विकास की धारा में गुम होती पिंडर नदी

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जनसत्ता (रविवारी), 09 सितंबर 2012
उत्तराखंड में पिंडर नदी लोगों के जीवन और संस्कृति से गहरे जुड़ी हुई है। लेकिन अब इसके वजूद पर खतरा मंडरा रहा है। विकास के नाम पर इस क्षेत्र के जल, जंगल और जमीन को बर्बाद किया जा रहा है। इस नदी की देन और उस पर बनाए जा रहे बांधों से होने वाले नुकसान के बारे में बता रहे हैं अभय मिश्र।

तमाम विरोध को दरकिनार कर केंद्र सरकार देवसारी जलविद्युत परयोजना को हरी झंडी देने की तैयारी कर रही है। इसे बनाने वाली कंपनी सतलुज जल विद्युत निगम ने अपनी तैयारियां पूरी कर ली हैं। इसके बाद नंदकेशरी गांव से पैठाणी तक बनने वाली सत्रह किलोमीटर लंबी सुरंग में पिंडर बहने लगेगी। इस सुरंग की वजह से बत्तीस गांव सीधे तौर पर प्रभावित होंगे और अप्रत्यक्ष रूप से कितने गांवों पर इसका असर होगा इसका कोई आकलन ही नहीं है। पहाड़ों की सबसे बड़ी धार्मिक यात्रा राजजात को रास्ता बताती है पिंडर नदी। हर बारह साल में होने वाली दो सौ अस्सी किलोमीटर की इस दुर्गम यात्रा को पर्वतीय महाकुंभ भी कहा जाता है। मान जाता है कि शिव पार्वती को विवाह के बाद पिंडर घाटी के रास्ते ही विदा करा कर ले गए थे। आज भी हिमालय क्षेत्र की बेटियां यह कामना करती हैं कि उनकी विदाई के रास्ते में पिंडर के दर्शन हों। पिंडर घाटी की खूबसूरती यहां के लोकगीतों में बसती है जिनमें पिंडर को दूध का झरना कहा गया है। पिंडर को काफी ऊंचाई से देखने पर भी इसकी तलहटी पर पड़े पत्थर साफ नजर आते हैं। अलकनंदा और पिंडर के संगम कर्णप्रयाग से दस किलोमीटर दूर मौजूद पिंडर घाटी ही राजजात का मुख्य मार्ग है। पिंडर की इन्हीं खूबसूरत वादियों में सुनाउ तल्ला गांव भी है।चमोली जिले की थराली तहसील का यह गांव अपने ही पूर्वजों की लाशों पर बसा है। करीब डेढ़ सौ साल पहले हुए भारी भूस्खलन से यह गांव पूरी तरह धरती में समा गया था और सभी लोग मारे गए थे। सुनाउ तल्ला उसी मलबे के ऊपर बसा है। आज सरकारी नीतियों की वजह से पूरी पिंडर घाटी और राजजात का मार्ग सुनाउ यानी सुनसान बनने की कगार पर पहुंच गया है।

कर्णप्रयाग के पास स्थित नौटी से आगे चांदपुर गढ़ी-जैंटाकोटी-कुलसारी मार्ग पर तेजी से पहाड़ों को काटा जा रहा है। सरकारी दावा है कि राजजात को सुगम बनाने के लिए रास्तों को चौड़ा किया जा रहा है, लेकिन किसी सरकारी बाबू में यह कहने की हिम्मत नहीं कि अलकनंदा और पिंडर में बनने वाली कई बांध परियोजनाओं के निर्माण के लिए बड़ी क्रेने और बीस पहियों वाले ट्रकों के आवागमन के लिए पहाड़ों का सीना काटा जा रहा है। आज तक राजजात में शामिल होने वाले किसी भी मंडल ने डामर की चौड़ी सड़कों के लिए आंदोलन तो दूर इसे रोकने की मांग तक नहीं की। शिवालिक परियोजना की वजह से इस क्षेत्र में भूस्खलन की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। शायद ही कोई दिन ऐसा हो, जब पत्थर गिरने की वजह से जाम नहीं लगता है।

