पुतले हम माटी के

Submitted by Hindi on Thu, 11/08/2012 - 16:38
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गांधी मार्ग, नवंबर-दिसंबर 2012
विज्ञान और शोध की दुनिया में हमारे इन मित्र जीवाणुओं के प्रति प्रीति और रुचि हाल ही में बढ़ी है। वो भी इसलिए कि एंटीबायोटिक दवाओं का असर कम होने लगा है। रोगाणु इन्हें सहने की ताकत बना लेते हैं और मजबूत हो जाते हैं। फिर और नए और मंहगे एंटीबायोटिक पर शोध होता है। इस शोध के दौरान वैज्ञानिकों को समझ आया कि शरीर में कुछ और भी जीवाणु हैं और इनसे हमारा संबंध धरती पर जीवन के उद्गम के समय से है। यह कहना ज्यादा सही होगा कि ये हमारे पुरखे ही हैं। आज हम मंगल ग्रह के भूगोल के करीबी चित्र देखते हैं, चांद पर पानी खोजते हैं और जीवन की तलाश में वॉएजर यान को सौरमंडल के बाहर भेजने की कूवत रखते हैं। लेकिन हमारे शरीर पर और उसके भीतर रहने वाले अरबों जीव-जीवाणुओं के बारे में हम बहुत कम ही जानते हैं, जबकि इनसे हमारा लेन-देन हर रोज, हर पल होता रहता है। विज्ञान इस आदि-अनंत संबंध का एक सूक्ष्म हिस्सा अब समझने लगा है। इस संबंध का स्वभाव होड़, प्रतिस्पर्धा कम सहयोग ज्यादा है। इस नई खोज से हमारी एक नई परिभाषा भी उभरती है। ‘मैं कौन हूं’ जैसे शाश्वत और आध्यात्मिक प्रश्न का भी कुछ उत्तर मिल सकता है! जीव शब्द से हम सब परिचित हैं। अणु से भी हम सब नहीं तो हममें से ज्यादातर परिचित हैं ही। पर जब ये दोनों शब्द जुड़ कर जीवाणु बनते हैं तो उनके बारे में हममें से मुट्ठी-भर लोग भी कुछ ज्यादा जानते नहीं। इन सूक्ष्म जीवाणुओं को समझना हमारे लिए अभी भी टेढ़ी खीर है। कुछ यों कि सुई के छेद से एक मोटी-सी रस्सी निकालना। प्रकृति ने हमें जैसी आंख दी है, उससे मंगल ग्रह की लालिमा तो दिख जाती है पर उन करोड़ों जीवों का रंग नहीं दिखता जो हमारी अपनी चमड़ी पर रहते हैं। अगर फोड़ा हो जाए तो उसकी लाली देख हम सोचते हैं कि किसी रोगाणु से संक्रमण हो गया होगा। पर उन हजारों जीवाणुओं से हमारा परिचय भी नहीं होता जो घाव को जल्दी से भरने के लिए आ बैठते हैं और नए रोगाणु को उस जगह पर अपना घर बनाने से रोकते भी हैं।

बदले में उन्हें हमारी चमड़ी से खाना मिलता है, मृत कोशिकाओं का। ये जीवाणु हमारे चर्म पहरेदार ही नहीं, चर्म सफाई कर्मचारी भी हैं। लेकिन हम इन्हें जान नहीं पाते। अगर ये हमें सफाई और पहरेदारी का बिल भेजें तो शायद हमें इनकी असली कीमत पता लगे। या जब-तब ये हड़ताल कर दें। लेकिन जीवाणु तो अपना काम सतत करते रहते हैं, चाहे हम उन्हें जानें या न जानें। वे हमसे कभी कोई प्रशस्ति पत्र नहीं मांगते, कभी अपने अधिकारों के लिए क्रांति का उद्घोष नहीं करते, मंहगाई भत्ता भी नहीं मांगते। चाहे काम कितना भी कठिन हो वे सहज रूप से उसे करते रहते हैं। काम भी इतना कठिन करते हैं कि हम उसे करने के लिए बहुत मंहगे कारखाने भी बना लें तो भी उस किफायत से नहीं कर पाएंगे।

