पेयजल एवं शौचालय बिना कैसे पसंद आए स्कूल

Submitted by Hindi on Mon, 12/31/2012 - 15:56
एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पिछले अक्तूबर में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अगले छह माह में सभी निजी एवं सरकारी शालाओं में बालक एवं बालिका के लिए अलग-अलग शौचालय का निर्माण हो जाना चाहिए। मध्य प्रदेश में तो अभी भी हजारों शालाएं हैं, जहां शौचालय ही नहीं है, ऐसे में अलग-अलग शौचालय की बात तो बहुत दूर की है। गांव में बच्चों के लिए बाल स्वच्छता का अभाव एक बड़ी समस्या है। शालाओं में शौचालय का अभाव, पेयजल का अभाव, खुले में पड़ा शौच, शाला के बाहर फैली गंदगी, चारदीवारी का अभाव आदि बच्चों के विकास पर विपरीत प्रभाव डालते हैं और बच्चे कुपोषित एवं बीमार हो जाते हैं। कई बच्चे, खासतौर से बालिकाएं शाला त्याग देती हैं या फिर पालक इनकी पढ़ाई को आगे जारी रखने में अपनी असमर्थता जाहिर कर देते हैं। बालिका शिक्षा की एक सबसे बड़ी बाधा के रूप में शाला में शौचालय का नहीं होना है। खासतौर से किशोरियों के लिए शौचालयविहीन शाला कभी भी पसंद नहीं आता।

एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पिछले अक्तूबर में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अगले छह माह में सभी निजी एवं सरकारी शालाओं में बालक एवं बालिका के लिए अलग-अलग शौचालय का निर्माण हो जाना चाहिए। मध्य प्रदेश में तो अभी भी हजारों शालाएं हैं, जहां शौचालय ही नहीं है, ऐसे में अलग-अलग शौचालय की बात तो बहुत दूर की है। सर्वोच्च न्यायलय ने यह आदेश शिक्षा का अधिकार कानून के संदर्भ में दिया है, जिसमें उसने कहा है, ‘‘6 से 14 साल तक के बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा की गारंटी भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 (क) के तहत मौलिक अधिकार के रूप में दी गई है। यह अधिकार तब तक पूरा नहीं हो सकता है, जब तक कि राज्य शालाओं में मूलभूत सुविधा के रूप में सुरक्षित पेयजल एवं शौचालय उपलब्ध नहीं करा देते। न्यायालय ने इस बात का संदर्भ लिया है कि अनुभवों एवं सर्वेक्षण से पता चलता है कि पालक खासतौर से बालिकाओं को शाला में भेजना बंद कर देते हैं, जहां शौचालय का अभाव होता है।।

इन बातों को देखते हुए न केवल राज्य सरकारों के सामने मार्च 2013 तक शालाओं में बालक एवं बालिका के लिए अलग-अलग शौचालय के निर्माण कराने की जरूरत है, बल्कि पेयजल एवं स्वच्छता के मुद्दे पर कार्यरत स्वैच्छिक संस्थाओं को इस प्रक्रिया को तेज करने के लिए प्रयास करना चाहिए। इसके लिए ग्राम स्तर पर समुदाय, संबंधित विभाग को संवेदनशील करने के साथ-साथ बच्चों को उनके अधिकारों को प्राथमिकता देने के लिए आगे आने के लिए मंच उपलब्ध करवाने की जरूरत है। सीहोर जिले के 15 ग्राम पंचायतों के 22 गांवों में मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में बच्चों के बाल स्वच्छता अधिकारों के दावा के लिए स्वैच्छिक संस्था समर्थन द्वारा सेव द चिल्ड्रेन एवं वाटर एड के सहयोग से कार्यक्रम चलाया जा रहा है। समर्थन के अनुसार बच्चों के अन्य अधिकारों की रक्षा एवं उनके विकास के लिए वॉश अधिकार बहुत जरूरी है। इसे बाल स्वच्छता अधिकार भी कहा जाता है। समर्थन के प्रयास से कई गांवों में बच्चों के मुद्दे को प्राथमिकता से लेकर कार्य किए जा रहे हैं। मगरखेड़ा गांव में बालक-बालिकाओं के लिए अलग-अलग शौचालय का निर्माण किया जा चुका है, जहां पढ़ने वाली बालिकाओं के अनुभव भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि बेहतर शिक्षा एवं महिला स्वास्थ्य के लिहाज से किशोरियों के लिए शाला में अलग शौचालय का होना अति अनिवार्य है।।

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