नौवीं शताब्दी से लगातार जारी राजजात भी इक्कीसवीं सदी में आकर विकास का शिकार हो गई है। यह यात्रा तीस दिनों तक चलती है और दुर्गम रास्तों से होती हुई 17500 वर्ग फुट पर स्थित रूपकुंड तक जाती है। नौवीं शताब्दी में राज्य की सुरक्षा सुनिश्चित करने को लेकर प्रारंभ हुई इस यात्रा ने अब उत्सव का रूप ले लिया है। उत्तराखंड सरकार भी इस पर्यटन की दृष्टि से भुनाने में लगी है। वास्तव में नंदा देवी राजजात दुनिया की सबसे अनूठी, विस्मयकारी और साहसिक यात्रा है। इस यात्रा में उच्च हिमालय की दुर्गम और हिममंडित पर्वत श्रृंखलाओं, मखमली बुग्यालों का स्वप्न लोक, अलौकिक पर्वतीय उपत्यकाओं और अतुलनीय रूपकुंड के दर्शन तो होते ही हैं, इस क्षेत्र की संस्कृति और समाज को जानने-समझने का मौका भी मिलता है।

पिंडर नदीपिंडर नदीलेकिन आगे ये दुर्लभ नजारे देखने को मिल पाते हैं या नहीं इस बात को थोड़ा संशय है। बहुत संभव है कि 2025 में होने वाली अगली राजजात का मार्ग बदल जाए। क्योंकि तब तक गंगा की एकमात्र स्वतंत्र बहने वाली धारा पिंडर पर कई बांध बन चुके होंगे और वह ‘रन ऑफ द रिवर’ के नाम पर सुरंगों में बहने लगेगी। तमाम विरोध को दरकिनार कर केंद्र सरकार देवसारी जलविद्युत परयोजना को हरी झंडी देने की तैयारी कर रही है। इसे बनाने वाली कंपनी सतलुज जल विद्युत निगम ने अपनी तैयारियां पूरी कर ली हैं। इसके बाद नंदकेशरी गांव से पैठाणी तक बनने वाली सत्रह किलोमीटर लंबी सुरंग में पिंडर बहने लगेगी। इस सुरंग की वजह से बत्तीस गांव सीधे तौर पर प्रभावित होंगे और अप्रत्यक्ष रूप से कितने गांवों पर इसका असर होगा इसका कोई आकलन ही नहीं है। चीड़ का लीसा निकालने वाले गोपाल सिंह कहते हैं यह सुरंग मेरे घर के नीचे से निकलेगी लेकिन बांध बनाने वाली कंपनी सतलुज जल विद्युत निगम उन्हें प्रभावित नहीं मानती, क्योंकि उनसे उनकी जगह खाली करने को नहीं कहा जा रहा है। वास्तव में यह पूरा क्षेत्र भूस्खलन से प्रभावित रहता है।

कुलसारी गांव की पूरी सड़क ही भूस्खलन की वजह से टूट गई है। पिंडर पर कई छोटी परियोजनाओं के अलावा तीन बड़ी परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। देवसारी के अलावा बहत्तर मेगावाट की बगोली परियोजना और सत्ताईस मेगावाट की पडली परियोजना प्रस्तावित है। अगर ये परियोजनाएं बनती हैं तो पूरी पिंडर घाटी को ही विस्थापन झेलना होगा और जमीन की कमी की वजह से पहाड़ों में पुनर्वास लगभग असंभव है। यहीं नहीं देवाल में कैल और पिंडर के संगम से लेकर कर्णप्रयाग तक पूरी पिंडर नदी सुरंगों और जलाशयों में नजर आएगी। कुंदन सिंह के गांव में स्वच्छ पानी का एकमात्र जलस्रोत बंद हो गया है। कुंदन सिंह बताते हैं कि सुरंग में विस्फोट के चलते जलस्रोत दूसरी और घूम जाते हैं। कुंदन खुद उस सुरंग में काम करते थे जिसका काम स्थानीय लोगों के विरोध के चलते बंद कर दिया गया। देवसारी की परीक्षण सुरंग बनाने के दौरान कई मकानों में दरार आ गई और उन्हें की मुआवजा नहीं दिया गया है। आगे भी इसकी कोई उम्मीद नहीं है, क्योंकि राज्य में पहले से चल रही सभी बांध परियोजनाओं ने अपने आसपास के क्षेत्र का जो बीमा करवाया है उसमें शर्त रखी है कि मुआवजा तभी दिया जाएगा जब कोई भूकम्प या आगजनी जैसी घटना घटेगी। सुरंग विस्फोट के चलते बनी दरारों पर की मुआवजा नहीं है। अलकनंदा पर बनी विष्णुगाड पीपलकोटी परियोजना के आसपास ऐसे सैकड़ों मकान दिखते हैं। आगे बढ़ने पर स्थानीय साथी हर्ष तडियाल बताते हैं कि यहां विष्णुप्रयाग हुआ करता था। यहां बनी विष्णुप्रयाग परियोजना में दोनों तरफ बांध बनाकर नदी को सुरंगों में डाल दिया गया जिससे प्रयाग का अस्तित्व ही खत्म हो गया। वे जोर देकर कहते हैं सरकार इसे ही रन ऑफ द रिवर कहती है।