प्रकृति का व्यापार सहज लेन-देन से, परस्पर सहयोग से चलता है। यह किसी कागज के अनुबंध पर दस्तखत करने से नहीं चलता। इसमें कोई वकील और कचहरी नहीं होती, कोई हुंडी या कर्जा नहीं होता। उसका कोई संविधान नहीं होता और किसी के भी अधिकार कानून में नहीं लिखे होते। इस दुनिया की सहज आपसदारी हमारे निर्णय-अनिर्णय, हमारी चेतना तक की मोहताज नहीं है।

हमारी समझ का दायरा कुछ छोटा है, इस सूक्ष्म दुनिया को समझने के लिए। और हमारी नजर है जरा मोटी। वर्ना क्या कारण है कि हम अपनी नाक पर बैठे जीवन के मूल को समझने के बजाए मंहगे से मंहगे अंतरिक्षयान बना धरती से दूर जीवन खोजते फिरते हैं? करें भी क्या? जो दिखता नहीं उस पर हमें सहज विश्वास नहीं होता। संत सूरदास को बिना दृष्टि के जो दिखा था वो तो उनके कवित्त से महसूस ही किया जा सकता है। उनकी श्रद्धा पर वैज्ञानिक शोध बेकार ही होगा।

सूरदासजी की आंखों में रौशनी चाहे न भी रही हो, संभावना ये है कि उनकी पलकों पर डेमोडेक्स माइट नाम का एक जीवाणु जरूर रहा होगा। वो इस पत्रिका के कई पाठकों की पलकों पर भी बैठा होगा। आठ पैर वाला ये सूक्ष्म प्राणी हमारी पलकों की जड़ के आसपास विचरता है। हमारी उमर बढ़ने के साथ डेमोडेक्स का साथ भी बढ़ता जाता है। रात को जब हम सो जाते हैं तब यह हमारे चेहरे की चमड़ी पर टहलने निकलता है। लंबी दौड़ का यह कीड़ा एक घंटे में कई एक सेंटीमीटर की दूरी कर लेता है! कभी-कभी ये थोड़ा बहुत उत्पात भी करता है, तब पुतली पर सूजन या लाली आ जाती है। पर ज्यादातर इसकी उपस्थिति का हमें आभास नहीं होता।

हमारे शरीर के ऊपर और भीतर रहने वाले इन सचमुच अनगिनत प्राणियों में डेमोडेक्स का आकार काफी बड़ा है। फिर भी इनमें ज्यादातर तो माईक्रोस्कोप के नीचे भी मुश्किल से ही दिखते हैं। इनकी संख्या हमारे शरीर की अपनी कोशिकाओं से दस गुणा अधिक होती है। वैज्ञानिक अनुमान लगाते हैं कि हम में से हर एक का शरीर कोई 90 लाख करोड़, यानी 90,00,00,00,00,00,000 जीवाणुओं का घर है। यदि आपका वजन 90 किलोग्राम मान लें तो इसमें एक से तीन किलोग्राम वजन तो केवल आप के शरीर पर जीने वाले जीवाणुओं का होता है। पर ये बोझा कोई बोझा नहीं है। एकदम उठाने लायक है, क्योंकि इस एक किलो से ही बाकी 89 किलो का काम चलता है।

अगर हमारे आपके शरीर में, हर शरीर में जीवाणु इतनी तादाद में हैं तो हमें भला इनकी मौजूदगी का आभास क्यों नहीं होता? सीधा कारण है। जो जीव माइक्रोस्कोप के नीचे भी मुश्किल से दिखें उनसे परिचय कैसे हो? उनका कोई जनसंपर्क विभाग भी तो नहीं होता जिसके प्रवक्ता टी.वी. पर आकर बयान दें।

विज्ञान तो अब हममें से हर किसी के शरीर को एक अलग ग्रह के रूप में देखता है, जिस पर कुछ करोड़ों प्राणी जीते हैं। कुछ वैसे ही जैसे धरती पर हम कई तरह के पेड़ पौधों और पशुओं के साथ जीते हैं। अंतरिक्ष से देखने पर जितना महत्व हमारे अस्तित्व का है, जीवाणुओं का हमारे शरीर पर महत्त्व उससे कहीं ज्यादा है। और अंतरिक्ष से देखते हुए किसी को पहचान लेना जितना कठिन है, उतना ही कठिन हमारे शरीर पर रहने वाले जीवाणुओं को पहचानना है।

