कोसी: पुरानी कहानी, नया पाठ

Submitted by Hindi on Fri, 08/24/2012 - 12:11

भारत यायावर द्वारा संपादित फणीश्वरनाथ रेणु के चुनिंदा रिपोर्ताज रचनाओं के संग्रह से ‘पुरानी कहानी : नया पाठ’ रिपोर्ताज लिया गया है। रेणु रिपोर्ताज के काफी बड़े आयाम में बाढ़ फैला हुआ है। बाढ़ उनके जेहन में ऐसे फैला हुआ था कि रेणु घंटों-घंटों संस्मरण सुनाते रह सकते थे। ‘पुरानी कहानी : नया पाठ’ में रेणु ने कोसी की बाढ़ कथा को रिपोर्ताज के रूप में प्रस्तुत किया है।

बंगाल की खाड़ी में डिप्रेशन–तूफान–उठा!

हिमालय की किसी चोटी का बर्फ पिघला और तराई के घनघोर जंगलों के ऊपर काले-काले बादल मंडराने लगे। दिशाएं सांस रोके मौन-स्तब्ध!

कारी-कोसी के कछार पर चरते हुए पशु-गाय, बैल, भैंस-नदी में पानी पीते समय कुछ सूंघकर भड़के, आंतकित हुए। एक बूढ़ी गाय पूंछ उठाकर आर्त-नाद करती हुई भागी। बूढ़े चरवाहे ने नदी के जल को गौर से देखा। चुल्लू में लिया-कनकन ठंडा! सूवा-सचमुच, गेरुआ पानी!

गेरुआ पानी अर्थात पहाड़ का पानी-बाढ़ का पानी?
जवान चरवाहों ने उसकी बात को हंसी में उड़ा दिया। किंतु जानवरों की देह की कंपकंपी बढ़ती गयी। वे झुंड बांधकर कगार पर खड़े नदी की ओर देखते और भड़कते। फिर धरती पर मुँह नहीं रोपा किसी बछड़े ने भी।

कारी-कोसी की शाखा-नदियाँ—पनार, बकरा, लोहंद्रा और महानदी के दोनों कछारों पर भदई धान, मकई और पटसन के खेतों पर मोटी कूंची से पुता हुआ गहरा-हरा रंग! गांवों की अमराइयों और आंगनों में ‘मधुश्रावणी’ के मोहक गीतों की गूंज! हवा में नववधुओं की सूखती-लहराती लाल गुलाबी, पीली चुनरियों की मादक-गंध! मड़ैया में लेटे, मकई के दुधिया बालों की रखवाली करनेवाले अधेड़ किसान के मन में रहरहकर एक मीठा पाप जागता है- पाट के खेतों में साग खोंटनेवाली काली-काली जवान मुसहरनियों के झुंड को देखकर। वह विरहा अलापने लगता है, ऊंचे सुर में – ‘अरे सांवरी सुरतिया पर चमके टिकुलिया कि छतिया पर जौड़ी अनार गे-छाँड़ी छतिया पर जोड़ी आना-आ-आ-आ-आ-र।’

“मार मुँहझौंसे बुढ़वा-वानर को। बुढ़ौती में अनार का सौख देखो।”
लड़कियां खिलखिलाकर हंसी। हंसते-हंसते एक-दूसरे पर गिर पड़ीं।... छौंड़ी माने तू बोली हमार गे-छौंड़ी माने तू बतिया ह-मा-आ-आ-आ-आ-र।

...अनार नहीं, अन्हार! अर्थात अंधकार!

पाट के खेतों सहित काली-काली जवान मुसहरनी छोकरियां आकाश में उड़ गयीं? दल बांधकर मंडरा रही हैं? हंसती हैं तो बिजली चमक उठती है।... रखवाला सूरज दो घड़ी पहले ही डूब गया! अं-ध-का-आ-आ-आ-आ-र!

सांझ को बूंदाबांदी शुरू हुई। मन का हुलास, गले से बरसाती गीत ‘बारह-मासा’ की लय में फूटकर निकल पड़ा – ‘एहि प्रीति कारन सेतु बांधल सिया उदेस सिर-राम हे ए-ए-ए-ए-ए!’

हे-ए-ए-ए-ए-हो-ओ-ओ-ओ!

