आखिरी लड़ाई की जद्दोजहद

Submitted by Hindi on Fri, 09/28/2012 - 16:49
Source
सर्वोदय प्रेस सर्विस, सितंबर 2012

बांध और विकास योजनाओं की नींव में पत्थर नहीं डले, बल्कि आदिवासियों और ग्रामीणों की हड्डियां डाली गई। आज तक भारत में इसका कोई समग्र आंकड़ा ही नहीं है कि किस परियोजना में कितने लोगों का विस्थापन हुआ और आज वे किस हाल में हैं। जल सत्याग्रह के 13 दिनों तक सरकार लोगों के पास नहीं गई। फिर बात शुरू हुई और बड़ी ही कुटिलता के साथ उन्होंने ओंकारेश्वर यानी एक बांध के तहत जमीन देने की बात मान ली पर दूसरे बांध यानी इंदिरा सागर की बात को फिर से नकार दिया।

सरकार और निजी कारपोरेट साम्राज्य जमीन पर कब्जा चाहता है। विकास की नीतियों को सामने रख कर लोगों को जमीन से बेदखल किया जाता है। लोगों को नकद मुआवजा देने की योजना बनाई जाती है। एक हाथ से नकद राशि दी जाती है और दूसरे हाथ से उन्हें जीवन की जरूरतों को जुटाने और कुछ उपभोक्तावादी व्यवहार में फंसाकर मुआवजे की पूरी नकद राशि सुनियोजित ढंग से छीन ली जाती है। सरकार नकद मुआवजे की राशि बढ़ाने को तैयार है पर वह कभी भी संसाधनों यानी जल, जंगल और जमीन पर हक देने को तैयार नहीं है। मध्य प्रदेश में तवा नदी पर तवा बांध बना। बांध प्रभावित लोग तवा जलाशय में मछलीपालन और उसके व्यापार का हक चाहते थे। उन्हें बहलाने के लिए कुछ वर्ष मछलीपालन की अनुमति दी गई फिर उनसे यह हक छीन लिया गया। इसी तरह मध्यप्रदेश के ही आष्टा में पार्वती नदी से प्रभावित लोगों को मजदूरी के रूप में ठेकेदारों की गुलामी में काम करने को मजबूर किया गया और उनके संसाधन छीने गए।

बांध और विकास परियोजनाओं की वेदी पर बलि चढ़ाए जाने वाले लोगों, जिनमें 65 प्रतिशत आदिवासी और दलित हैं, के लिए सरकार के पास जमीन नहीं है। वर्ष 2007 से 2012 के बीच निवेश के नाम पर साढ़े चार लाख हेक्टेयर जमीन की व्यवस्था की जा चुकी है। एक आवेदन पर हजारों एकड़ जमीन उद्योगों और जमीन के कारोबारियों को देने के व्यवस्था बना दी गई। 8 सितम्बर 2012 को, जब जल सत्याग्रही अपने लिए जमीन की मांग कर रहे थे, उसी दिन भोपाल में कलेक्टर - कमिश्नर के सम्मेलन में मुख्यमंत्री ने अफसरों को निर्देश दिया है कि 15 सितम्बर 2012 तक 26000 हेक्टेयर जमीन 26 जिलों में निकालें और उद्योग विभाग को हस्तांतरित कर दें ताकि कंपनियों को जमीन दी जा सके। सरकार एक भी ऐसा उदाहरण वंचितों और गरीबों के पक्ष में बता दे जब सरकार ने कहा हो कि इस तारीख तक वन अधिकार कानून के तहत वनों पर हक दे देगें, राशन कार्ड बना देगें या दवाइयों की उपलब्धता सुनिश्चित कर देगें। जहां लूट है, वहां सरकार भी समयबद्ध और प्रतिबद्ध हो जाती है।

जमीन आज भारत के भीतर पनप रहे नए उपनिवेशों के लिए ताकतवर होने का नया हथियार है। देश 8000 लोग भारत के सकल घरेलू उत्पाद के 70 फीसदी हिस्से पर कब्जा रखते हैं। इस कब्जे में सबसे बड़ा हिस्सा जमीनों, पहाड़ों और नदियों पर कब्जे का है। इनकी सत्ता की ताकत इतनी ज्यादा है कि चुनी हुई सरकार भी इनकी अनुमति के बिना कोई नीति नहीं बना सकती है। पूंजी की यही व्यवस्था तय करती है प्राकृतिक संसाधनों पर लोगों का यह कहें कि समुदाय का कोई हक नहीं होगा। खनिज संसाधनों के दोहन, जिसमें हमने देखा कि उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़ में 24 लाख हेक्टेयर जमीन पर 20 कंपनियों ने नजर डाली और उस पर उन्हें कब्जा चाहिए था तो सरकार ने 6 लाख आदिवासियों को जमीन से बेदखल करने के लिए हर वह काम किया गया, जिससे लोगों में सत्ता और पूंजी का आतंक बैठाया जा सके वे संसाधनों की लूट की नीतियों का विरोध करने का विचार भी न कर सकें। मध्य प्रदेश का सिंगरौली जिला देश की ऊर्जा राजधानी बना और साथ ही देश का सबसे प्रदूषित शहर भी। परंतु 2011 की जनगणना के मुताबिक इसी जिले के 90 प्रतिशत लोग मिट्टी के तेल यानी केरोसिन के अपने घरों को रोशन करते हैं।