ये थे तो हमारे साथ हजारों बरस से पर पहली बार इन्हें हमने माइक्रोस्कोप के द्वारा आज से 336 साल पहले देखा था। लेकिन इनकी कुछ कहने लायक जानकारी मिलनी तो हमें 150 साल पहले ही शुरू हुई। इन जीवाणुओं का पता चलने के बाद भी इनसे हमारा परिचय एकतरफा ही रहा। ज्यादातर शोध बीमारी फैलाने वाले रोगाणुओं पर ही हुई है। वह भी एंटीबायोटिक दवा बनाने वाली कंपनियों ने ही की है। क्योंकि जितनी जानकारी रोगाणु की हो उतना ही दवाएं बनाना आसान हो जाता है। जो जीवाणु कोई बीमारी नहीं फैलाते या कहें कि हमें बस फायदा ही कराते हैं, दवा बनाने वालों ने उनकी अवहेलना ही की है। शोध करने वालों की दृष्टि में ऐसा कुछ होता है कि उन्हें अच्छाई सरलता से दिखती नहीं है। निरोग पर शोध करने से मुनाफा नहीं होता। मुनाफे के लिए बेहतर है रोग ढूंढ़ें और फिर उस रोग का उपचार खोजें। दवाएं बेचने वाले हमें हर तरह से जीवाणुओं का हौआ ही बताते हैं। बैक्टीरिया और वायरस के नाम ऐसे लिए जाते हैं कि जैसे वे कोई आतंकवादी संगठन हों। इससे स्वस्थ विचार फैले न फैले, घोर अज्ञान जरूर फैलता है।

विज्ञान और शोध की दुनिया में हमारे इन मित्र जीवाणुओं के प्रति प्रीति और रुचि हाल ही में बढ़ी है। वो भी इसलिए कि एंटीबायोटिक दवाओं का असर कम होने लगा है। रोगाणु इन्हें सहने की ताकत बना लेते हैं और मजबूत हो जाते हैं। फिर और नए और मंहगे एंटीबायोटिक पर शोध होता है। इस शोध के दौरान वैज्ञानिकों को समझ आया कि शरीर में कुछ और भी जीवाणु हैं और इनसे हमारा संबंध धरती पर जीवन के उद्गम के समय से है। यह कहना ज्यादा सही होगा कि ये हमारे पुरखे ही हैं। धरती पर जीवन का सबसे व्यापक प्रकार सूक्ष्म जीवाणु ही हैं। चाहे वनस्पति हो या पशु-जीवाणुओं के बिना किसी का जीवन एक क्षण भी नहीं चले। मिट्टी में मौजूद जीवाणुओं के बिना पौधे जमीन से अपना खाना नहीं निकाल सकते। बिना जीवाणुओं के मरे हुए पौधे और पशु वापस खाद बन कर नए जीवन में नहीं पहुंच सकते। जीवन की लीला की सबसे पुरानी, सबसे बुनियादी इकाई जीवाणु ही हैं।

हमारे शरीर में इनका खास ठिकाना है हमारा पाचन तंत्र। यानि मुंह, पेट और हमारी आंत। यहां करोड़ों जीवाणु हमारे भोजन के एक सूक्ष्म हिस्से पर पलते हैं। इनके रहने से हमें तीन बड़े फायदे हैं:

एक, इनकी उपस्थिति भोजन को पचाने में बहुत अहम है। भोजन में मौजूद कई तरह के जटिल रसों को ये सरल बनाते हैं, इस रूप में लाते हैं कि हमारी आंत से यह रस खून में सोखा जा सके, जहां से वो हमारे शरीर के हर हिस्से में पहुंचता है। जैसे फसल को काट कर, साफ करके बोरों में बांधा जाए ताकि अनाज की जहां जरूरत हो वहां मिल जाए। काम ये बहुत मेहनत का है, जैसे कच्ची सामग्री से भोजन तैयार करना। जैसे कोई रसोईया सब्जी से तरकारी, चावल से भात और गेहूं से रोटी बनाता है, वैसे ही ये करोड़ों जीवाणु हमारे खाने को सुपाच्य और सुगम बनाते हैं।