एक दशक पहले तक पिंडर घाटों के गांवों को परेशान करने वाली भारी बर्फबारी पर्यावरणीय असंतुलन के चलते अब गांवों को ज्यादा परेशान नहीं करती है। अब तो गांव वाले भी अगर बर्फबारी का मजा लेना चाहते हैं तो उन्हें उनके गांवों से दूर औली तक का सफर तय करना पड़ता है। पीपलकोटी क्षेत्र में आश्चर्यजनक रूप से अस्थमा के मरीजों की संख्या बढ़ी है जो यहां लगातार बढ़ रहे धूल और धुएं के कारण है। कुछ समय पहले तक ही अस्थमा के मरीज यहां स्वास्थ्य लाभ लेने आते थे। पिंडर के लोगों की सबसे बड़ी चिंता शवों के अंतिम संस्कार को लेकर भी है। अलकनंदा में ऊपर की तरफ बने बांधों की कहानियों ने इन्हें चिंतित कर रखा है। राज्य के कई जगहों पर शवों के अंतिम संस्कार के लिए बांध कंपनियों से मिन्नत करनी होती है तब वे जरूरत का पानी छोड़ती हैं और क्रियाकर्म हो पाता है।

बांध कंपनियां अपने सीएसआर यानी कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी को भी क्षेत्र में फूट डालने के लिए इस्तेमाल करती है जिस कोष से स्कूल, अस्पताल, प्याऊ वगैरह बनने चाहिए उस कोष को कंपनियां गांव के अंदर छोटे मंदिर या पुलिया बनाने में खर्च करती है और इसका ठेका गांव के उन नौजवानों को दिया जाता है जो उनका सबसे ज्यादा विरोध करते रहे हैं। बेरोजगार युवक इसे एक मौके के तौर पर देखते हैं और विरोध दबाने में कंपनी के साथ हो जाते हैं। देवाल के महिपत सिंह कहते हैं कि इस परियोजना से दौ सौ बावन मेगावाट बिजली उत्पन्न हो ही नहीं सकती। वे कैल नदी का उदाहरण देते हैं जो पिंडर की सहायक नदी है। कैल नदी पर एक छोटा हाइड्रो पावर प्लांट लगा है जो दो मेगावाट बिजली भी नहीं पैदा करता। अगर आप पिंडर में उससे चार गुना ज्यादा पानी भी मान लें तब भी सुरंग के द्वारा कंपनी के दावे के अनुसार बिजली नहीं बन सकती। टिहरी का उदाहरण ही लें, वहां पच्चीस सौ मेगावाट बिजली पैदा करने का दावा किया गया था, लेकिन इतने सालों बाद भी छह सौ मेगावाट से ज्यादा बिजली पैदा नहीं हो रही है। यानी बिना कैचमेंट एरिया बढ़ाए यह परियोजना सफल नहीं हो सकती। कुल डेढ़ सौ किलोमीटर लंबी पिंडर नदी चमोली और कुमाऊं दोनों ही जिलों में बहती है। सतलुज जल विद्युत निगम ने अपने सर्वे में सैकड़ों मकानों के साथ-साथ उन वनस्पतियों को भी छोड़ दिया है जो डूब क्षेत्र में आएंगे।

