हिंडन के हत्यारे

Submitted by Hindi on Wed, 01/09/2013 - 14:24

आज हम दोष चाहें किसी को दें, शिवनन्दी का प्रतिरूप बने हरनन्दी का पितृस्वरूप तो उसी दिन मर गया था, जिस दिन इसका नाम हिंडन पड़ा। सिर्फ पितृस्वरूप मरा हो, इतना नहीं... हिंडन ने अब खुद विषधर का रूप धारण कर लिया है। जैसा कभी यमुना ने कालियादेह का रूप धरा था। हिंडन का यह रूप हमें जीवन देने वाला न होकर जीवन लेने वाला हो गया। हमारी बेवकूफी देखिए! इसके लिए हमने ही हिंडन को मजबूर किया। यह सब कुछ पिछले 50-60 वर्षों में हुआ। जैसे अधिक लाड़ से संतानें बिगड़ जाती हैं, वैसे ही हम भी बिगड़ गये। दो राय नहीं कि हिंडन के एहसान के एहसान फरामोशी के दोषी हम हैं। हमारे मल, कचरे और कृषि उर्वरक-रसायन ने ही हिंडन की देह को बीमार किया है। हमने ही हिंडन को जलमय बनाने वाली जलसंरचनाओं का जल सुखाया है। हमारा दोष कम नहीं है, लेकिन फैक्टरियों ने तो हिंडन को मृत्युसेज पर ही पहुंचा दिया है। उनका अवजल मात्रा में भले ही कम हो, लेकिन विष इसी में सबसे ज्यादा है। इसी ने हिंडन को विषधर बनने पर मजबूर किया है।धमोला-हिंडन संगम से हिंडन बारहमासी होकर बहती है। सच कहें, तो हिंडन की बीमारी के लक्षण यहीं से दिखाई देने लगते हैं। यह हिंडन प्रदूषण का प्रथम द्वार है।

दूसरा द्वार है: काली-हिंडन संगम। यह द्वार साधारणतया कृषि व खनिजजनित प्रदूषण के द्वार खोलता है। यहां मिलें भी बड़ी संख्या में हैं तथा मुजफ्फरनगर, खतौली व देवबंद जैसे घनी आबादी के इलाके भी। इनके अवजल-मल तथा ठोस कचरे से हिंडन का चैन लुट जाता है।

हिंडन में प्रदूषण का तीसरा द्वार है: गाज़ियाबाद की महानगरीय आबादी तथा इसके मोहननगर व साहिबाबाद औद्योगिक क्षेत्र। ये तीनों द्वार मिलकर हिंडन की जिंदगी के द्वार बंद करने पर आमादा हैं। इस तीसरे द्वार से निकला प्रदूषण तो इतना संगठित व खतरनाक है कि हिंडन का दम ही घुटने लगता है। रही-सही कसर करैहड़ा पर बन रहे पुल ने पूरी कर दी है। कहने को यह पुल मोहननगर-मेरठ बाइपास से करहैड़ा को जोड़ने के लिए बनाया जा रहा है, लेकिन असल मकसद हिंडन का गला घोटकर हिंडन की जमीन पर बस्ती बसाना है। इसीलिए इस पुल की ज्यादातर लंबाई खंभों पर न होकर भरवा है। इसके खिलाफ ग्रीन ट्रिब्यूनल में भी गुहार की गई है।