इसे करने के लिए कई तरह के रसायन चाहिए। हमारा शरीर इतने रसायन खुद नहीं बना सकता सो वह इन जीवाणुओं को अपने भीतर पालता है। जीवाणु ये काम विश्व स्वास्थ्य संगठन या स्वास्थ्य मंत्रालय के निर्देश पर नहीं करते हैं। उन्हें रोटी, कपड़ा और मकान मिलते हैं हमारी आंत में। हम सभी को यह अनुभव हो चुका है कि जब किसी रोगाणु को मारने के लिए हम एंटीबायोटिक दवाएं लेते हैं तो हमारा पाचन और स्वाद, दोनों बिगड़ जाता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि ये दवाएं रोगाणुओं को मारें या न मारें, हमारे मित्र जीवाणुओं को तो जरूर ही मार देती हैं। जब तक ये सूक्ष्म मित्र हमारे शरीर में लौट कर वापस न आएं, खाना पचाना तो कठिन होता ही है, मुंह में जाएका भी नहीं रहता। जिसे हम दवा मानते हैं, वह नए रोग का कारण भी बन जाती है।

यह नया शोध समझा रहा है कि हमारा मोटा होना या न होना हमारे पेट में रहने वाले जीवाणुओं पर निर्भर होता है। शायद आप ऐसे लोगों को जानते हों जो बहुत ज्यादा खाते हैं फिर भी दुबले ही बने रहते हैं। फिर ऐसे भी लोग मिलते हैं जिनका भोजन बहुत ज्यादा नहीं होता पर शरीर भारी होता है। मधुमेह रोग में भी जीवाणुओं के संतुलन बिगड़ने का हाथ देखा जाने लगा है। हमारे चित्त पर आनंद-अवसाद में, दुख-सुख में तो जीवाणुओं का हाथ होता ही है, हमारे निर्णय और विवेक पर भी उनका दखल रहता है। हमारे पेट में रहने वाला एक जीवाणु हैलिकोबैक्टर पाइलोरी के नाम से जाना जाता है। कभी-कभी इससे पेट के कुछ रोग हो जाते हैं, जो कैंसर जैसा खतरनाक रूप भी ले सकते हैं। एंटीबायोटिक दवाओं से इसे बहुत कम करने के बाद पता चला की इसकी मौजूदगी पेट के स्वास्थ्य के लिए जरूरी भी होती है, क्योंकि ये पेट के तेजाब को काबू में रखता है और पेट के बारीक रसायनशास्त्र में अच्छा दखल भी देता है। एक तरह के रोग कम करने के फेर में हम किसी और तरह के रोग बढ़ाने में लगे हैं। दवाओं पर खर्चा बढ़ा, सो बात अलग!

विज्ञान तो अब हममें से हर किसी के शरीर को एक अलग ग्रह के रूप में देखता है, जिस पर कुछ करोड़ों प्राणी जीते हैं। कुछ वैसे ही जैसे धरती पर हम कई तरह के पेड़ पौधों और पशुओं के साथ जीते हैं। अंतरिक्ष से देखने पर जितना महत्व हमारे अस्तित्व का है, जीवाणुओं का हमारे शरीर पर महत्त्व उससे कहीं ज्यादा है। और अंतरिक्ष से देखते हुए किसी को पहचान लेना जितना कठिन है, उतना ही कठिन हमारे शरीर पर रहने वाले जीवाणुओं को पहचानना है। अलग-अलग इलाकों में रहने वाले लोगों के पेट में जीवाणु भी अलग-अलग तरह के होते हैं। इसका एक संबंध खान-पान से भी है। जिस तरह का भोजन एक जगह खाया जाता है, उसे पचाने वाले जीवाणु भी खास ही होते हैं।

