यमुना का संकट, जल का संकट

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दैनिक भास्कर, नई दिल्ली, मई 27, 2007, सुनीता नारायण की पुस्तक 'पर्यावरण की राजनीति' से साभार

यमुना सात राज्यों से होकर बहती है। उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में इसका हिस्सा 21 फीसदी है, इसके अलावा हिमाचल प्रदेश में 1.6 फीसदी, हरियाणा में 6.1 फीसदी, राजस्थान में 29.8 फीसदी, मध्यप्रदेश में 40 फीसदी और दिल्ली में सबसे कम 0.4 फीसदी। इस तरह से गंगा बेसिन का 40 फीसदी इलाका इसके जल क्षेत्र में आता है और इस तरह से यह देश की सबसे पवित्र गंगा नदी की सबसे बड़ी ट्रिब्यूटरी है।

यमुना की सफाई देश की सबसे खर्चीली और अनुत्पादक योजनाओं में से एक है। एक अनुमान के मुताबिक 2009 तक, जब यमुना एक्शन प्लान-2 (वाईएपी-2) खत्म होगा, तब तक इस नदी के छह राज्यों में फैले 1,376 किलोमीटर लंबे प्रवाह की सफाई पर 1,356.05 करोड़ रुपये खर्च हो चुके होंगे, यानी प्रति किलोमीटर एक करोड़ रुपए। यह तो सिर्फ वो रकम है, जो राष्ट्रीय नदी संरक्षण कार्यक्रम (एनआरसीपी) के तहत खर्च की जा रही है और जिसकी निगरानी केंद्रीय वन व पर्यावरण मंत्रालय कर रहा है। इसके अलावा कई राज्य जैसे दिल्ली, हरियाणा, उत्तरप्रदेश आदि अक्सर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (एसटीपी) पर भी काफी खर्च करते हैं। इनका कोई बहुत ठोस और एकीकृत हिसाब नहीं उपलब्ध है, लेकिन यह जरूर तय है कि इतने खर्च के बावजूद यमुना आज भी प्रदूषित है।

वन व पर्यावरण मंत्रालय के आधीन यमुना की सफाई योजना की निगरानी करने वाली संस्था राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय (एनआरसीडी) ने दिसंबर 2004 में सफाई के लिए निवेश बढ़ाने की अनुमति दे दी। उस समय तक यमुना एक्शन प्लान (वाईएपी) के तहत 678 करोड़ रुपए खर्च हो चुके थे। यमुना के अलावा रिवर एक्शन प्लान के तहत दिसंबर 2004 तक 34 नदियों की सफाई पर इस काम के लिए निर्धारित 30 फीसदी रकम खर्च हो चुकी थी। लेकिन यह पूरी रकम बड़े नालों में बह गई और यमुना का प्रदूषण बढ़ता गया। बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी), जो नदियों में प्रदूषण मापने का एक पैमाना है, उसके आधार पर यमुना का प्रदूषण 1993-2005 के बीच दोगुना हो गया। इसके गंदे पानी का निष्पादन जो 2,393 मिलियन लीटर था वह भी दोगुना हो गया।

यमुना सात राज्यों से होकर बहती है। उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में इसका हिस्सा 21 फीसदी है, इसके अलावा हिमाचल प्रदेश में 1.6 फीसदी, हरियाणा में 6.1 फीसदी, राजस्थान में 29.8 फीसदी, मध्यप्रदेश में 40 फीसदी और दिल्ली में सबसे कम 0.4 फीसदी। इस तरह से गंगा बेसिन का 40 फीसदी इलाका इसके जल क्षेत्र में आता है और इस तरह से यह देश की सबसे पवित्र गंगा नदी की सबसे बड़ी ट्रिब्यूटरी है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने 1,376 किलोमीटर लंबे इसके प्रवाह क्षेत्र को पांच हिस्सों में बांटा । इसे भौगोलिक व पारिस्थितिकी के आधार पर बाँटा गया है।

पहला हिस्सा 172 किलोमीटर लंबा है और यमुनोत्री से लेकर ताजेवाला तक है। यह स्वच्छ हिस्सा है। दूसरा हिस्सा 224 किमी का है, जो ताजेवाला से वजीराबाद बैराज तक है। इस चरण में यह उत्तर प्रदेश और हरियाणा के छोटे गांवों व शहरों से होकर बहती है, जहां यह दिल्ली के मुकाबले ज्यादा साफ है। तीसरा हिस्सा महज 22 किमी का है और वजीराबाद से ओखला के बीच है और सबसे अधिक प्रदूषित है। चौथा सबसे लंबा 490 किमी का है, जो ओखला से लेकर चंबल तक है। यहां से यमुना दिल्ली का प्रदूषण लेकर मथुरा और आगरा और उसे भी आगे चली जाती है। पांचवा और आखिरी हिस्सा चंबल से लेकर गंगा तक के क्षेत्र का है। यह 468 किलोमीटर लंबा है।

वजीराबाद बैराज से जब यमुना दिल्ली में प्रवेश करती है तो वह अपेक्षाकृत अधिक स्वच्छ होती है। लेकिन जब नदी दिल्ली से बाहर निकलती है तो गंदगी और हर किस्म के प्रदूषण से भरी होती है। इसके आगे इसे साफ होने में 958 किलोमीटर की यात्रा करनी होती है तब भी सफाई तभी होती है, जब इसका सम्मिलन चंबल के साथ होता है, जिसका इसके कैचमेंट में 40 फीसदी का हिस्सा है। हालांकि हर हिस्से में प्रदूषण का स्तर अलग-अलग है, लेकिन वन व पर्यावरण मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक हर हिस्से में प्रदूषण का स्तर बढ़ता जा रहा है। यह प्रदूषण इसके बावजूद बढ़ रहा है कि दिल्ली, हरियाणा और उत्तरप्रदेश के 21 शहरों में वाईएपी के तहत कई तरह के कार्यक्रम शुरू किए गए हैं, जिनमें सीवरेज, सीवेज ट्रीटमेंट प्लान, सस्ते शौचालय आदि सभी शामिल हैं।

इससे स्पष्ट है कि नदियों की सफाई की रणनीतियों की समीक्षा और उन पर पुनर्विचार बहुत जरूरी है। जितने इलाकों से यमुना बहती है उनमें से शायद ही कहीं अपनी गंदगी खुद दूर करने की इसकी क्षमता का प्रदर्शन होता है। इसका कारण यह है कि हर जगह शहर में इसका साफ पानी लेकर उसमें कचरे और प्रदूषण से युक्त पानी छोड़ देते हैं। कचरायुक्त पानी यमुना में बढ़ता जा रहा है – इसका अर्थ यह है कि जो कचरा उत्पादित होता है और जिसका ट्रीटमेंट होता है, उसके बीच का फर्क बहुत बढ़ गया है। अगर इसे नहीं रोका गया तो राजधानी सहित कई राज्यों के महत्वपूर्ण शहरों में पानी का प्राथमिक स्रोत खत्म हो जाएगा। यमुना का यह संकट इसके प्रवाह वाले क्षेत्र में पानी का सबसे बड़ा संकट है। प्रभावी ढंग से इससे निपटे बगैर शहर की जरूरतों को पूरा करना संभव नहीं होगा।

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