...हथिया (हस्ता) नक्षत्र की आगमनी गाती हुई पुरवैया हवा, बांस के वन में नाचने लगी। उसके साथ सैंकड़ों प्रेतनियाँ, डाल-डाल में झूले डालकर झूल पड़ीं।... विकट किलकारियाँ.. !

झमाझम वर्षा में दूर से एक करुण अस्फुट-गुहार आकर गांवों को सिहरा गया – हे-ए-ए-ए-हो-ओ-ओ-ओ!

...कोई औरत राह भूलकर अंधरे में पुकार रही है?

बांस-बन की प्रेतनियां, करोड़ों जुगनुओं से जड़ीं चुनरियां उड़ाती दौड़ी, खेतों की ओर।... डरे हुओ बच्चों को माताओं ने अपनी छातियों से चिपका लिया। दूर नदी के किनारे खेतों में खड़ी कोई उसी तरह पुकारती-गुहारती रही-हे-ए-ए-ए-ए-हो-ओ-ओ!

...खेत की लछमी आधी रात में रो रही है?

...सर्वनाश!
गुहार की पुकार क्रमशः क्षीण होती गयी और एक कुद्ध गर्सहट की खौफनाक आवाज उभरी- ‘गों-ओं-ओ-ओ!’

हवाई जहाज?

गुर्राहट क्रमशः निकट आ रही है। सबसे उत्तरवाले गांव के सैंकड़ों लोग एक साथ चिल्ला उठे। भयातुर प्राणियों के कंठों से चीखें निकलीं-‘बा-आ-आ-ढ़! अरे बाप!’

“बाढ़? ”
“बकरा नदी का पानी पूरब-पश्चिम दोनों कछार पर ‘छहछह’ कर रहा है। मेरे खेत की मड़ैया के पास कमर-भर पानी है।”
“दुहाय कोसका महारानी!”
इस इलाके के लोग हर छोटी-बड़ी नदी को कोसी ही कहते हैं। कोसी बराज बनने के बाद भी बाढ़?... कोसका मैया से भला आदमी जीत सकेंगे?
..लो और बांधों कोसी को!
“अब क्या होगा?”

कड़कड़ाकर खेतों में बिजली गिरी। गांव के लोगों की आंखों की रोशनी मंद हो गयी।... एक तरल अंधकाल में दुनिया डूब रही है। ...प्रलय-प्रलय!

निरुपाय, असहाय लोगों ने झांझ-मृदंग बजाकर कोसी मैया का वंदना-गीत शुरू किया!

जवानों ने टांगी-कुदाली से बांस की बल्लियां, लकड़ियों को काटकर मचान बांधना शुरू किया।

मृदंग-झांझ के ताल पर फटे कंठों के भयोत्पादक सुर ... “कि आहे-मैया-कोसका-आ-आ-आ-हैय-मैया-तोहरो-चरनवां-गै मैया अड़हूल-फूलवा कि-हैय-मैया-हमहु-चढ़याब-हैय... !”

..धिन-तक-धिन्ना, धिन-तक-धिन्ना!
...छम्मक-कट-छम, छम्मक-कट-छम!


उतराहीं-गांव का एकमात्र ‘पढ़ुआ-पागल’ हंसता हुआ इसी ताल पर जन-कवि नागार्जुन की कविता की आवृति कर रहा है- “ता-ता-थैया, ता-ता थैया, नाचो-नाचो कोसा मैया... !” और सचमुच इसी ताल पर नाचती हुई कोसी मैया आयीं और देखते-ही-देखते खेत-खलिहान-गांव-घर-पेड़ –सभी इसी ताल पर नाचने लगे-ता-ता थैया, ता-ता थैया... धिन तक-धिन्ना, छम्मक कट-छम!

...मुंह बाये, विशाल मगरमच्छ की पीठ पर सवार दस-भूजा कोसी नाचती, किलकती, अट्टहास करती आगे बढ़ रही है।

अब मृदंग-झांझ नहीं, गीत नहीं-सिर्फ हाहाकार!

किंतु नौजवान लोग जीवट के साथ जुटे हुए हैं; मचान बांध रहे हैं; केले के पौधों को काटकर ‘बेड़ा’ बना रहे हैं।... जब तक सांस, तब तक आस!