मित्र जीवाणुओं से दूसरा फायदा हमें ये होता है कि ये रोगाणुओं को दबा कर रखते हैं। कुछ वैसे ही जैसे करोड़ों सैनिक हमारे शरीर की पहरेदारी कर रहे हों। क्यों करते हैं ये ऐसा? क्योंकि रोगाणु भी उसी भोजन का पीछा करते हैं जिस पर ये हमारे शांति सैनिक पलते हैं। अगर खाना रोगाणु को मिल गया तो ये क्या खाएंगे? और फिर अगर रोगाणु ने हमें बीमार कर दिया तो उस बीमारी का असर इन पर भी होता है। हमारे स्वास्थ्य में इनका स्वास्थ्य होता है।

रोगाणु और मित्र जीवाणुओं का संबंध जानने के लिए एक बीमारी का किस्सा देखिए- इसे अंग्रेजी में कोलाइटिस कहते हैं और इसका एक बड़ा कारण क्लास्ट्रोडियम डिफ्फिसाइल नाम का बैक्टीरिया है। ये बैक्टीरिया जाने कब से मनुष्य की निचली आंत में घर करे बैठा है, लेकिन वहां रहने वाले मित्र जीवाणु इस ढीठ को काबू में रखते हैं, इसे उत्पात मचाने नहीं देते। इस रोगाणु ने एंटीबायोटिक दवाओं को सहन करना सीख लिया है। लेकिन इसे काबू में रखने वाले जीवाणु इन दवाओं से मारे जाते हैं।इनसे हमारा संबंध करोड़ों साल और लाखों पीढ़ियों का है। हमारी दोस्ती जन्मजात है, चाहे हमें पता हो या नहीं। अपने दोस्त को नुकसान पहुंचाने वाले को ये आड़े हाथ लेते हैं। हर रोज, हर क्षण। सरल बात को कठिन बनाकर कहने से यदि ज्यादा असर पड़ता है तो कहा जा सकता है कि इनका घोष वाक्य हैः अर्हनिशंसेवामहे! इनकी रुचि हममें है, हमें दवा बेचने वाली कंपनियों में नहीं। तो मित्र जीवाणु पर शोध कम ही हुआ है। बाजारी चिकित्सा तो अभी सौ साल पुरानी भी नहीं है, पर मनुष्य को विज्ञान कोई दो लाख साल पुराना आंकता है। उसके पहले भी हमारे पूर्वज किसी न किसी रूप में रहे ही होंगे। शरीर में रोगप्रतिरोध के बिना उनका समृद्ध होना नामुमकिन था। अगर मनुष्य जाति बची है तो इसलिए कि जितने रोग फैलाने वाले कीटाणु रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा मित्र जीवाणु रहे हैं, जिनकी समृद्धि हमारी समृद्धि पर ही टिकी हुई थी।

रोगाणु और मित्र जीवाणुओं का संबंध जानने के लिए एक बीमारी का किस्सा देखिए- इसे अंग्रेजी में कोलाइटिस कहते हैं और इसका एक बड़ा कारण क्लास्ट्रोडियम डिफ्फिसाइल नाम का बैक्टीरिया है। ये बैक्टीरिया जाने कब से मनुष्य की निचली आंत में घर करे बैठा है, लेकिन वहां रहने वाले मित्र जीवाणु इस ढीठ को काबू में रखते हैं, इसे उत्पात मचाने नहीं देते। इस रोगाणु ने एंटीबायोटिक दवाओं को सहन करना सीख लिया है। लेकिन इसे काबू में रखने वाले जीवाणु इन दवाओं से मारे जाते हैं। नतीजा ये होता है कि एंटीबायोटिक लेने के बाद इस रोगाणु का प्रकोप बढ़ जाता है। इसके ऐसे प्रकार भी बन गए हैं जिन पर अब हमारी किसी भी दवा का असर नहीं होता। हाल ही में इसका एक नया उपचार ढूंढ़ा गया है। किसी स्वस्थ व्यक्ति के मल का एक छोटा-सा हिस्सा रोगी की आंत तक पहुंचा दिया जाता है। बस, मित्र जीवाणुओं के पहुंचते ही इसका प्रकोप घट जाता है।