कई साल पहले कई हितैषी हिंडन से मिलने गये थे। उन्हें अकेले जिला सहारनपुर में ही हिंडन की हत्या करते दिखाई दिए।
किसान को-ऑपरेटिव शुगर फ़ैक्टरी लि. (सरसावा, सहारनपुर)-चीनी- बदबूदार प्रदूषित पानी सेंधली नदी में। हवा में जैसे बदबू घुली हो।
पिलखनी केमिकल्स एंड डिस्टलरी (पिलखनी, सहारनपुर)-शराब- बदबूदार पीला बहिस्राव नाले से होकर सेंधली नदी में। गांव बदबू से परेशान। हैंडपम्प और बोरवेल... दोनों का पानी खराब। बीमारियाँ बढ़ रही हैं।
किसान सहकारी चीनी मिल (ननौता, सहारनपुर)-चीनी-एक नाले से होकर इसका अवजल कृष्णी नदी में। हवा चलने पर अत्यंत दुर्गंध। मच्छर ही मच्छर।
एस.एम.सी. फूड लि.(ननौता)-दूध पाउडर-गंदा बदबूदार पानी कृष्णी में।
किसान चीनी मिल (निकट ननौता, सहारनपुर)-शराब व एल्कोहल- पीला बदबूदार बहिस्त्राल कृष्णी में। हवा में बदबू व बारहमासी मच्छर।
शाकुम्भरी शुगर एंड एलायड लि. (रसूलपुर, सहारनपुर)- चीनी, स्टील, बिजली- अत्यंत दुर्गंधित पानी नाले के जरिए यमुना में।
स्टार शुगर कॉरपोरेशन लि.(बिडवी, गंगाह रोड, सहारनपुर)’ चीनी-बदबूदार पानी यमुना में। हवा चलने पर तीखी बदबू। साधारण बोरवेल का पानी गले से नीचे नहीं उतरता। गहरे बोरवेल का पानी भी रखने पर बर्तन पीले हो जाते हैं।
स्टार पेपर मिल लि.(सहारनपुर)-कागज,पेपर बोर्ड- काला,पीला व लाल रंग का प्रदूषण युक्त बहिस्राव परागपुर के पास हिंडन में। इस पानी से 3-4 बार फसल सींचने पर खेत खराब।
दि कॉपरेटिव कंपनी लि. (यूसूफपुर रोड, टपरी, सहारनुपर)-शराब- खतरनाक, बदबूदार पानी जो स्टार पेपर मिल के बहिस्राव के साथ मिलकर हिंडन में मिलता है।
गंगेश्वर लि.(देवबंद, सहारनपुर)- चीनी- लाल रंगा का पानी नाले से होकर काली नदी में।
शाकुम्भरी शुगर एंड एलायड इंडस्ट्रीज लि.( टोडपुर, बेहर, सहारनपुर)-शराब- बदबूदार पानी एक नाले से होता हुआ बूढ़ी यमुना में।

हिंडन यात्रा लेकर निकले इन साथियों ने बायोमॉनीटरिंग के जरिए जांची गई 13 में से उक्त 11 फैक्टरियां हिंडन में विष घोलने की दोषी पाया। मात्र 2 के अवजल व कचरे को लेकर वे संतुष्ट दिखे: आई.टी.सी (सहारनपुर)- पानी नहीं निकलता। बहिस्राव को साफ कर पुनः बागवानी आदि में इस्तेमाल करते हैं। दया शुगर (सहारनपुर)- रंगहीन स्राव हिंडन में मिलता है। लोग इसके बहिस्राव का उपयोग सिंचाई के लिए करते हैं। वे कहते हैं कि इस बहिस्राव से नहाने से खाज-खुजली ठीक हो जाती है। बायोमॉनीटर्स द्वारा जांच में बरी किए जाने का मतलब यह नहीं है कि ये दोनो प्रयोगशाला में बारीकी से जांच होने पर भी निर्दोष ही पाई जायें। यह स्थिति वर्ष 2004 की है। इस बीच तो स्थिति बहुत बदली है। एक ओर कई फ़ैक्टरियों ने मुकदमे व जनान्दोलन झेले हैं, तो दूसरी ओर कई फैक्टरियां बेलगाम हुई हैं। शहरी मल व कृषि रसायन पर कोई नियंत्रण आज भी नहीं है। एक जिले का यह छोटा सा सर्वेक्षण बताता है कि सब कुछ कितना खराब है। आगे चलकर तो सर्वेक्षण की जरूरत भी नहीं रह जाती। हिंडन की देह को देखकर ही कोई भी खुली आंख सब हाल बयां कर सकती है। पता लगायेंगे, तो पता चलेगा कि कई फैक्टरियां अपने अवजल को बोर करके सीधे धरती में डालने का हत्यारा अपराध करने से भी संकेाच नहीं कर रही हैं।

जब लोकहित की इतनी उपेक्षा हो और लोक सोता रहे, तो हिंडन के बचने की उम्मीद ही कहां बचती है! शुक्र है कि हिंडन की कुछेक संताने जागी हैं। हिंडन के शत्रुाओं को आइना दिखाने में लगी हैं। लगाम लगाने की कोशिशें बहुत कामयाब तो नहीं हो रही, लेकिन कामयाबी के रास्ते तो बना ही रही हैं। उनकी चर्चा अगली कड़ी में।
 

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

शिक्षा:


स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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