“ओसरे पर पानी आ गया!”
“बछरु बहा जा रहा है। धरो-पकड़ो-पकड़ो!”
“किसका घर गिरा?”
“मड़ैया में कमर-भर पानी!”
“ताड़ के पेड़ पर कौन चढ़ रहा है?”
“घर में पानी घुस गया। अरे बाप!”
“छप्पर पर चढ़ जा!”

“माय गे-ए-ए-ए-बाबा हो-ओ-ओ-दुहा-ई-ई-संभल के ले-ले-गिरा-गिरा-छप्पर चढ़ जा-ए सुगनी-रे रमललवा-आ-आ दीदी-ई-ई-हाय-हाय-माय गे-बाबा हो-ओ-ओ-हे इस्सर महादेव-ले ले गया-गया-डूबा-डूबा-आंगन में छाती –भर पानी-यह छप्पर कमजोर है, यहां नहीं –यहां जगह नहीं –हे हे ले ले गिरा – भैस का बच्चा बहा रे –ए-ए-ए डोमन-ए डोमन-सांप-सांप-जै गौरा पारबती-रस्सी कहां है-हंसिया दे-बाप रे बाप –ता-ता थैया, ता-ता थैया, नाचो-नाचो कोसी मैया-छम्मक-कट-छम.. !”

भोर के मटमैले प्रकाश में ताड़ की फुनगी पर बैठे हुए वृद्ध गिद्ध ने देखा – दूर, बहुत दूर तक गेरुआ पानी-पानी-पानी! बीच-बीच में टापुओं जैसे गांव-घर, घरों और पेड़ों पर बैठे हुए लोग। वह वहां एक भैंस की लाश! डूबे हुए पाट और मकी के पौधों की फुनगियों के उस पार...।

राजगिद्ध पांखें तोलता है-उड़ान भरता है! हहास!
जंगली बत्तकों की टोली अपने घोंसलों और अंडों को खोज रही है। टिटही असगुन और अमंगल-भरी बोल रही है।

बादल फिर घिर रहे हैं। हवा फिर तेज हुई।...दुहाई!

इस क्षेत्र के पराजित उम्मीदवार, पुराने जन-सेवकजी का सपना सच हुआ। कोसका मैया ने उन्हें फिर जनसेवा का ‘औसर’ दिया है। ...जै हो, जै हो! इस बार भगवान ने चाहा तो वे विरोधी को पछाड़कर दम लेंगे। वे कस्बा रामनगर के एक व्यापारी की गद्दी से टेलीफोन करके जिला मैजिस्ट्रेट तथा राज्य के मंत्रियों से योगसूत्र स्थापित कर रहे हैं – “हैलो! हैलो... !”

राजधानी के प्रसिद्ध हिंदी दैनिक –पत्र के स्थानीय निज संवाददाता को बहुत दिन के बाद ऐसा महत्वपूर्ण समाचार हाथ लगा है-क्या? प्रेस-टेलीग्राम का फार्म नहीं है? … ट्रा- ट्रा-टक्का-टक्का-ट्रा-ट्रा...!

“हैलो हैलो। हैलो पुरनियां, हैलो पटना, हैलो कटिहार।”
... ट्रा-ट्रा-टक्का-टक्का ...!

“हैलो, मैं जनसेवक शर्मा बोल रहा हूं। जी? जी करीब पचास गांव एकदम जलमग्न-डूब गये। नहीं हुजूर नाव नहीं गांव। गांव माने विलेज जी? कुछ सुनायी नहीं पड़ रहा जी? नाव एक भी नहीं है। हुजूर डी.एम. को ताकीद किया जाय जरा। जी? इस इलाके का एम.एल.ए.? जी, वह तो विरोधी पार्टी का है। जी...जी? ...हैलो-हैलो-हैलो!”

जनसेवकजी ने संवाददाता को पोस्ट ऑफिस के काउंटर पर पकड़ा और उसे चाय की दुकान पर अपना बयान लिखाने के लिए ले गये। किंतु चाय की दुकान पर सुविधा नहीं हुई, तो उसे अपने डेरे पर ले गये। लिखो – “स्मरण रहे कि ऐसा बाढ़... बाढ़ स्त्रीलिंग है? तब, ऐसी बाढ़ ही लिखो। हां, तो स्मरण रहे कि ऐसी बाढ़ इसके पहले कभी नहीं आयी...।”

“किंतु दस साल पहले तो....?”

