तालाब हैं तो गांव हैं

Submitted by admin on Wed, 11/21/2012 - 09:45
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पंचायतनामा, 19 - 25 नवंबर 2012
लहना गांव का मुख्य तालाबझारखंड की कुल आबादी का 80 प्रतिशत कृषि एवं इससे संबंधित कार्यों पर निर्भर है। जबकि कृषि योग्य भूमि कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 48 प्रतिशत ही है। इसमें भी सिंचाई सुविधा महज 10 प्रतिशत पर ही उपलब्ध है। जबकि राष्ट्रीय औसत 40 प्रतिशत है। रबी में तो यह और घट जाता है। यानी 90 प्रतिशत से अधिक कृषि वर्षा पर आधारित है। जिस साल बारिश अच्छी हुई उस साल ठीक-ठाक उत्पादन होता है और जिस साल बारिश नहीं हुई, उस साल स्थिति चिंताजनक हो जाती है। पलायन एवं बेरोजगारी बढ़ जाती है।राज्य की कुल आबादी के लिए 55 लाख मैट्रिक टन खाद्यान्न चाहिए, लेकिन वर्ष 2008-09 उत्पादन 42 लाख मैट्रिक टन हुआ तो वर्ष 2009-10 एवं 2010-11 में आधे से भी कम। इसी तरह 2011-2012 में अच्छी बारिश हुई तो उत्पादन भी अनुमान से ज्यादा हुआ। स्पष्ट है कि राज्य की खाद्यात्र उत्पादन क्षमता बढ़ानी है तो सिंचाई सुविधा बढ़ानी होगी। राज्य में मुख्य तौर पर चार महीने बारिश होती है। यह भी हर जगह समान नहीं होती है। राज्य का वार्षिक वर्षापात 1400 मिमी है। यह कम नहीं है, लेकिन पहाड़ी एवं पठारी क्षेत्र होने के कारण अधिकांश पानी बह जाता है। ऐसे में तालाबों एवं कुओं की महत्ता बढ़ जाती है। पढिए तालाबों के महत्व व जरूरत को टटोलती उमेश यादव की रिपोर्ट :

रांची जिला मुख्यालय से 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है रातू प्रखंड का लहना गांव। लगभग 1300 की आबादी वाले इस गांव में स्थित है एक बड़ा तालाब। यह पूरे गांव का प्रमुख जलस्रोत है। इसका इतिहास बहुत पुराना है। लहना शिव मंदिर सोसायटी के अध्यक्ष दशरथ साहू के मुताबिक यह लगभग 200 साल पहले तब बना था जब उनके पुरखे यहां आकर बसे थे। तालाब का कुल क्षेत्रफल चार एकड़ और गहराई 20 फीट है। वर्तमान में 15 फीट से अधिक पानी है। शुरू से ही इसकी गहराई अधिक रही है। इसमें सालों भर पानी रहता था, लेकिन वर्षों से सफाई नहीं होने और गाद एवं कीचड़ काफी भर जाने से हाल के वर्षों में यह सूखने लगा था। गहराई घटकर छह फीट हो गयी थी। पिछले साल अप्रैल-मई महीने में भूमि-संरक्षण विभाग की ओर से इसका नवीनीकरण किया गया। 24 लाख रुपये खर्च किये गये। मशीन से पूरे तालाब की सफाई की गयी। दो महीने तक लगातार काम चला। सफाई में काफी मिट्टी निकला। मेढडबंदी के बाद जब मिट्टी अधिक हो गया तो लोगों ने 100-150 रुपये देकर इसे अपने खेतों में डलवाया। सफाई में फिर से तालाब की गहराई लगभग पुरानेस्तर पर आ गयी है। पानी का ठहराव भी दुगुना बढ़ गया है। अध्यक्ष दशरथ साहू (60) के मुताबिक उन्होंने अपने जीवनकाल में इतने बड़ेस्तर पर तालाब की सफाई का काम होते नहीं देखा था। पहले ग्रामीण ही अपने स्तर से मामूली सफाई का कार्य करते थे। बकौल पानी पंचायत के कोषाध्यक्ष भूषण साहू सफाई के दौरान 13 फीट मिट्टी हटाने के बाद भी डामर खूंटा (तालाब की खुदाई के समय पानी मापने के उद्देश्य से लगाया जाना वाल लकड़ी का पीलर) नहीं निकला। इसके बाद छह फीट और खुदाई की गयी। तब जाकर डामर खूंटा निकला। इसके बाद भी काला मिट्टी निकल रहा था, लेकिन ग्रामीणों का निर्णय हुआ कि इसके आगे अब खुदाई नहीं हो। और काम बंद कर दिया गया।

