हिमयुग का फिल्मी रूप

Submitted by Hindi on Tue, 12/11/2012 - 11:01
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Source
कादम्बिनी, दिसंबर 2012
एक तथ्य है कि वैज्ञानिकों द्वारा हिमयुग की परिकल्पना करने से बहुत पहले हॉलीवुड के फिल्मकारों ने इसे अपनी फिल्मों का विषय बनाना शुरू कर दिया था और मोटा मुनाफा कमाया था।
हिमयुग आएगा या नहीं, या आएगा तो कब आएगा, या नहीं आएगा तो कब तक नहीं आएगा, या कभी नहीं आएगा। ऐसे तमाम कयास विज्ञान जगत में तो लंबे समय से लगते रहे हैं, लेकिन इन कयासों को पृष्ठभूमि बनाते हुए एक रोमांचकारी कहानी रच कर फिल्म-वालों ने जरूर अपनी जेबें गर्म की हैं। लिहाजा, कहना न होगा कि हिमयुग तो जब आएगा, तब आएगा, लेकिन फिल्मों में यह कब का आ चुका है और फिल्म निर्माताओं को अच्छा-खासा फायदा देकर गया है। फिल्म प्रेमियों ने ‘द डे आफ्टर टुमॉरो’ या ‘आइसएज’ जरूर देखी होगी। इन फिल्मों में अपने-अपने तरीके से हिमयुग आता दिखा है।

दरअसल, विध्वंसात्मक या डिजास्टर फिल्मों के प्रति हॉलीवुड का यह प्रेम में बहुत पुराना है। हॉलीवुड में 1930 के दशक से ऐसी फिल्में बन रही हैं। आज की तकनीकी प्रगति चूंकि हर क्षेत्र में दखल दे चुकी है, इसलिए सिने पर्दे पर इस तरह की फिल्मों में जब दिल दहला देने वाले दृश्य सामने आते हैं तो एक बारगी यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि क्या सचमुच किसी समय ऐसा होगा? ‘द डे आफ्टर टुमॉरो’ में जब कुछ ही घंटों के अंतराल पर पूरा उत्तरी गोलार्द्ध बर्फ से ढंक जाता है तो यह हालात हर मायने में वैज्ञानिक तौर पर सही नजर आते हैं। पर क्या सचमुच यह इतने सही होते हैं? वैज्ञानिक कहते हैं कि हिमयुग आएगा तो जरूर लेकिन जो कुछ इस फिल्म में दिखाया गया है, वह अतिश्योक्तिपूर्ण है हिमयुग का आना एक लंबी और युगांतरकारी प्रक्रिया रहेगा, जो कई सौ वर्षों में जाकर पूरी होगी और उससे पूर्व वैश्विक स्तर पर तापमान में भारी बढ़ोतरी होगी, जिसे हम आज ग्लोबल वार्मिंग के तौर पर जानते हैं, जिसका कारण है वातावरण में जैविक ईंधन के जलने से बढ़ने वाली कार्बन डाइऑक्साइड। बेशक वैज्ञानिकों की यह बात सही हो, लेकिन जो कुछ ‘दे डे आफ्टर टुमॉरो’ में दिखाया गया है उसे एक भावी चुनौती के रूप में लेना ही होगा।

वहीं 2002 में आई एनिमेशन फिल्म ‘आइस एज’ भी है जो पशु कार्टून चरित्रों की मदद से बर्फीले माहौल में एक संघर्ष पूर्ण कहानी दिखाती है। विशालकाय ग्लेशियर्स, कड़कती बिजली और बर्फ के तूफान के बीच प्रागैतिहासिक पशु चरित्रों के आपसी संसर्ग की इस कहानी में अगर बच्चों के लिए मनोरंजन का तमाम ख़ज़ाना मौजूद है तो वहीं बड़ों के लिए भी कई नई जानकारियाँ भरी पड़ी हैं। बॉक्स ऑफिस पर ‘आइस एज’ को मिली सफलता के बाद ही उसकी कहानी को आगे बढ़ाते हुए तीन अन्य एनिमेशन फिल्में भी बनी थीं।

यहां याद करना जरूरी हो जाता है सिनेमा के उस बुनियादी स्वरूप को । सन् 1922 में रॉबर्ट फ्लैहर्टी ने एक छोटे से कैमरे से फिल्म का निर्माण किया था, जिसका नाम था ‘नानूक ऑफ द नॉर्थ’। मूलतः यह फिल्म एक वृत्तचित्र रहा था जिसमें आर्कटिक का हिमाच्छादित क्षेत्र दिखाया गया है। बर्फ के उस रेगिस्तान में संघर्षरत एक उत्तरी कनाडाई टुंड्रा परिवार का अविस्मरणीय चित्र ‘नानूक..’ यूं तो परवर्ती अनेक यथार्थवादी फिल्मकारों का प्रेरणास्रोत रहा, लेकिन बर्फ की उस दुनिया को एक गैर-पेशेवर निर्देशक ने एक हल्के से कैमरे से कुछ इतनी खूबसूरती से फिल्माया था कि फिल्म में बर्फ स्वयं एक पात्र सरीखी लगती है। यहां ‘नानूक...’ का जिक्र इसलिए भी जरूरी हो जाता है क्योंकि सिने इतिहास में संभवतः बर्फ को इतने व्यापक तौर पर शायद पहली बार फिल्माया गया था। अगर ‘द डे आफ्टर..’ और ‘आइसएज’ पूर्णत अत्याधुनिक सिनेमाई तकनीकी खूबियों से लैस अपने कथानक में अंततः मानवीय जिजीविषा और प्रेम को सर्वोपरि ठहराती हैं, तो ‘नानूक..’ भी एक टुंड्रा परिवार के नितांत कठोर परिश्रम और एक दूसरे के प्रति अगाध प्रेम को उभारती हैं, और वह भी पूरी तरह यथार्थवादी धरातल पर।

यही एक तथ्य है जो तमाम ‘डिज़ास्टर्स’ फिल्मों को एक-सूत्र में बांधता भी है। मानवीय जिजीविषा, संवेदना और प्रेम। ‘द डे आफ्टर टुमारो’ यही प्रेम नायक को उसके बेटे को बचाने के लिए घर से मीलों दूर न्यूयॉर्क में बर्फीले तूफान को पैदल पार जाने को मजबूर करता है। यही प्रेम उसके बेटे को बर्फ से दब चुके न्यूयॉर्क शहर से निकलने के लिए रोकता है क्योंकि उसकी प्रेयसी ठंड से बेहद बीमार है। मनोवैज्ञानिक सत्य भी यही है कि मानवीय प्रेम का यह अगाध रूप अक्सर विपरीत परिस्थितियों में कहीं अधिक देखने को मिलता है।

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