“अजी, दस साल पहले की बात कौन याद रखता है! तो लिखो ‘कि सूचना मिलते ही आधी रात को मैं बाढ़ग्रस्त इलाके..। ’ और सुनो, आज यह ‘स्टेटमेंट’ चला जाये। वक्तव्य सबसे पहले मेरा छपना चाहिए।”

संवाददाता अपनी पत्रकारोचित बुद्दि से काम लेता है- “लेकिन एमएलए साहब ने तो पहले ही बयान दे दिया है – ‘फर्स्ट प्रेस ऑफ इंडिया’ को सीधे टेलीफोन से।”

जनसेवक शर्मा का चेहरा उतर गया।... इतने दिन के बाद भगवान ने जन-सेवा का औसर दिया और वक्तव्य चला गया पहले विरोधी का? दुश्मन का? चीनी आक्रमण के समय भी भाषण देने और फंड वसूलने में वह पीछे रह गये। और इस बार भी?

“सुनो! मैंने कितने बाढ़ग्रस्त गांवों के बारे में लिखाया था? पचास? उसको डेढ़ सौ कर दो। ...ज्यादा गांव बाढ़ग्रस्त होगा तो रिलीफ भी ज्यादा-ज्यादा मिलेगा, इस इलाके को। अपने क्षेत्र की भलाई के लिए मैं सब कुछ कर सकता हूं। और झूठ क्यों? भगवान ने चाहा कल तक तो दो सौ गांव जलमग्न हो जा सकते हैं!”

संवाददाता को अपना वक्तव्य देने के बाद उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं की विशेष ‘आवश्यक और अरजेंट’ बैठक बुलायी। वक्तव्य में उन्होंने जिस बात की चर्चा नहीं की, उसी पर विशेष प्रकाश डालते हुए सुझाया – “यह जो बरदाहा-बांध बना है पिछले साल, इसके कारण इस कस्बा रामपुर पर भी इस बार खतरा है। पानी को निकास नहीं मिला तो कल सुबह तक ही-हो सकता है-पानी यहां के गाड़ीवान टोला तक ठेल दे!”

गाड़ीवान टोले के कर्मठ कार्यकर्ताओं ने एक-दूसरे की ओर देखा। आंखों-ही-आंखों में गुप्त कार्रवाई करने का प्रस्ताव पास हो गया।

दूसरे दिन सुबह को संवाददाता ने नया संवाद भेजा – “आज रात बरदाहा- बांध टूट जाने के कारण करीब डेढ़ सौ गांव फिर डूबे...।”टक्का-टक्का-ट्रा-ट्रा-ट्रा! ! जनसेवकजी ‘ट्रंक’ से पुकारने लगे – “हैलो-हैलो-हैलो पटना, हैलो पटना.. ! !”

कस्बा रामपुर के व्यापारियों और बड़े महाजनों ने समझ लिया- ‘शुभ-लाभ’ का ऐसा औसर बार-बार नहीं आता। चीनी आक्रमण के समय वे हाथ मलकर रह गये।... यह अकाल का हल्ला चल ही रहा था कि भगवान ने बाढ़ भेज दिया। दरवाजे के पास तक आयी हुई गंगा में कौन नहीं हाथ धोयेगा भला! उनके गोदाम खाली हो गये। रातों-रात बही-खाते दुरुस्त। अकाल-पीड़ितों के लिए फंड में पैसे देने की सरकारी-गैर सरकारी अपील पर, उन्होंने दिल खेलकर पैसे दिये। ...अनाज? अनाज कहां?

सरकारी कर्मचारियों ने उनके खाली गोदामों पर सरकारी ताले जड़ दिये।

“भाइयों! भाइयों! ! आज शाम को। स्थानीय टाउन हॉल यानी ‘ठेठरहौल’ में। कस्बा रामपुर की जनता की एक विराट-सभा होगी। इस सभा में बाढ़ पीड़ित-सहायता-कमिटी का गठन होगा। भाइयों!भाइयों... ! ”

“प्यारे भाइयों! द अनसारी टूरिंग सिनेमा के रुपहले परदे पर आज रात एक महान पारिवारिक खेल...प्यारे भाइयों. आज रात!”