खुदाई के दौरान निकले खूंटे को देखने के लिए पूरे गांव के लोग आये। क्योंकि यह उनके पुरखों की निशानी थी। गांव वालों के लिए यह तालाब किसी वरदान से कम नहीं है। इसलिए इससे फिलहाल सिंचाई का काम नहीं लिया जाता है। यह निर्णय समाज की बैठक में बहुमत से लिया गया है। इतनी गहराई में पानी होने के बाद भी ग्रामीणों का मानना हैकि इससे सभी खेतों का पटवन सालों भर नहीं हो सकता है। और यदि पटवन शुरू किया गया तो कुछ ही महीने में तालाब सूख जायेगा और गांव में भीषण पेयजल समस्या उत्पन्न हो जायेगी। क्योंकि पिछले एक-दो दशक से तालाब के सूख जाने का असर गांव के अन्य जलस्रोतों पर पड़ रहा था। कई कुएं गरमी के दिनों में सूख जाते थे, लेकिन 2011 के मई में तालाब की सफाई होने के बाद आसपास का एक भी कुआं नहीं सूखा। बकौल त्रिवेणी साहू तालाब सफाई का फायदा 2012 के गरमी में ही ग्रामीणों को दिख गया। उनका निजी कुआं कई वर्षों से गरमी में सूख जाता था, लेकिन इस बार एक घर को जितना पानी चाहिए, उतना गरमी के दिनों में भी मिला। यह सिर्फ और सिर्फ तालाब में पानी के ठहराव से हुआ है। इतना ही नहीं उन कुओं का भी जलस्तर बढ़ा है जिससे लोग खेतों की सिंचाई करते हैं। ग्रामीण त्रिवेणी साहू यह भी बताते हैं कि इस तालाब से सिंचाई पर रोक का सबसे ज्यादा फायदा गांव के गरीबों को होता है। तालाब में पानी रहने से बाकी कुओं में भी पानी रहता है। इससे पेयजल समस्या से किसी को जूझना नहीं पड़ता है। सोसायटी के अध्यक्ष दशरथ साहू के मुताबिक गांव के ज्यादातर किसान सीमांत हैं। गिने-चुने लोगों के पास ज्यादा खेती है। जिनके पास ज्यादा खेती है, वे सिंचाई की व्यवस्था दूसरे स्रोतों से आसानी से कर लेते हैं। तालाब खेतों के उपर बना है, इससे नीचे के खेतों की मिट्टी में नमी ज्यादा दिनों तक बरकरार रहती है। इससे गांव में तालाब का फायदा सभी को समान रूप से मिल रहा है। हालांकि तालाब में मत्स्य पालन जमकर होता है। सफाई से पहले हर साल कम से कम 10 क्विंटल मछली का उत्पादन होता था। पिछले साल से अब तक मछली नहीं निकाला गया है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि गहराई और पानी का ठहराव बढ़ने से अब हर साल पहले की तुलना में दुगुनी अधिक मछली का उत्पादन होगा। तालाब से साल में तीन से चार बार मछली निकाला जाता है। चूंकि इस पर सभी का हक है। इसलिए गांव के सभी घरों के बीच इसका बंटवारा होता है। खाने भर से ज्यादा मछली होने के बाद उसे बेचा भी जाता है। गांव में 225 परिवार हैं, लेकिन 20 प्रतिशत घरों में ही शौचालय का उपयोग होता है। लगभग इतने ही परिवारों में स्नान एवं कपड़ा धोने का काम घर में होता है।

