हल-बैल की खेती याद कर रहे हैं मुसीबत में फंसे किसान

Submitted by Hindi on Fri, 08/17/2012 - 16:09
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परंपरागत खेती में बैलों से जुताई, मोट और रहट से सिंचाई और बैलगाड़ी के जरिये फसलों व अनाज की ढुलाई की जाती थी। खेत से खलिहान तक, खलिहान से घर तक और घर से बाजार तक किसान बैलगाड़ियों से अनाज ढोते थे। गांव में बढ़ई का काम कृषि यंत्र बनाना होता था। वह बैलगाड़ी के चक्के, बक्खर और हल बनाता था। जिसके बदले उसे किसानों से अनाज मिलता था। पहले हर किसान के पास दो जोड़ी बैल था लेकिन आज उनके स्थान पर ट्रैक्टर है।

मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में करीब 30 साल पहले तवा परियोजना की नहरें आईं। इसके साथ ही परंपरागत बीजों की जगह प्यासे संकर बीज आए। देशी गोबर खाद की जगह रासायनिक खाद का इस्तेमाल होने लगा। हल-बैल की जगह ट्रैक्टर से जुताई होने लगी। खेत और बैल का रिश्ता टूटने लगा। यह बदलाव देश और प्रदेश में भी हरित क्राति के साथ आए, लेकिन यहां बहुत तेजी से आए। इस बदलाव से समृद्धि का भी अहसास होता है। आधुनिक खेती में यह क्षेत्र अग्रणी रहा है। मध्य भारत में होशंगाबाद और हरदा जिले की खेती को हरित क्रांति का सबसे अच्छा मॉडल माना जाता था। शुरुआत में यहां पैदावार भी बढ़ी। खुशहाली आई लेकिन इसके साथ कई समस्याएं भी आई। गेहूं और सोयाबीन की पैदावार ठहर गई है। खाद, बीज, कीटनाशक दवाई, डीजल, बिजली, मशीनों आदि की लगातार बढ़ती कीमतें परेशानी का सबब बन गई हैं। इसी साल सोयाबीन की फसल खराब होने से होशंगाबाद जिले में 3 किसानों ने आत्महत्या कर ली है। हर रोज प्रदेश में 4 किसान आत्महत्या कर रहे हैं। किसानों का संकट गहराता जा रहा है। वे सड़कों पर उतर रहे हैं। धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन उनकी मुसीबत कम नहीं हो रही है।

तवा बांध से सिंचाई के बाद पूरे कमांड क्षेत्र में जंगल, चारागाह तथा सामुदायिक उपयोग की भूमि लगभग खत्म हो गई है। चरोखर और पड़ती भूमि अब नहीं के बराबर है। इससे सबसे बड़ा नुकसान पारंपरिक पशुपालन का हुआ है। पशुओं की संख्या घटी है। इससे आदिवासी, दलित और पिछड़े समुदाय के गरीब लोगों की आजीविका प्रभावित हो रही है। पहले देशी गाय, भैंस, बकरी, भेड़, गधे, घोड़े आदि से इनकी आजीविका चलती थी। लेकिन अब इनकी संख्या बहुत कम हो गई है या नहीं के बराबर है। अब जो डेयरी उद्योग के रूप में पशेपालन हो रहा है, वह बहुत महंगा और पूंजी प्रधान है। पशुधन कम होने का एक कारण मवेशियों के लिए चारे और भूसा की कमी है। गांव में पहले चरोखर की जमीन, नदी-नालों व गांव के आसपास की जमीन पर पशु चरा करते थे। अब यह सार्वजनिक उपयोग की जमीनें रसूखदार लोगों के कब्जे में है या उस पर खेती होने लगी है।

होशंगाबाद के पास रोहना के किसान चरोखर की जमीन वापस दिलाने की मांग कर रहे हैं। इसी प्रकार हार्वेस्टर से कटाई होने के कारण भूसा या फसलों के डंठल जला दिए जाते हैं, इस कारण भूसा भी नहीं मिल पाता। अब यह समस्या है कि अब मवेशियों को क्या चराएं? खेती और पशुपालन एक दूसरे के पूरक माने जाते हैं। खेती में उस समय बड़ा मोड़ आया जब खेतों की जुताई बैलों से होने लगी। यह रिश्ता हजारो सालों से चला आ रहा है। किसान के घरो में गायें होती थी। उनके बछड़े बड़े होने पर खेतों की जुताई करने के काम आते थे।