“मेहरबान, आंख नहीं तो कुछ नहीं। जिन भाइयों की आंखों में लाली हो – आंख से पानी गिरता हो-मोतियाबिंद और रतौंधी हो-एक बार हमारी कंपनी का मशहूर और मारुफ अंजन इस्तेमाल करके देखें...।”

...मैं का करूं राम मुझे बुड्ढा मिल गया!

...छप गया – छप गया। इस इलाके का ताजा समाचार। दो सौ गांव डूब गये।

...आ गया! आ गया! सस्ता बंबैया चादर!
...आ गयी। आ गयी। रिलीफ की गाड़ी आ गयी।
...आ गयी। आ रही हैं। तीन दर्जन नावें।
...सिंचाई मंत्री जी आ रहे हैं।
...भिक्षा दो भाई भिक्षा दो-चावल कपड़ा पैसा दो।
...इंकलाब जिंदाबाद!

कस्बा रामपुर के दोनों स्कूल, मिडिल और उच्च-माध्यमिक विद्यालय के लड़के जुलूस निकालकर, गीत गाकर फटे-पुराने कपड़े बटोरते रहे। शाम होते-होते वे दो दलों में बंट गये। बात गाली-गलौज से शुरू होकर ‘लाठी-लठौवल’ और छुरेबाजी तक बढ़ गयी। ...दिन भर जुलूस में गला फाड़कर नारा लगाया – गाना गाया मिडिल स्कूल के लड़कों ने और लीडर में नाम लिखा जाये हाइयर सेकेंड्री के लड़के का? मारो सालों को!

किंतु रिलीफ-कमिटी के सभापति श्री जनसेवक शर्माजी निर्वाचित हुए। एमएलए साहब को लोगों ने मिलकर खूब फींचा। “वोट मांगने के समय तो खूब ‘लाम काफ’ बघार रहे थे। और अभी सरकारी रिलीफ-वोट की बात तो दूर, एक फूटी नाव तक नहीं जुटा सकते? ..जवाब दीजिये क्यों आयी यह बाढ़? ...आपकी बात नहीं सुनी जाती तो दे दीजिए इस्तिफा!”

एमएलए साहब के सभी ‘मिलीटेंट-वर्कर’अनुपस्थित थे। नहीं तो बात यहां भी रोड़ेबाजी से शुरू होकर...।

कोसी में आई बाढ़ की वजह से पलायन करते लोगकोसी में आई बाढ़ की वजह से पलायन करते लोगसभी राजनैतिक पार्टियों के प्रमुख नेता अपने-अपने कार्यकर्ताओं के जत्थे के साथ कस्बा रामपुर पहुंच रहे हैं। उनके अलग-अलग कैंप गड़ रहे हैं।

सरकारी डॉक्टरों और नर्सों की टोली अभी-अभी पहुंची है। डाकबंगले के सभी कमरों में आफिसरों के डेरे हैं। अफसरों की ‘कोर्डिनेशन मीटिंग’ बैठी है।

सभी राजनैतिक पार्टी के नेताओं ने अपने प्रतिनिधि का नाम दिया है- ‘विजिलेंस-कमिटी’ की सदस्यता के लिए। प्रायः सभी पार्टियों में दो गुट हैं- आफिशियल ग्रुप, डिसिडेंट ...। हर कैंप में एक दबा हुआ असंतोष सुलग रहा है।

...कल मुख्यमंत्रीजी ‘आसमानी-दौरा’ करेंगे।
...केंद्रीय खाद्यमंत्री भी उड़कर आ रहे हैं।
...नदी-घाटी योजना के मंत्रीजी ने बयान दिया है।
...और रिलीफ भेजा जा रहा है। चावल-आटा-तेल-कपड़ा-किरासन-तेल-माचिस-साबूदाना-चीनी से भरे दस सरकारी ट्रक रवाना हो चुके हैं।
...कल सारी रात विजिलेंस कमिटी की बैठक चलती रही।

“भाइयों! आज शाम को। म्युनिसिपल मैदान में। आम सभा होगी। जिसमें सरकार की वर्तमान ‘रिलिफ नीति’ के खिलाफ घोर असंतोष प्रकट किया जायगा। रिलीफ कमिटी का मनमाना गठन करके..। ”

“भाइयों! कल साढ़े दस बजे दिन को। कामरेड चौबे। स्थानीय रिलीफ-ऑफीसर के सामने। अनशन करने के लिए... !’’