सतावर, दारू, हल्दी, लता कस्तूरी, कपूर कचरी, तिमुर, सीवाई, पिपरमेंट, पोदीना, शालम मिस्त्री, वन प्याज, बला, शंखपुष्पी जैसी बहुमूल्य जड़ी-बूटियों की सूची काफी लंबी है। इनमें से कई वनस्पतियों का वर्णन पुराणों में भी है, उन्हें कंपनी ने जंगली वनस्पति माना है। पिंडर क्षेत्र में इन परियोजनाओं के निर्माण से चारागाह पूरी तरह नष्ट हो जाएंगे। देवसारी परियोजना क्षेत्र के चारों ओर सतलुज जल विद्युत निगम ने पत्थरों पर निशान लगा दिए हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि इस विशाल क्षेत्र में कंपनी की मर्जी के बिना कोई आ-जा नहीं सकता। यहां तक की एक गांव से दूसरे गांव तक जाने का रास्ता भी बेहद लंबा हो गया है।

हालांकि कई लोग ऐसे भी हैं जो अपनी खेती के बदले मुआवजा लेने को तैयार हैं। सुरेंद्र पोखरियाल बांध विरोधियों के विरोधी हैं। वे मानते हैं कि पहली बार उत्तराखंड की नदियां यहां के निवासियों को कुछ दे रही हैं तो इसका विरोध क्यों। पिंडर घाटी क्षेत्र में रोपाई पद्धति से धान की खेती नहीं होती। छिड़काव से इतना धान होता है कि आठ नाली (खेत की ईकाई) से एक परिवार के लिए साल भर का धान हो पाता है बाकि चीजों के लिए उन्हें दूसरे कामों पर निर्भर रहना पड़ता है।

पिंडर नदी पर बन रहे बांध का विरोध करते स्थानीय लोगपिंडर नदी पर बन रहे बांध का विरोध करते स्थानीय लोगनरेंद्र पोखरियाल बीस नाली के छोटे किसान हैं। उन्हें हर नाली पर एक लाख रुपए के हिसाब से पैसा दिया जाएगा और सरकार द्वारा निर्धारित मुआवजा अलग से मिलेगा। उन्हें करीब पैंतीस लाख रुपए मिलेंगे। इस पैसे से वे नोएडा में पढ़ रही अपनी बेटी की फीस भी चुकाएंगे और बड़े बेटे की शादी करेंगे और भविष्य के लिए देवाल में ही छोटे बेटे के साथ मिलकर एक किराने की दुकान चलाएंगे। लेकिन पहाड़ में हर कोई इतनी योजनाएं बनाकर नहीं चलता। जीविका के बदले जीविका ने देकर सरकार पैसा दे रही है यही सबसे बड़ा धोखा है।

इतना ही नहीं बांध कंपनियां अपने सीएसआर यानी कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी को भी क्षेत्र में फूट डालने के लिए इस्तेमाल करती है जिस कोष से स्कूल, अस्पताल, प्याऊ वगैरह बनने चाहिए उस कोष को कंपनियां गांव के अंदर छोटे मंदिर या पुलिया बनाने में खर्च करती है और इसका ठेका गांव के उन नौजवानों को दिया जाता है जो उनका सबसे ज्यादा विरोध करते रहे हैं। बेरोजगार युवक इसे एक मौके के तौर पर देखते हैं और विरोध दबाने में कंपनी के साथ हो जाते हैं। अपने खातों में कंपनियां इस पैसे को सामाजिक जिम्मेदारी के तहत खर्च किया बताती है। कंपनियां इन युवकों को संस्था बनाने के लिए प्रेरित करती हैं ताकि उन्हें काम दिया जा सके। नतीजतन हर गांव में तीन-चार संस्थाएं बनी हुई हैं और प्रभावित गांवों के नौजवान एक अलग ही किस्म की राजनीति में उलझ कर रह गए हैं।