जीवाणुओं से तीसरा फायदा मिलता है हमारे रोगप्रतिरोध तंत्र को। प्रकृति ने हमें सहज ही रोगों से लड़ने की जो शक्ति दी है, वह कभी कमजोर भी पड़ती है। तब उसको संबल मिलता है जीवाणुओं से। जैसे जीवाणुओं पर शोध कम ही हुआ है, वैसे मां के दूध पर भी शोध कम ही हुआ है। जो थोड़ा-बहुत शोध हुआ है वह शिशु आहार बनाने वाली कंपनियों ने ही किया है जो मां के दूध का पर्याय बन चुके पैकेट या डिब्बे में दूध का पाउडर बेचती हैं। ये तो सबको मालूम ही रहा है कि मां के दूध पर पले बच्चों की रोगप्रतिरोध की ताकत ज्यादा होती है, शरीर कहीं ज्यादा मजबूत होता है। पर यह क्यों होता है- यह रहस्य ही था।

मां के दूध में ऐसे कई रसायन होते हैं जिन्हें शिशु का पेट किसी भी सूरत में पचा ही नहीं सकता। विज्ञान को पता नहीं था कि मां का शरीर अपनी इतनी ऊर्जा खर्च क्यों करता है ऐसे रस बनाने में, जिनका शिशु को कोई लाभ हो ही नहीं। इसका जवाब हाल ही में कुछ वैज्ञानिकों ने खोजा है। उन्होंने पाया कि यह रस उन जीवाणुओं को पोसता है जो शिशु के पेट में रोगाणुओं से लड़ते हैं और शिशु के अपने रोगप्रतिरोध को सहारा देते हैं। तो मां का दूध इन रक्षकों को भी पोसता है। मां का दूध मिलने से पहले ही शिशु को लाभ पहुंचाने वाले ये जीवाणु मां के शरीर से जन्म के समय से मिलने शुरू हो जाते हैं।

लेकिन इस विषय पर शोध करने से मां का कर्ज चुक नहीं जाता। उसके लिए तो हमें अपने आचरण में श्रद्धा लानी होगी। आजकल कुछ लोग अपने बूढ़े माता-पिता को भूल जाते हैं। ठीक वैसे ही जैसे एटीबायोटिक दवाओं के नशे में शोध करने वाले हमें स्वस्थ रखने वाले जीवाणुओं को नजरअंदाज करते हैं।

धरती को भी हर संस्कृति ने मां का ही रूप माना है। हम शुचिता के नाम पर हर वह काम करने लगे हैं, जिससे मिट्टी का स्वभाव बिगड़े। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है सीवर और कृत्रिम खाद। प्रकृति का नियम है कि जो जीवन मिट्टी से पेड़ पौधों के रूप में उगता है वह प्राणियों के पेट से होता हुआ वापिस मिट्टी में मल-मूत्र के रूप में जाए। मिट्टी में ऐसे करोड़ों जीवाणु बैठे रहते हैं जो हमारे मल-मूत्र पर जीते हैं और उसे वापिस पौधों का खाना बना देते हैं। ये जीवन की सहज लीला है और हमारा जीवन इसी से चलता है। हजारों पीढ़ियों से मनुष्य का मल-मूत्र इस सुंदर लीला की एक कड़ी रहा है। मिट्टी की उर्वरता का यह एक स्रोत ही रहा है।

पर युरोप के शहरों में आज से 150 साल पहले वहां की घोर गंदगी कम करने के लिए बड़े-बड़े सीवर बने। पहले युरोप के शहरों में मल-मूत्र सड़कों पर बहता था। कुछ लोग तो ये मानते हैं की ऊंची एड़ी के जूतों का इस्तेमाल इस नर्क से बचने के लिए ही हुआ था, जो बाद में फैशन बन गया! युरोप की नदियों की हालत तब हमारी आज की गंगा-यमुना से बहुत बेहतर नहीं थी। सीवर बनाकर और अपने कुछ लोगों को अमेरिका जैसे दूसरे महाद्वीपों पर भेज कर युरोप के शहर साफ जरूर हुए हैं। लेकिन इसकी कीमत उनकी नदियां ने चुकाई है। दुनिया में अब तक ऐसा कोई सीवर तंत्र नहीं बना जो जल स्रोतों को दूषित न करे। आजकल शहर अपने जल स्रोत अपने मल-मूत्र से बिगाड़ देते हैं। फिर दूर-दूर से किसी और का पानी छीन कर चलते हैं।