सरकार ने सन् 1951 में बनी पहली पंचवर्षीय योजना से ही अधोसंरचनात्मक विकास की नीतियां बनाना शुरू कर दी थी, जिससे यह तय हो गया कि देश के गांवों और प्राकृतिक संसाधनों के शोषण से ही हमारे विकास का ढांचा खड़े होने वाला है। इसके लिए लोगों का विस्थापन होना लाजिमी था। भाखड़ा नांगल और हीराकुंड बांधों से बड़ी परियोजनाओं की प्रक्रिया शुरू हुई, पर एक भी दस्तावेज में यह उल्लेख नहीं किया गया कि जिनका विस्थापन होगा, उनका पुनर्वास भी राज्य की जिम्मेदारी होगी। विकास योजनाओं की नींव में पत्थर नहीं डले, बल्कि आदिवासियों और ग्रामीणों की हड्डियां डाली गई। इस वक्त 7177 बड़ी विकास परियोजनाएं चल रही हैं, परन्तु कभी भी यह जानकारी संकलित नहीं की गई कि कहां, कौन विस्थापित हो रहा है, लोग कहां जा रहे हैं, विस्थापन के बाद उनकी जिन्दगी का क्या हुआ?

उत्तरपूर्व के राज्यों में 100 बांध बन रहे हैं, उत्तराखंड में गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों को बांधों से बांध दिया गया है। अब वह एक ठंडा इलाका नहीं रह गया है। वहां पहाड़ों पर आग जल रही है और पहाड़ तप रहे हैं। मध्य प्रदेश में बुंदेलखंड और बघेलखंड इलाकों में 15 सालों से बार-बार सूखा पड़ रहा है, वहां विकास के लिए बनी नीति में ताप ऊर्जा के 30 संयंत्र लगाए जा रहे हैं। कुडनकुलम में हजारों लोग कह रहे हैं परमाणु संयंत्र मानव सभ्यता को नष्ट कर सकते हैं, इसलिए परमाणु संयंत्र मत लगाओ। जो भी यह कह रहा है कि बिजली पैदा करने के लिए हम दुनिया में स्थायी अंधेरा लाने की ओर बढ़ रहे हैं, इसे रोका जाए तो सरकार और पूंजी के समर्थक उसे राष्ट्रद्रोही करार दे रहे हैं। ऊर्जा के नाम पर जिस तरह का पागलपन दर्शाया जा रहा है वह विकास की सोच में आ चुकी विकृति को दर्शाता है। किसके लिये इस बिजली का उत्पादन होगा? देश में 60 प्रतिशत बिजली, 600 उद्योगों, माल और एअरपोर्ट द्वारा उपयोग की जाती है। लेकिन इसके लिए पिछले 50 वर्षों में 6 करोड़ लोगों को विस्थापित किया जा चुका है और उनकी जमीन और जंगल डुबोए जा चुके हैं। इतना ही नहीं उनसे अपेक्षा है कि अपना सबकुछ डूब जाने के बाद भी वे चुप रहें। जब नर्मदा घाटी में लोग, जिनका सब कुछ उजड़ा है, जमीन मांगते हैं तो मुख्यमंत्री, कैबिनेट मंत्री से लेकर नौकरशाही और उसी पक्ष के पत्रकार बुद्धिजीवी यह कहने लगते हैं कि ये लोग विकास विरोधी हैं और उनकी मांगे जायज नहीं हैं। सच तो यही है कि हमारी पक्षधरता क्या है? हम किसके पक्ष में है? आखिर जायज और नाजायज का निर्धारण कौन करेगा?

आज तक भारत में इसका कोई समग्र आंकड़ा ही नहीं है कि किस परियोजना में कितने लोगों का विस्थापन हुआ और आज वे किस हाल में हैं। जल सत्याग्रह के 13 दिनों तक सरकार लोगों के पास नहीं गई। फिर बात शुरू हुई और बड़ी ही कुटिलता के साथ उन्होंने ओंकारेश्वर यानी एक बांध के तहत जमीन देने की बात मान ली पर दूसरे बांध यानी इंदिरा सागर की बात को फिर से नकार दिया। शायद कुछ लोगों के लिए अब हर लड़ाई आखिरी लड़ाई बन गई है, नहीं तो कौन आत्महत्या करना चाहेगा? सबकुछ खो जाता है तब भी लोग पुनः बनाने की चाहत रखते हैं पर जब यह लगने लगे कि उन्हें फिर से जिन्दगी खड़ी नहीं करने दी जायेगी, तब मन में यही विचार आता है कि बस अब यही आखिरी लड़ाई है।

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