बैलगाड़ियों की जगह ट्रैक्टर


अनुकूल मिट्टी, हवा, पानी, बीज, पशु ऊर्जा और मानव ऊर्जा से ही खेतों में अनाज पैदा हो जाता था। अब तक वास्तविक उत्पादन सिर्फ खेती में ही होता है। एक दाना बोओ तो कई दाने पैदा होते हैं और उसी से हमारी भोजन की जरूरत पूरी होती है। परंपरागत खेती में बैलों से जुताई, मोट और रहट से सिंचाई और बैलगाड़ी के जरिये फसलों व अनाज की ढुलाई की जाती थी। खेत से खलिहान तक, खलिहान से घर तक और घर से बाजार तक किसान बैलगाड़ियों से अनाज ढोते थे। गांव में बढ़ई का काम कृषि यंत्र बनाना होता था। वह बैलगाड़ी के चक्के, बक्खर और हल बनाता था। जिसके बदले उसे किसानों से अनाज मिलता था। पिपरिया के नजदीक गांव चंदेरी के युवा किसान दशरथ कहते हैं कि उनके गांव में पहले हर किसान के पास बैल जोड़ी थी। आज उनके स्थान पर ट्रैक्टर है। उनके अकेले गांव में करीब 30 ट्रैक्टर हैं। आज कहीं बैलगाड़ियां दिखाई नहीं देती।

देश के जाने-माने पत्रकार भारत डोगरा कहते हैं कि आज बिजली और ऊर्जा के संकट के दौर में खेती में पशु ऊर्जा के महत्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जलवायु बदलाव की समस्या है। इससे ग्लोबल वार्मिंग की समस्या बढ़ सकती है।

बिना खर्च का पशुपालन था


बैलों की जुताई से उत्तम खेतीबैलों की जुताई से उत्तम खेतीपरंपरागत खेती में अलग से बाहरी निवेश की जरूरत नहीं थी। न फसलों में खाद डालने की जरूरत थी और न ही कीटनाशक या नींदानाशक। पशुओं की देखभाल में अतिरिक्त खर्च नहीं होता था। फसलों के डंठल से तैयार भूसा, पुआल व मेढ़ पर होने वाले चारे से उनका पेट भर जाता था। खेतों में होने वाली फसलों से जो डंठल,पुआल और खरपतवार होती थी, वह मवेशियों को खिलाने के काम आती थी। बथुआ जैसी हरी भाजी को तो मवेशियों को खिलाया जाता था, उसे मनुष्य भी खाते थे, अब नींदानाशक डालने से खत्म हो गई है। दूसरी तरफ खेत में डंठल व पुआल आदि सड़कर जैव खाद बनाते थे और पशुओं के गोबर से बहुत अच्छी खाद मिल जाती थी। गोबर खाद से खेतों में मिट्टी की उर्वरकता बढ़ती जाती थी। फसलों के मित्र कीट ही कीटनाशक का काम करते थे।

गाय-बैल को खिलाने के लिए पहले खेतों में कई तरह का चारा उपलब्ध था। होशंगाबाद गजेटियर में केल, मुचेल, पोनिया, सुकरा, गुनैया और दूब का चारे का जिक्र है। नये घास नेपियर और लुक्रेन हैं। जबकि किसान कई और चारे का नाम बताते हैं जिनमें समेल, कांस, बांसिया, हिरमेचिरी, बथुआ आदि हैं। लेकिन अब नींदानाशक या खरपतवार नाशक दवाईयों के छिड़काव के कारण ये चारे उपलब्ध नहीं हैं या कम हो गए हैं। इस कारण पशुपालन कम होता जा रहा है। लेकिन ऊर्जा संकट, बिजली संकट और मानव श्रम की बहुलता के मद्देनजर हमें टिकाऊ खेती की ओर बढ़ना पड़ेगा और इसमें पशु ऊर्जा की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।