बाकी परिवारों के लोग स्नान एवं कपड़ा धोने के साथ-साथ सुबह-शाम शौच के बाद पानी इसी तालाब से लेते हैं। ग्रामीणों के अनुसार गांव के 90 प्रतिशत घरों के मवेशी तालाब में ही पानी पीते हैं। जंगली पशु-पक्षी तो तालाब पर निर्भर हैं ही। यह तो हुई रोजर्मरा की चीजें। कुछ चीजें धर्म-कर्म की है और जो इसी तालाब से जुड़ा है। तालाब के पास ही एक शिव मंदिर है। सावन के महीने में इसी तालाब के पानी से जलार्पण होता है। गांव में दो बार छठ पूजा होती है। एक कार्तिक महीने में और दूसरा चैत महीने में। दोनों छठ में अर्य्। का विधि-विधान इसी तालाब से पूरा होता हैं। इसके अलावा गांव में किसी के निधन पर श्राद्धकर्मके लिए घाट यही तालाब ही बनता है।

तालाब का गांव और ग्रामीणों से क्या संबंध है। यह उपरोक्त एक गांव के इस एक तालाब से परिलक्षित होती है। लहना गांव के लोगों की दिनचर्या से लेकर धर्म-कर्म जिस तरह तालाब से जुड़ा है। वह कई संदेश देता है। यह हो सकता है कि कुछ चीजें मानवीय स्वास्थ्य के मानक के अनुरूप नहीं हो, लेकिन यह एक साई है कि न केवल लहना गांव, बल्कि देश के लगभग छह लाख गांवों की संस्कृति तालाब से जुड़ी है और ग्रामीणों का अभित्र अंग है। और जैसे-जैसे तालाब के अस्तित्व पर खतरा आयेगा, गांव पर खतरा आयेगा और ग्रामीणों को ही भुगतना पड़ेगा। इसके साथ ही इस कहानी से कई सवाल भी पर खड़े होते हैं कि क्या झारखंड के सभी तालाबों की कहानी ऐसी ही है। बेशक, यही कहानी है। मत्स्य विभाग के सर्वे के अनुसार पूरे झारखंड में वर्तमान में कुल एक लाख पांच हजार सात सौ 80 तालाब हैं। इसका कुल क्षेत्रफल 56270 हेक्टेयर है। इसमें 80 प्रतिशत तालाब ऐसे हैं जिनका निर्माण राजे-रजवाड़ों ने या अंग्रेजों ने कराया है। एक अन्य सर्वेक्षण के मुताबिक इस 80 प्रतिशत तालाब में 95 प्रतिशत की सफाई कई दशकों से नहीं हुई है। अलग राज्य बनने के 12 साल बाद भी नया तालाब बनाने एवं पुराने की सफाई की कोई मुकम्मल व्यवस्था सरकार ने नहीं की है। कोई ठोस एवं दीर्घकालिक योजना नहीं है। राज्य में अब तक जितने पुराने तालाबों का नवीनीकरण एवं मरम्मत हुआ है वह आंकड़ा हर साल 500 भी नहीं है। हां, मनरेगा से तालाब बने हैं, लेकिन उसे पुराने तालाबों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। मनरेगा तालाबों की संरचना इतनी छोटी है कि दिसंबर आते-आते सूख जाता है। नाबार्ड के एक सर्वे के अनुसार राज्य की कुल सिंचाई में केनाल का योगदान 18 प्रतिशत, तालाब का 19 प्रतिशत, कुआं का 30 प्रतिशत, नलकूप का आठ प्रतिशत और अन्य का 25 प्रतिशत योगदान है। इस तरह देखा जाय तो कुल सिंचाई में 49 प्रतिशत का योगदान तालाब एवं कुओं का है, लेकिन राज्य का जलसंसाधन विभाग बड़ी एवं मध्यम सिंचाई योजनाओं से बाहर नहीं निकल पा रहा है। 12 साल में बड़ी एवं मध्यम सिंचाई योजनाओं पर जितना खर्च किया गया है, उसका 49 प्रतिशत भी खर्च लघु सिंचाई की योजनाओं पर नहीं हुआ है।

झारखंड सरकार की ही रिपोर्ट है कि राज्य में प्रतिवर्ष एक लाख 16 हजार मैट्रिक टन मछली उत्पादन की आवश्यकता है। हर साल मछली उत्पादन में वृद्धि हो रही है। फिर भी उत्पादनस्तर अभी तक 91 हजार मैट्रिक टन ही पहुंच पाया है। तमाम कोशिशों के बाद भी लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो पा रही है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह पुराने तालाबों की सफाई नहीं होना है। तालाबों की सफाई नहीं होने से इन तालाबों की जल संचयन क्षमता तो कम है ही। मछलियों की वृद्धि के प्रतिकुल भी है।

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