...जा जा जा रे बेईमान तोरा एको न धरम। एको न धरम हाय कछु ना शरम। जा जा जा रे बेइमान तोरा…!

“भाइयों!”

दो दिन से छप्परों, पेड़ों और टीलों पर बैठे पानी से घिरे भूखे-प्यासे और असहाय लोगों ने देखा-नावें आ रही हैं।

अगली नाव पर झंडा है। कांग्रेसी झंडा!
पिछली नाव पर भी। मगर दूसरे रंग का।
...जै हो! महात्मा गांधी की जै!
...ए ए! ! इसमें महात्मा गांधी की जय की क्या बात है?
...हड़बड़ाओ मत। नहीं तो डाली टूट जायेगी।
...तीसरी नाव। अरे-रे! वह नाव नहीं। मवेशी की लाश है और उस पर दो गिद्ध बैठे हैं।

...हवाई जहाज! हवाई जहाज!

नावें करीब आती गयीं। अगली नाव पर जनसेवकजी स्वयं सवार हैं। उनकी नाव पर ‘माइक’ फिट है। वे दूर से ही अपनी भूमिका बांध रहे हैं “भाइयों, हालांकि पिछले चुनाव में आप लोगों ने मुझे वोट नहीं दिया। फिर भी आप लोगों के संकट की सूचना पाते ही मैंने मुख्यमंत्री, सिंचाई-मंत्री, खाद्य मंत्री.. !”

पिछली नाव पर विरोधी दल के कार्यकर्ता थे। उन्होंने एक स्वर से विरोध किया “यह अन्याय है। आप सरकारी नाव और सरकारी सहायता का इस्तेमाल गलत तरीके से पार्टी के प्रचार में..।”

जनसेवकजी रिलीफ-कमिटी के सभापति हैं। उन्हें विरोध की परवाह नहीं। वे जारी रखते हैं. – “भाइयों आप लोग हमारे कार्यकर्ताओं को अपनी संख्या, नाम-ब-नाम लिखा दें। आप लोग एक ही साथ हड़बड़ाकर नाव पर मत चढ़ें। भाइयों, स्टाक अभी थोड़ा है। नाव की भी कमी है। इसलिए जितना भी है आपस में सलाह करके बांट-बटवारा... !”

रिलीफ-कमिटी के सभापति की नाव जलमग्न क्षेत्र में भाषण बोती हुई चली गयी। साथवाली नाव पर बैठे लोग लगातार विरोध करते हुए साथ चले। दोनों नाव से कुछ कार्यकर्ता उतरे बही-खाता लेकर।

“बड़ी नाव आ रही है!”

“भैया, खाली नाव ही आ रही है या और भी कुछ? बच्चे भूख से बेहोश हैं। मेरी बेटी लबेजान है।”

दो दर्जन नावें शाम तक लोगों को बटोरती रहीं। रात को विजिलेंस कमिटी की बैठक में रिलीफ-ऑफीसर ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया, नावों पर किसी पार्टी का झंडा नहीं लगेगा! ...बगैर अंगूठा-टीप लिये या बिना दस्तखत कराये किसी को कोई चीज नहीं दी जाये।... हमें दुख है कि हम बीड़ी नहीं सप्लाई कर सकते। ... रिलीफ बांटते समय किसी पार्टी का प्रचार या निंदा करना गैरवाजिब है। ऐसा करनेवालों को कमिटी का किसी प्रकार काम नहीं सौंपा जायेगा।

डॉक्टरों और नर्सों को अभी कोई काम नहीं। वे ‘इनडोर’ और ‘आउटडोर’ खेलों में मस्त हैं.. गेम वॉल! ...टू स्पेड! ...की मिस बनर्जी-की होलो? ...नो ट्रंप!