दूसरी तरफ खाद की कमी से मिट्टी की उर्वरता घटी तो कृत्रिम खाद की बिक्री और इस्तेमाल बढ़ गया। इस खाद से मिट्टी का ठीक वही हाल हो रहा है, जो हमारे शरीर में एंटीबायोटिक से हो रहा है। मित्र जीवाणु घट रहे है और रोगाणु दिन-ब-दिन और ज्यादा ताकतवर बनते जा रहे हैं। कृत्रिम खाद में कुल जितनी उर्वरता होती है, उसका एक छोटा अंश भर पौधे को मिलता है। क्योंकि उसे पचा कर पौधे के इस्तेमाल लायक बनाने के लिए जीवाणु उसमें होते नहीं। जीवाणुओं को रहने के लिए घर और खाने के लिए भोजन चाहिए। वह उन्हें जीवित चीजों के सड़ने-गलने से ही मिलता है। ठीक जैसे हमारे पेट के भीतर होता है।

आजकल हमारी सरकार देश को खुले में शौच जाने से मुक्त करने की भरसक कोशिश कर रही है। अगर हर किसी के पास सीवर का शौचालय होगा तो हमारे जल स्रोतों का क्या होगा- यह बात सरकार कतई नहीं सोचना चाहती। शायद इसलिए कि निर्मल भारत परियोजना हमारी शर्म से उपजी है, हमारे विवेक से नहीं। हमें खुले में शौच जाने की शर्म तो दिखती है लेकिन अपनी नदियों और तालाबों को सीवर बनाने में कोई शर्म नहीं लगती। जिन शहरों में हमारी सरकारें बैठती हैं वे शहर दूर के गांवों का स्वच्छ पानी छीन लाते हैं। कृत्रिम खाद का बड़ा हिस्सा जल स्रोतों में बह जाता है, जहां वह हमारे मल-मूत्र के साथ मिलकर प्रदूषण करता है। सीवर को साफ करने के संयंत्र तो और बड़ा खतरा बन जाएंगे। यहां पर रोगाणुओं को कम मात्रा में वे सब एंटीबायोटिक मिलते हैं जो हमारी पेशाब के रास्ते वहां पहुंचते हैं। रोगाणुओं को इनसे प्रतिरोध बनाने का मौका जैसा यहां मिलता है वैसा और कहीं नहीं मिलता। अब यह बात सामने भी आने लगी है कि सीवर साफ करने के संयंत्र महाबली या बाहुबली रोगाणु (अंग्रेजी में ‘सुपरबग’) बनाने के कारखाने बनते जा रहो हैं। इन रोगाणुओं से होने वाले रोग लाइलाज हैं। हाल ही में ऐसा एक रोगाणु मिला है, जिसका नाम ‘नई दिल्ली’ रखा गया। फिर खूब विवाद हुआ। विवाद भी नाम पर ही हुआ, हमारे आचरण पर नहीं।

यूरोप की इसी सीवर मानसिकता को हमने विकास की पराकाष्ठा मान लिया है। आजकल हमारी सरकार देश को खुले में शौच जाने से मुक्त करने की भरसक कोशिश कर रही है। अगर हर किसी के पास सीवर का शौचालय होगा तो हमारे जल स्रोतों का क्या होगा- यह बात सरकार कतई नहीं सोचना चाहती। शायद इसलिए कि निर्मल भारत परियोजना हमारी शर्म से उपजी है, हमारे विवेक से नहीं। हमें खुले में शौच जाने की शर्म तो दिखती है लेकिन अपनी नदियों और तालाबों को सीवर बनाने में कोई शर्म नहीं लगती। जिन शहरों में हमारी सरकारें बैठती हैं वे शहर दूर के गांवों का स्वच्छ पानी छीन लाते हैं। जो दिखता नहीं है, उसकी चिंता भी नहीं होती। लेकिन बेशर्मी तो हमारे शहरों में जो दिखता है उसकी भी होती है। खुले में शौच जाना शर्म का सबब बनता है। शहर भर का मैला नदी-तालाब में उंड़ेल देने में हमें कोई शर्म नहीं आती।

