दुर्लभ बीजों का रखवाला

Submitted by Hindi on Mon, 12/24/2012 - 14:12
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सप्रेस, सीएसई, डाउन टू अर्थ फीचर्स
देश में खेती छोटे किसानों के हाथों से छूटकर बड़े निजी कारर्पोरेट घरानों के कब्जे में जा रही है। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों से पीढ़ियों से खेती में लगे हमारे किसानों के हजारों वर्षो के ज्ञान, उनके द्वारा अपनाए जा रहे खेती के नए-नए तरीकों और जैव विविधता को ही धीरे-धीरे नष्ट कर दिया है। ऐसे में देबल देब जैस लोगों के प्रयास भले ही छोटे नजर आए पर देश के खाद्य उत्पादन प्रक्रिया के पर्यावरणीय व सामाजिक रूप से ठप्प हो जाने पर देश में भोजन की पूर्ति के लिए ये कदम काफी महत्वपूर्ण होंगे। ओडिशा के रायगड़ा जिले में एक बसाहट के बाहर केरोसीन लैंप से रोशन, दो कमरों वाली झोपड़ी, इस आदिवासी इलाके में किसी दूसरे किसान की झोपड़ी की ही तरह है। पर इस झोपड़ी के अंदर घुसते ही, एक कोने में, खाट के नीचे रखे, परची लगे हजारों मिट्टी के बरतन देखकर आप हैरान हो जायेंगे। इन बरतनों में चावल की 750 से ज्यादा दुर्लभ प्रजातियों का खजाना है। इस बीज बैंक के रखवाले हैं- देबल देब। जो पिछले 16 सालों से इन दुर्लभ प्राकृतिक बीजों का संग्रहण एवं संरक्षण कर रहे हैं। उनका एकमात्र सहारा वे किसान हैं जो आज भी इन्हीं विरासती बीजों पर निर्भर हैं। झोपड़ी से ही लगा हुआ उनका एक छोटा- सा खेत है, जहां देब अपने बीजों को संरक्षित करने के लिये इन प्रजातियों को उगाते हैं। यह जमीन बमुश्किल आधा एकड़ है। मतलब साफ है देब को हर प्रजाति के लिये कोई चार वर्ग मीटर की जमीन मिल पाती है जिसमें वे धान की सिर्फ 64 बालियां उगा सकते हैं।यह किसी बीज की नस्ल को बनाये-बचाये रखने के लिये आवश्यक 50 बालियों की न्यूनतम संख्या से थोड़ी ही ज्यादा है।

श्री देब बताते हैं कि इसके अलावा एक दूसरे की बाजू से उगने वाली इन किस्मों की आनुवांशिक शुद्धता को बनाये रखना अपने आप में एक समस्या है। अंतर्राष्ट्रीय अनुशंसा के अनुसार किस्मों की आनुवांशिक शुद्धता के लिये दो विभिन्न प्रजाति के पौधों के बीच में कम से कम 110 मीटर का फासला होना चाहिए। जो कि इतने छोटे से खेत में कायम रख पाना नामुमकिन है। उन्होंने पौधों को, उनमें फूल खिलने के समय के अनुसार रोपकर इस समस्या को जीत लिया है। कटाई और गहाई (बीजों का अलग करना) के बाद वे कुछ बीजों को इन मिट्टी के बरतनों में बचा कर रख लेते हैं और बचे हुए बीज किसानों को बांट देते हैं। उनकी मंशा है कि इन बीजों का उपयोग बढ़े और लोग इनके फायदों के बारे में जागरुक हों।

देबल देबदेबल देबएक प्रकृति चिंतक से खेती विशेषज्ञ हुए देबल देब कोई एक साल पहले अपने बीज बैंक “वृही” के साथ ओडिशा आए। इसके पूर्व कोई एक दशक से भी ज्यादा समय तक उन्होंने पूरे पूर्वी भारत की यात्रा की और घूम-घूम कर किसानों से महत्वपूर्ण स्वदेशी चावल की किस्में जुटाईं। उन्होंने 1997 में बीज बैंक “वृही” की स्थापना की। तब उनके पास लगभग 200 चावल की किस्में थीं। “वृही”, पष्चिम बंगाल का पहला गैर सरकारी बीज बैंक था।

धीरे-धीरे देब ने इन बीजों के संरक्षण और वितरण की जरुरत महसूस की। वर्ष 2002 में उन्होंने बांकुरा जिले में 0.7 हेक्टेयर का एक छोटा खेत लिया ताकि नियमित तौर पर इन प्रजातियों को उगाया जा सके। लेकिन 2009 और 2010 में पड़ने वाले अकाल के कारण कुछ प्रजातियों का नुकसान हुआ। इसके बाद देब ने एक ऐसी जगह की तलाश शुरू की जहां सिंचाई की समुचित व्यवस्था हो। तभी ओडिशा में टिकाऊ खेती के लिये काम करने वाली एक अलाभकारी संस्था “लिविंग फार्म्स’’ के देबजीत सारंगी से मुलाकात हुई और उन्होंने चार हजार रुपये सालाना की लीज पर रायगड़ा में एक जमीन खरीदने में उनकी मदद की।

