जैविक खेती से धान की पैदावार बढ़ाने की मेडागास्कर पद्धति

Submitted by Hindi on Fri, 08/17/2012 - 15:09
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जैविक खेती से मिट्टी की उर्वरता उत्तरोतर बढ़ती जाती है। मिट्टी में पानी का भराव नहीं होने पर वायु संचरण से गोबर व कम्पोस्ट खाद से खेत में दिए गए जीवांश को जीवाणुओं द्वारा पचाकर खाद बनाते हैं, जो पौधों के विकास में सहायक होती है। छोटे उपयोगी जीव जैसे केंचुआ आदि निस्वार्थ भाव से मिट्टी को पोला व हवादार बनाए रखते हैं। इससे भूमि की उर्वरक शक्ति बढ़ती है।

छत्तीसगढ़ में जैविक खेती से धान की पैदावार बढ़ाने की मेडागास्कर पद्धति किसानों में नई उम्मीद जगा रही है। बिलासपुर जिले में किसान इस पद्धति से खासे उत्साहित हैं और वे इससे खेती कर रहे हैं। इसकी खास बात यह है कि मात्र मिट्टी, पानी, जैविक खाद और मानव श्रम से ही उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। बिलासपुर से दक्षिण में 20 किलोमीटर दूर स्थित जन स्वास्थ्य सहयोग के किसानी कार्यक्रम के तहत मेडागास्कर पद्धति का प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। वर्ष 2004 से शुरू हुआ यह कार्यक्रम अब कोटा और लोरमी विकासखंड के करीब 50 से अधिक गांवों में फैल चुका है। गत वर्ष 2009 में 53 किसानों के 5 समूहों ने मेडागास्कर पद्धति से धान की खेती की। इन समूहों में 10-11 सदस्य थे। फुलवारी पारा, मंगलपुर,, बरर, चारपारा और मानपुर में समूह बनाए गए थे। गनियारी में जन स्वास्थ्य सहयोग के परिसर में भी धान के देसी बीजों से इसका प्रयोग किया जा रहा है।

इस कार्यक्रम से जुड़े महेश का कहना है कि हमने गनियारी में 40-50 देशी किस्मों को करीब 1 से 3 डिस्मिल में लगाकर उनकी उत्पादन क्षमता को परखा। यहां की भाठा (सबसे कमजोर) जमीन होने के बावजूद यहां प्रति एकड़ 25 क्विंटल तक उत्पादन पाया गया। गांवों में अधिकतम उत्पादन प्रति एकड़ 32 क्विंटल तक किसानों के खेतों में पाया गया। गांवों के खेतों नदी कछार की अच्छी मिट्टी थी। इसी प्रकार रायपुर स्थित प्रदान संस्था ने भी मेडागास्कर पद्धति का प्रचार-प्रसार किया है। संस्था के सरोज के मुताबिक इस वर्ष 3900 किसानों ने मेडागास्कर पद्धति से खेती की, जिनका औसत उत्पादन प्रति हेक्टेयर 50 क्विंटल आया। और अधिकतम उत्पादन प्रति हेक्टेयर 65 क्विंटल तक हुआ। यह खेती बारिश के पानी से हुई। बारिश कम होने के कारण कुछ किसानों ने तालाब आदि से भी सिंचाई की व्यवस्था की। इसके अलावा, प्रदान संस्था ने मध्य प्रदेश के डिंडौरी, मंडला, बालाघाट, केसला (होशंगाबाद) आदि जगह पर इस पद्धति से किसानों से खेती का प्रयोग करवाया है।