कर्णप्रयाग के बाद अलकनंदा और पिंडर के रास्तों पर बनने वाली सभी सुरंगों और सड़कों का मलबा सीधे नदी में गिराया जा रहा है। न तो कंपनी और न ही सरकार के पास इस मलबे के निपटान की कोई योजना है इस मलबे में शामिल बारूद से जलचर कितने नष्ट हो रहे हैं इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। जलमुर्गी और उदबिलाव अब देखने को नहीं मिलते विस्फोट से निकले कई पत्थरों को प्लांट में उपयोग में लाया जाता है। इसके लिए इन पत्थरों को पानी से धोते हैं और वह पानी सीधा नदी में ही जाता है।

राजजात का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव देवाल मंचमहाप्रयाग है। दिनेश मिश्र इस क्षेत्र के सम्मानित व्यक्तियों में हैं। राजजात की तैयारियों में काफी पहले से जुटे मिश्र जानते हैं कि यात्रा में शामिल लोग यहां से स्नान के बाद ही आगे बढ़ते हैं। वे कहते हैं कि बद्रीनाथ के बाद देवाल ही एक मात्र स्थान है जहां ब्रह्म कपाल शिला मौजूद है। वे कहते हैं कि बांध बना तो पूरा क्षेत्र डूब जाएगा और लाखों श्रद्धालु इस पवित्र स्थान को खो देंगे और भविष्य में होने वाली राजजात भी खुद की पूर्णता का दावा नहीं कर पाएगी।

जल्द ही विकास की शिकार इस खूबसूरत घाटी में सरपट दौड़ती गाड़ियां राजजात को भी महज कुछ दिनों में सिमटा देंगी। बस फर्क इतना रहेगा कि इन राहों पर न वे घाटियां रहेंगी न वे स्थल न वह आस्था और न ही वह राजजात करने वालों के पदचिह्न जिसने लगातार कितने सालों तक यहां से गुजर कर इन पत्थरों को घिस कर उन पर अपने पदचिह्न छोड़े थे। बस रहेगी तो कुछ सुरंगें जिनमें से कभी चट्टानों से टक्कर लेने वाली पिंडर रिसती हुई बह रही होगी।

गलतियों को दोहराना नहीं चाहिए


विमल भाई से अभय मिश्र की बातचीत

इन बांधों का विरोध क्यों हो रहा है?
देश और उत्तराखंड में आज तक जितनी भी जल विद्युत परियोजनाएं बनी हैं उनमें न तो पहले से घोषित किया गया उत्पादन हो रहा है न ही पर्यावरण मानकों का पालन हो पाया है। वन संरक्षण, पहाड़ों और जल ग्रहण क्षेत्र के उपचार भी कागजों पर नजर आते हैं। टिहरी जैसे बांधों के लाभ क्षेत्र में भूमि के लवणीयकरण के उपचार की कोई योजना नहीं है। न ही पुनर्वास का काम पूरा हो पाया है।

कहा जा रहा है कि पहली बार उत्तराखंड की नदियां यहां के लोगों को कुछ दे रही है जैसे विकास और रोजगार?
विकास और रोजगार आज के दौर के सबसे बड़े धोखेबाज शब्द हैं। देश में किसी भी बांध पर कोई आकलन नहीं है कि इससे स्थायी रोजगार कितना उत्पन्न हुआ। दूसरी तरफ कृषि और वन आधारित आय के स्रोत समाप्त हुए हैं। स्थानीय लोगों को बांध कंपनी नौकरी नहीं देती सिर्फ कुछ समय काम देती है वह भी इसलिए कि बांध निर्माण के लिए मजदूर बाहर से लाने से बेहतर है कि यहीं से काम चला लिया जाए।

बांधों का ज्यादा विरोध आस्था के नाम पर हो रहा है?
ऐतिहासिक गलतियों को बार-बार दोहराया नहीं जाना चाहिए। जहां तक आस्था की बात है, गंगा पर बांध बनाने वाले हिन्दू हैं। मध्यप्रदेश में उमा भारती के हस्ताक्षर के बाद हरसूद डूबा था। वे श्रीनगर जाकर धारी देवी को बचाने की बात करती हैं। लेकिन वहां का जल आचमन के योग्य रहेगा या नहीं इसकी कोई बात नहीं होती है। गंगा के बजाय गंगा किनारे बने मंदिरों की चिंता करने वाले नेता और संत भ्रम फैला रहे हैं।