सारंगी कहते हैं “मुझे हैरानी थी कि क्या गजब का आदमी होगा जो इतने दुर्गम इलाके में काम कर रहा है।” उनकी जिज्ञासा तब जाकर शान्त हुई जब उन्हें पता चला कि देब भूवनेश्वर के निकट किसी गांव में आ रहे हैं। सारंगी उस समय टिकाऊ खेती से संबंधित एक प्रशिक्षण के सिलसिले में पश्चिम बंगाल में थे। लेकिन उसे छोड़ पहली गाड़ी पकड़कर वे देब से मिलने सीधे भूवनेश्वर पहुंच गये। उनसे देब ने किसानों जैसी भाषा में बात की। उसकी बातचीत में कहीं भी प्रयोगशाला विज्ञान नहीं बल्कि कृषि पारिस्थितिकी विज्ञान की झलक थी। सारंगी कहते है “उस दिन यह बात मेरी समझ में आई कि क्यों उस आदमी (देब) ने 1996 में वर्ल्ड वाइल्ड फेडरेशन की मोटी तनख्वाह वाली नौकरी छोड़, एक ऐसे विषय पर काम करना शुरू किया जो ऐशो-आराम की जिन्दगी से कोसों दूर है।”

देबल देब द्वारा एकत्रित चावल के बीजदेबल देब द्वारा एकत्रित चावल के बीजटिकाऊ खेती के प्रति अपने जुनून के चलते देब ने मोती जुआर, तिल, लौकी और सेम फली की कई सारी स्वदेशी प्रजाति के बीज इकट्ठे किये। देब कहते हैं कि मानसून में देरी, अल्प वर्षा, बाढ़, मिट्टी के खारेपन और कीटों के हमले जैसे पर्यावरणी प्रकोप से निपटने के लिये ये पुश्तैनी बीज सबसे बढ़िया दांव हैं। भारत में इन परिस्थितियों के साथ ढल जाने वाली चावल की प्रजातियां हैं। उनका कहना है कि “चावल की आनुवांशिकी पर 60 सालों के शोध के बावजूद, वैज्ञानिक ऐसी एक भी प्रजाति नहीं तैयार कर सके हैं जो कैसी भी पर्यावरणीय परिस्थितियों में समुचित रूप से पनप सके।’’

देब के तर्क उनके जमीनी तजुर्बे पर आधारित हैं। मई 2009 में आये महाचक्रवात आलिया ने सुन्दरबन का सफाया कर डाला और हजारों एकड़ जमीन रातों रात खारेपन से भर गई। कोई मुट्ठी भर परम्परागत किसानों ने ही खारेपन को झेल जाने वाली चावल की तीन प्रजातियां बोईं। देब ने दर्जन भर किसानों को, खारापन झेल जाने वाली चावल की तीन और प्रजातियों के बीज बांटे। सिर्फ वही किसान आने वाली ठण्ड में थोड़ी बहुत चावल उगा पाये। इस साल देर से आये मानसून के चलते पूर्वी भारत के कई इलाकों में चावल के अंकुर ही नहीं फूटे। लेकिन जिन किसानों ने पुख्ता प्रजातियों वाले बीज बोये उन्हें ज्यादा चिन्ता नहीं रही। देब कहते हैं कि ये बीज किसी भी आधुनिक बीज से कहीं ज्यादा सक्षम हैं।

लेकिन किसानों के मुनाफे का क्या होगा? क्योंकि हर हाल में आधुनिक और संकरित प्रजातियां ज्यादा पैदावार देती हैं। इस पर देब जवाब देते हैं “किसी भी अर्थ व्यवस्था में किसी भी व्यापार का मुनाफा टिकाऊ नहीं है। यदि मकसद यह है कि जल्दी से मुनाफे में इजाफा हो, तो संसाधनों का नाश भी तेजी से होगा, और तब हमें फिर प्रदूषण, स्वास्थ्य के खतरे और जलवायु परिवर्तन जैसी शिकायतें नहीं करनी चाहिए।”

देब की समझ किसानों के साथ उनकी रोजमर्रा की बातचीत से बनी है। उनका मानना है कि ये किसान ज्यादातर कृषि विशेषज्ञों की तुलना में कहीं बेहतर जानकार और पारखी हैं। ऐसा इसलिये क्योंकि विशेषज्ञ, प्रकृति के एक खास पहलू पर ध्यान देने के लिये प्रशिक्षित हैं, जबकि आम किसान पारिस्थितिकी के जटिल ताने -बाने के विविध पहलुओं में अंतर्संबंध को समझने में सक्षम है। देब स्वीकारते हैं कि सीधे खेत पर संरक्षण और शोध के काम के लिये स्थानीय किसानों पर भरोसा करने का कारण यह है कि सुप्रशिक्षित विज्ञान स्नातकों या शोधकर्ताओं को लेने के लिये उनके पास पैसे नहीं हैं और फिर मैं कैसे विश्वास कर लूं कि मेरे खेत पर काम करने वाला कोई शोधकर्ता ज्यादा पैसे की खातिर, किसी एग्रो बायोटेक कम्पनी को, ये दुर्लभ बीज सौंप नहीं देगा?’’

देब को विश्वास है कि किसी संस्थागत या सरकारी मदद के बगैर भी उनकी यह विरासत उनके किसान मित्रों की बदौलत जिन्दा रहेगी।

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