इसमें भी शोध और श्रद्धा का फर्क दिखता है, मां के कर्ज के प्रति। गंगा को हमने अपनी मां माना है लेकिन शोध से ही उसके पानी के बारे में जो 100 साल पहले पता चला था, उससे हम मुंह फेरे बैठे हैं। गंगा का जल घर में बरसों तक रखे रखने से खराब क्यों नहीं होता- ये समझने की कोशिश सन् 1896 में एक अंग्रेज चिकित्सक अर्नेस्ट हॅनबरी हॅनकिन ने की थी। वे जानना चाहते थे कि गंगा जल में हैजे के रोगाणु तीन घंटे में ही खत्म कैसे हो जाते हैं। ये बात हमारे गांव के लोग ही नहीं, ईस्ट इंडिया कंपनी के कारिंदे भी जानते थे। इसलिए लंदन वापस जाते समय ये पानी के जहाज में गंगा का पानी ही रखते थे। श्री हॅनबरी के शोध से विज्ञान की एक नई विधा बनी। इससे ऐसे वायरस की खोज हुई जो बैक्टीरिया को खत्म करते हैं। विज्ञान इन्हें ‘फैज’ या ‘बैक्टीरियोफैज’ कहता है।

गंगा जल में ‘फैज’ की मात्रा बहुत अधिक पाई गई है। हमारे पूर्वजों ने चाहे शोध न किया हो, गंगा जल का ये कमाल तो देखा होगा। इसीलिए गंगा जल को मां के दूध की तरह देखा जाता है। क्या मालूम इसीलिए लोग गंगा जल लाकर अपने तालाब और कुंओं में डालते थे ताकि गंगा जल को साफ रखने वाले ‘फैज’ उनके तालाब और कुंओं में भी फैलें और इस पानी को भी निर्दोष बनाए रखें। पर जिस विज्ञान के शोध से गंगा के बारे में हमें ये जानकारी मिली है, उसी विज्ञान ने हमें गंगा में अपना सीवर बहाने को भी राजी कर लिया है। सरकारें तो इसी को विकास मानती है!

ये अजब शोध है जो पहले हमारी श्रद्धा को पाटता है और फिर हमें बताता है कि हमारी श्रद्धा का वैज्ञानिक कारण क्या है! जीवाणुओं के जो थोड़े बहुत गुण हमें पता चले हैं वे तब जब हमने अपने शरीर एंटीबायोटिक दवाओं के हवाले कर दिए हैं। विज्ञान की एक और विधा है जो कहती है कि जीवाणु और रोगाणु की इस लीला को मिटाने की कोशिश में हम नए तरह के रोगों में फंस रहे है। इन्हें एलर्जी कहा जाता है और इनका एक रूप दमा है, जो हमारे समाज में अब सब तरफ, सब उमर के लोगों में बढ़ रहा है। ऐसा माना जाता है कि मिट्टी में पलने-खेलने वाले बच्चों को दमा होने की आशंका कम ही होती है क्योंकि उनका शरीर उस मिट्टी के पास रहता है, जिससे हम बने हैं।

हमारे इस शरीर को बनाने में, बनाए रखने में करोड़ों जीवाणुओं की सेवा लगी है। लेकिन विज्ञान जो हमारा ये नया स्वरूप दिखा रहा है, वह इतना नया भी नहीं है। कई संस्कृतियों ने इस दर्शन को और भी सुंदर रूप में समझा है। वह भी हजारों बरस पहले। ‘आदमी’ शब्द बना है पुराने यहूदी शब्द ‘अदामा’ से, जिसका अर्थ है मिट्टी। अंग्रेजी का ‘ह्यूमन’ भी लैटिन के ‘ह्यूमस’ से बना है और इसका भी अर्थ मिट्टी। जिस मिट्टी से हम बने हैं, उसके प्रति केवल शोध का भाव रखना हमारा उथलापन ही होगा। उसमें थोड़ी सी खाद श्रद्धा की भी डालनी पड़ेगी, फिर से।

हम कभी न भूलें कि हम हैं माटी के ही पुतले।

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