पिछले दिनों तेजी से बांध समर्थन में लोग लामबंद हुए हैं, इसके पीछे कारण क्या आंदोलन के पक्ष में विश्वास की कमी है?
यह भ्रम है कि उत्तराखंड की जनता बांध समर्थन मे खड़ी है। बल्कि सच यह है कि विश्व बैंक के पैसे पर चलने वाले स्वयं सेवी संगठन और बांध के ठेकेदार वगैरह की लॉबी आक्रामक रूप में बांध समर्थन का भ्रम फैलाए हैं। उन्होंने इस पूरी बहस को आस्था बनाम बांध का बना दिया है। वास्तव में बांधों के असर को इतिहास की गलतियां और भविष्य की योजना के संदर्भ में देखना चाहिए।

पिंडर की थ्याणी


बांध का विरोध करती महिलाएंबांध का विरोध करती महिलाएंकुछ महिलाएं एक बड़े पेड़ को बेतरतीब काट रही थी, पहाड़ पर यह नजारा अमूमन देखने को नहीं मिलता। लेकिन पिंडर घाटी के पैठाणी गांव की महिलाओं का यह दुस्साहस पिंडर की रक्षा के लिए ही है। पिंडर के पार पहाड़ पर सतलुज जलविद्युत निगम परिक्षण सुरंग खोद रहा था मजदूरों और सामान के सुरंग तक जाने के लिए गरारी को इसी पेड़ से मजबूती के साथ बांधा गया था। लगातार विरोध के बाद भी जब पुलिस और प्रशासन ने सुरंग का काम नहीं रुकवाया तो महिलाओं ने उस पेड़ को ही काट दिया। पुष्पा नेगी, विमला परिहार, दमयंती एक स्वर में बताती हैं कि हमारा जंगल जाने का रास्ता यहीं से था। एक दिन देखा खुदाई का काम चल रहा था। पहले तो हमने भाई-बंधु कह कर उन्हें रोकने की कोशिश की अगले दिन वहां चबूतरा बनाया जा रहा था और हमसे कहा गया कि आप लोगों के लिए गणगौर जाने का रास्ता बनाया जा रहा है। हमने कहा कि नहीं चाहिए रास्ता। फिर भी नहीं माने तो हमने पेड़ ही काट दिया। इसके बाद तो जैसे इन महिलाओं पर मुसीबत आ गई। इन पर चोरी का आरोप लगा कर गिरफ्तार करवा दिया गया। फिर भी महिलाएं वहां से डिगी नहीं, जब तक कि काम पूरी तरह बंद नहीं हो गया। कई दिन चले इस हंगामें में पिंडर घाटी के पुरुषों की सहभागिता न के बराबर थी। पिंडर घाटी की महिलाओं के हौंसले की यह एक बानगी भर है। पिंडर घाटी में सक्रिय महिला मंगल दल के विरोध के चलते बांध कंपनी जन सुनवाई नहीं कर पाई और सरकार के कानों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए खुद ही लोक जन सुनवाई का आयोजन कर दिया।

पैठाणी में महिलाएं घर, खेत और बाजार का सारा काम खुद ही निपटाती हैं और इसके बाद घाटी को बचाने वाली बैठकों में भी हिस्सा लेती हैं। शकुंतला और गीता जैसी कई महिलाएं तो महीने में एक दो बार अपने पतियों को घर में बंद कर देती हैं। दरअसल, बांध कंपनियां यह प्रचारित करती रहती हैं कि लोग बांध के समर्थन में आगे आ रहे हैं जबकि सच्चाई यह है कि कंपनियां शराब बांट कर लोगों को इकट्ठा करती हैं। शराब इस क्षेत्र के पुरुषों की कमजोरी है।

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About the author

.अभय मिश्र - 17 वर्षों से मीडिया के विभिन्न माध्यमों अखबार, टीवी चैनल और बेव मीडिया से जुड़े रहे। भोपाल के माखनलाल राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर।

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