रेलवे लाइन के ऊंचे बांध पर कस्बा रामपुर के हाट पर पेड़ों के नीचे। स्कूलों में बाढ़-पीड़ितों के रहने की व्यवस्था की गयी है। जिन गांवों में पानी नहीं घुसा है, मगर पानी से घिरे हैं। ऐसे गांवों में भी लोगों के रहने की व्यवस्था की गयी है। उनके लिए रोज राशन लेकर नावें जाती हैं। डॉक्टरों और नर्सों के कई जत्थे गांवों में सेंटर चलाने के लिए भेजे गये हैं।

पानी धीरे-धीरे घट रहा है!

मुसहर तथा बहरदारों का दम, कैंप के घेरे में कई दिन से फूल रहा था। इन घुटते हुए लोगों ने पानी घटने की खबर सुनते ही डेरा-डंडा तोड़ दिया। वे पानी के जानवर हैं। पानी-कीचड़ में वे महीनों रह सकते हैं...टीप देते-देते अंगूठे की चमड़ी भी काली हो गयी। ..भीख मांगकर खाना अच्छा, मगर रिलीफ का हलवा-पूड़ी नहीं छूना। छिःछिः! ! ...वह ‘कुर्र-अंक्खा’ भोलंटियर मेरी सुगनी को फुसला रहा था, जानते हो? ...सब चोरों का ठठ्ठ!

“भाइयों, कैंप से जाने के पहले। अपने इंचार्ज को। अवश्य सूचित करें। जिन गांवों से पानी हट गया है वहां के लोग अब जा सकते हैं। उनके पुनर्वास के लिए रिलीफ-कमिटी की ओर से बांस-खड़-सूतली तथा और जरूरी सामान... !”

“भाइयों, आपको मालूम होना चाहिए कि आपकी सहायता के लिए। आये हुए सामान के वितरण में। घोर धांधली हो रही है। आप खुद अपनी आवाज बुलंद करके। मौजूदा कमिटी को... !”

“...भाइयों। भाइयों! सुनिए दोस्तों! !”

भाइयों-भाइयों पुकारते हुए दोनों घोषणा करनेवालों ने एक-दूसरे को झूठा और बेईमान कहना शुरू किया। फिर मारपीट शुरू हुई। पुलिस ने शांति स्थापित करने के लिए लाठी-चार्ज किया। कई बाढ़-पीड़ित रात-भर हिरासत में रहे।”

...राजधानी के प्रमुख अंग्रेजी पत्र ने परदा-फाश करते हुए लिखा – “छोटी-छोटी नदियों, खासकर कोसी की पुरानी धाराओं में, छोटे-बड़े बांध बांधने में पीडब्ल्यूडी के इंजीनियरों ने अदूरदर्शिता से काम लिया है। यही कारण है कि जिन क्षेत्रों में कभी बाढ़ नहीं आयी, वे जलमग्न हैं इस बार। सरकार के अकर्मण्य कर्मचारियों...।”

...दूसरे दैनिक ने इस बाढ़ की जिम्मेदारी पड़ोसी राज्य के अधिकारियों के सिर थोपते लिखा- “पड़ोसी राज्य ने हमारे राज्य की सीमा से सटे हुए क्षेत्र में बराज बांधकर सारे उत्तर-पूर्वी बिहार की तमाम छोटी नदियों का निकास अवरुद्ध कर दिया। बराज बनाने के पहले यदि हमारे राज्य अधिकारियों से सलाह-परामर्श किया जाता तो ऐसी बाढ़ नहीं आती।”

स्थानीय अर्थात जिला से निकलने वाली साप्ताहिक पत्रिका ने इस बाढ़ को ‘मैनमेड’बाढ़ करार देते हुए प्रमाणित किया “पड़ोसी राज्य नहीं, पड़ोसी राष्ट्र के कर्णधारों ने ही हमें डुबाया है।”

बरदाहा-बांध की जिम्मेदारी चूहों पर पड़ी। चूहों ने बांध में असंख्य ‘मांद’ खोदकर जर्जर कर दिया था- एक ही साल में।

...पढ़िए-पढ़िए ताजा समाचार! सारे राज्य में हाहाकार! राज्य की मौजूदा सरकार के खिलाफ अविश्वास के प्रस्ताव की तैयारी! मुख्यमंत्री के निवास पर अनशन!