टूट रहा है खेत और बैल का रिश्ता


भारत समेत दुनिया में आज भी खेती और पशुपालन ही सबसे ज्यादा रोजगार देने वाले क्षेत्र हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था केवल खेती-किसानी से ही नहीं, पशुपालन और छोटे-छोटे लघु-कुटीर उद्योग व लघु व्यवसायों से संचालित होती रही है। मवेशी एक तरह से लोगों के फिक्स्ड डिपॉजिट हुआ करते थे, जिन्हें बहुत जरूरत पड़ने पर वे बेच देते थे। लेकिन आम तौर पर गाय-बैल और मनुष्य के आपसी स्नेह और प्यार की कई कहानियां अब भी प्रचलन में हैं। उनके प्रति गहरी संवेदनशीलता भी देखने में आती थी। उन्हें बड़े लाड़-प्यार से पाला पोसा जाता था। पिपरिया के मूलचंद दादा कहते हैं हम मवेशियों को अपने बच्चे की तरह पालते-पोसते हैं। उन्हें भी मनुष्यों की तरह बुढ़ापे में खूंटे पर बांधकर खिलाना चाहिए।

बैलों के प्रति विशेष प्रेम तब दिखाई देता है जब उन्हें दीपावली के समय रंग-बिरंगी फीते, गेंठा, मुछेड़ी, नाथ और पट्टों से सजाया जाता है। मढ़ई-मेलों में बैलगाड़ी से लोग सपरिवार जाते हैं। नर्मदा के मेलों में सजे बैलों की छटा निराली दिखती थी। गाय-बैल अपने आपको ऐसा ढाल लेते हैं कि कई तो खुद ही खेतों या जंगल में चरकर खुद घर आ जाते हैं। उन्हें लाने-ले जाने की भी जरूरत नहीं पड़ती। अगर वे कहीं दूर हो तो उनके गले की टपरी या ढूने की आवाज सुनकर उनको हांक कर घर ले आते हैं। गाय की पूजा की जाती है। उन्हें अनाज खिलाया जाता है। यानी गाय-बैल को समान रूप से सम्मान मिलता था।

पशु शक्ति के बारे में कई विशेषज्ञ व वैज्ञानिक भी यह मानने लगे हैं कि यह सबसे सस्ता व व्यावहारिक स्रोत है। मशीनीकरण से ग्लोबल वार्मिंग की समस्या बढ़ेगी, जो आज दुनिया में सबसे चिंता का विषय है। कुछ किसानों ने खेती में पशुओं के महत्व को देखते हुए फिर से बैलों की खेती करना शुरू भी कर दिया है। हालांकि यह प्रयास छुट-पुट है, लेकिन सही दिशा में उठाए गए सही कदम हैं।

लेकिन कुछ समय से दुधारू पशुओं से अधिक दूध निचोड़ने की ऐसी घातक प्रवृत्ति देखने में आई है कि इसके लिए क्रूर तरीके अपनाए जा रहे हैं। अधिक दूध उत्पादन और नस्ल सुधारने के नाम पर जो प्रयोग किए जा रहे हैं उनके नतीजे हानिकारक आ रहे हैं। इससे हमारी देशी नस्लों की उपेक्षा हुई है जो यहां के मौसम व उपलब्ध, बिना खर्च से अपनी खुराक प्राप्त कर लेती थी। इसके स्थान पर ऐसी नाजुक नस्लें लाई गई जो यहां ज्यादा परवरिश मांगती हैं। प्राकृतिक खेती करने वाले राजू टाइटस कहते हैं कि परंपरागत पशुपालन खेती के लिए अच्छा था। उससे खेत के लिए उर्वर गोबर खाद भी मिलती थी और दूध भी। फसल के डंठल या भूसा से उसका पेट भी भर जाता था। लेकिन आजकल जो बड़े पैमाने पर डेयरी का धंधा पनपा है उससे आसपास के पेड़ भी काटे जा रहे हैं। गायों से ज्यादा दूध निचोड़ने के लिए इंजेक्शन का इस्तेमाल हो रहा है और बूढ़ी होने पर बूचड़खाने को बेचा जा रहा है। इसे उचित नहीं ठहराया जा सकता।

