैं। प्रधानमंत्री के संबोधन से साफ समझा जा सकता है कि वह देश में हो रही भूख से मौत से कितने चिंतित हैं। इन सब के बावजूद केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार खुले गोदामों में सड़ रहे गेहूं एवं अन्य अनाजों के लिए खुद को जिम्मेदार नहीं मानते। आखिरकार बाध्य होकर उच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि गेहूं को गरीबों में बांट दिया जाए।

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