पचास टिन किरासन, दस बोरा आटा और चावल के साथ लिरीफ की नाव पनार नदी की बीच धारा में डूब गयी! ...लापता हो गयी।

जनसेवक जी के विरोधियों ने मुकदमा दायर किया है। करें। जनसेवकजी का काम बन चुका है। सारे इलाके में उनका जयजयकार हो रहा है। ...चुनाव में हारने और चीनी आक्रमण के समय पिछड़ जाने की सारी ग्लानि दूर हो गयी है। उन्होंने सूद-सहित वसूल लिया है। ...भगवान जरूर है, कहीं-न-कहीं।

...भाइयो!

...ओ मेरे वतन के लोगों। जरा आंख में भर लो पानी... !

आकाश में गिद्धों की टोली भांवरी ले रही है। सैकड़ों काले-काले पंख मंडराते हुए बादलों जैसे।

धरती पर मरे हुए पशुओं की लाशें-कंकाल! हरी-भरी फसलों के सड़ते हुए पौधे!
...दुर्गंध-दुर्गध-गंध!
...कीचड़-केचुएं-कीड़े-धरती की सड़ी हुई लाश!

सर्वहारा लोगों की टोली, सिर झुकाये बचे-खुचे पशुओं को हांकते बाल-बच्चों, मुर्गे-मुर्गियों, बकरे-बकरियों को गाड़ियों बंहगियों और पीठ पर लादकर अपने-अपने गांव की ओर जा रही हैं, जहां न उनकी मडैंया साबित है और खेतों में एक चुटकी फसल। किंतु उनके पैर तेजी से बढ़ रहे हैं। तीस-बत्तीस दिन के रौरववास के बाद उनके दिलों में अपने बेघर के गांव और कीचड़ से भरे खेतों के लिए प्यार की बाढ़ आ गयी है। ...कीचड़ पर उनके पैरों के छाप दूर-दूर तक अंकित हो रहे हैं।

गांव फिर से बस रहे हैं।

सरकारी रिलीफ, कर्ज और सहायता के बोझ से दबी हुई आत्माओं में फिर देवता आकर सबने लगे। तीस-बत्तीस दिन तक अपनी-अपनी जान के लिए वे आपस में लड़ते रहे। रिलीफ के कार्यकर्ताओं की खुशामद करते रहे। स्वार्थ सिद्धि के लिए उन्होंने एक-दूसरे की गर्दन पर हाथ रखे, दूसरे का हिस्सा हड़पा, चोरी की, झगड़ा किया। ...सभी के दिल में शैतान का डेरा था।

आसिन का सूरज रोज धरती को जगाता है। सूखते हुए कीचड़ों पर दूब के अंखुए हरे हुए।जंगली बत्तकों की पांती ‘पैंक-पैंक’ करती हुई चक्कर मार रही है। चील, काग, गिद्ध सभी प्यारे लगते हैं। गड्ढ़ों में ‘कोका’ के फूल हैं या बगुले? हरसिंगार की डाली फूलों से लद गयी। हवा में आगमनी का सुर-मां आ रही है! भिखारिनी-अन्नापूर्णा मां!

मिट्टी – कीचड़ की प्रतिमा में प्राण-प्रतिष्ठा का मंत्र फूंककर मिट्टी की संतान ने पुकारा – मां-आँ-आँ! हमें क्षमा करो...!

पूजा के ढोल बजने लगे, सभी ओर।

कारी कोसी की निर्मल धारा में अष्टमी का चांद हंसा। शरणार्थी बंगाली मल्लाहों के गीत की एक कड़ी रजनीगंघा के तुनुत-कोमल डंठलों की तरह टूट-टूटकर बिखर रही है-ओ रे भा-य य य! ! तोमारि लागिया – बधुआ-आ-आ कांदे हाय हाय – उगो पिरित करिया बधुआ मने पस्ताय... !

इलाके का ‘पढ़ुवा पागल’ आजकल ‘निराला’ की एक ही पंक्ति को बार-बार दुहराता है- ‘मिट्टी का डेला शकरपाला हुआ। ’(1964)

प्रस्तुति
भारत यायावर


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