बच्चे भी करते थे देखभाल


गाय-बैल को नहलाने-धुलाने से लेकर चराने-पिलाने का हर काम जिम्मेदारी से किया जाता था। खासकर महिलाएं और बच्चे मवेशियों की देखभाल में मदद करते थे। महिलाएं मवेशियों को बांधने के कोठा या सार की साफ-सफाई, भूसा-चारा डालना आदि का काम करती थीं। जबकि बच्चे उन्हें घास या भूसा डालने से लेकर पानी पिलाने का काम करते थे। अब भी असिंचित, जंगलपट्टी व मिश्रित खेती वाले क्षेत्रों में पशुपालन होता है। वहां आज भी बैलों से जुताई की जाती है। खेती और पशुपालन एक दूसरे के पूरक हैं। इसका उदाहरण राजस्थान से आने वाले घुमंतू पशुपालकों की भेड़-बकरियों, ऊंटों को किसान अपने खेतों में चरने की इजाजत देते हैं जिससे खेत उर्वर बने और उनका पेट भी भरे। यही घुमंतू पशुपालक पशुओं की अच्छी नस्ल उपलब्ध कराने में विशेष भूमिका निभाते थे।

लेकिन अब पशुपालन खत्म हो रहा है। प्रबुद्ध साहित्यकार व शिक्षाविद् कश्मीर सिंह उप्पल कहते हैं कि तवा बांध बनने के बाद गांवों के तालाब खत्म हो गए। नदियां भी खत्म हो रही हैं। पड़ती या ऊसर भूमि भी अब नहीं है। जिससे पशुपालन कम हो रहा है। अब बबूल और बेर के पेड़ भी खत्म हो रहे हैं जिनकी पत्तियां बकरियां चरती थीं। इन पेड़ों पर घोंसले बनाकर रहने वाले पक्षी भी बसेराविहीन हो गए हैं। पहले गांव में सभी घरों के मवेशियों को चराने के लिए एक व्यक्ति को नियुक्त कर दिया जाता था। एक साथ जो पशु चरने जाते थे उसे नार कहते थे। बदले में उस व्यक्ति को हर घर से अनाज मिलता था, जो मवेशी चराता था। यह परंपरा अब तवा कमांड में खत्म हो रही है। अब मवेशियों को चराने के लिए जगह ही नहीं बची हैं।

हल-बैल की जगह ट्रैक्टर की जुताई से मिट्टी भी सख्त (भट्टल) हो रही है। जमाड़ा गांव के जीवन सिंह कहते हैं कि अगर गीले खेत में से एक भैंस निकल जाए तो जहां-जहां उसके खुरों के निशान बन जाते हैं, वहां-वहां दाने नहीं उगते। फिर तो अब ट्रैक्टर से जुताई की जा रही है। उसका वजन तो बहुत ज्यादा होता है। इससे हमारी जमीन कड़ी हो रही है। हल से जुताई की यह समस्या नहीं आती थी। कुल मिलाकर, खेती और पशुपालन का रिश्ता आज टूट रहा है। लेकिन अगर इसको बरकरार रखा जाए तो न केवल हमें भूमि को उर्वर बनाने के लिए गोबर खाद मिलेगी। बल्कि बड़ी आबादी को रोजगार भी मिलेगा। पशु शक्ति के बारे में कई विशेषज्ञ व वैज्ञानिक भी यह मानने लगे हैं कि यह सबसे सस्ता व व्यावहारिक स्रोत है। मशीनीकरण से ग्लोबल वार्मिंग की समस्या बढ़ेगी, जो आज दुनिया में सबसे चिंता का विषय है। कुछ किसानों ने खेती में पशुओं के महत्व को देखते हुए फिर से बैलों की खेती करना शुरू भी कर दिया है। हालांकि यह प्रयास छुट-पुट है, लेकिन सही दिशा में उठाए गए सही कदम हैं।

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