मेडागास्कर पद्धति की खास बात यह है कि इसमें बीज कम लगता है, पानी कम लगता है, श्रम कम लगता है, श्रमिक कम लगते हैं और उत्पादन ज्यादा होता है। इसमें निंदाई-गुड़ाई के लिए बीडर का इस्तेमाल किया जाता है जिससे पौधे की बढ़वार अच्छी होती है। बीडर हाथ से चलाने वाला एक औजार है। इस औजार की गुड़ाई से कम पानी में उगने वाले खरपतवार गुड़ाई के बाद खाद के रूप में धान को उपलब्ध होते हैं और उससे जमीन भी पोली व हवादार होती है। जिसके कारण जड़ों के साथ काम करने वाले जीवाणुओं में काफी वृद्धि होती है। प्रायः ऐसा माना जाता है कि धान अधिक पानी में होने वाला पौधा है और अच्छी फसल के लिए खेत में पानी भरकर रखने की आवश्यकता होती है। मेडागास्कर पद्धति में खेत में पानी भरकर रखना जरूरी नहीं है। खेत में पानी नहीं रहने पर मिट्टी में वायु संचार होता है जिससे जड़ों की बढ़ोतरी होती है और पौधा स्वस्थ और अच्छा विकास करता है। फलस्वरूप पौधे में ज्यादा कंसा निकलते हैं और बालियां भी अधिक लगती हैं।

जबकि खेत में पानी भरकर रखने से जड़ों का विकास नहीं हो पाता और पौधे का भी विकास नहीं होता। इसलिए उत्पादन भी कम होता है। पानी भरा रहने से विकसित जड़ें भी बहुतायत (80 प्रतिषत) में सड़ जाती हैं। इसकी वजह से धान की फसल पूरी क्षमता से नहीं होती। जैविक खेती से मिट्टी की उर्वरता उत्तरोतर बढ़ती जाती है। मिट्टी में पानी का भराव नहीं होने पर वायु संचरण से गोबर व कम्पोस्ट खाद से खेत में दिए गए जीवांश को जीवाणुओं द्वारा पचाकर खाद बनाते हैं, जो पौधों के विकास में सहायक होती है। छोटे उपयोगी जीव जैसे केंचुआ आदि निस्वार्थ भाव से मिट्टी को पोला व हवादार बनाए रखते हैं। इससे भूमि की उर्वरक शक्ति बढ़ती है।

गनियारी स्थित जन स्वास्थ्य सहयोग के परिसर में धान के पौधे में औसतन 30 से 35 कंसा पाए गए हैं। जबकि गांवों में इनकी संख्या 15 से 20 पाई गई है। यानी किसानों से ज्यादा कंसा गनियारी के खेतों में होते हैं। इस अंतर का एक कारण पानी और गोबर खाद है। गनियारी में समय-समय पर बीडर चलाया जाता है। बीज के साथ मिट्टी सहित पौधे को सावधानीपूर्वक रोका जाता है। लेकिन गांव में इतनी सतर्कता नहीं बरती जाती। इस कारण गांवों और गनियारी के उत्पादन में फर्क आया। कुल मिलाकर, इसी विशेषता के कारण मेडागास्कर पद्धति में उत्पादन बढ़ता है। इस पद्धति में बीज कम लगता है। एक एकड़ में मात्र 2 किलोग्राम। 10 दिन का थरहा (पौधा) होने पर रोपाई की जाती है। इसके पहले करीब 25-25 सेमी के अंतर से निशान बनाए जाते हैं। हर 8-10 कतार के बाद करीब 10 इंच की नाली बनाई जाती है जिससे पानी की निकासी की जा सके। खरपतवार की निंदाई 10-10 दिन के अंतर से दो बार बीडर (हाथ से चलाने वाला यंत्र) चलाया जाता है।

इस कार्यक्रम के प्रमुख जेकब नेल्लीथानम का कहना है कि इस पद्धति से दो से तीन गुना तक उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। मेडागास्कर पद्धति अफ्रीका के छोटे मेडागास्कर में विकसित हुई है। जिसमें स्थानीय बीज कम मात्रा में प्रयोग करके रासायनिक खाद व अधिक सिंचाई के बिना उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। पानी के संकट को देखते हुए यह पद्धति बहुत उपयोगी है। यह पद्धति विश्वभर में पिछले 8-9 सालों में तेजी से फैली है। दुनिया के कई देशों के अलावा भारत में अधिकांश राज्य जैसे तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, केरल, ओडिशा, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा में इस पद्धति से खेती की जा रही है। इसके अलावा महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड में सफल रूप से प्रचार हुआ है। छत्तीसगढ़ में पिछले 6 सालों से किसान इसे अपना रहे हैं जिसमें अपार संभावनाएं हैं।

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