धरती चुकाती है बोतलबंद पानी की कीमत

Submitted by admin on Sat, 01/26/2013 - 10:27
Source
हिन्दुस्तान, नई दिल्ली, सितम्बर 4, 2007, सुनीता नारायण की पुस्तक 'पर्यावरण की राजनीति' से साभार

पानी के क्षेत्र में और आर्थिक रूप से संपन्न इलाकों में बोतलबंद पानी की शुरूआत विलासिता के रूप में हुई थी जो कि सामाजिक रुतबे, स्वास्थ्य या इच्छाओं के मद्देनजर अनावश्यक सी चीज है। पानी खूबसूरत पर्वतीय जलधाराओं से आता है, जिसे वे बोतलबंद कर खनिजयुक्त (मिनरल) पानी कहकर बेचते हैं। यह नल के पानी से एकदम भिन्न मीठा और कोकाकोला का एक ‘स्वस्थ्य अभिजात्य विकल्प’ था, लेकिन जल्द ही जिस तरह से इसका बाजार फैला, कंपनियों ने पहाड़ी झरनों से न लेकर नगरपालिका की टंकी का सामान्य पानी ही बोतलबंद कर बेचना शुरू कर दिया।

बोतलबंद पानी का उद्योग स्वभावतः विश्वव्यापी है, लेकिन इस उद्योग का आकार ऐसा है, जिसमें एक ही उत्पाद को दो बिल्कुल भिन्न बाजारों में बेचना होता है जिसमें एक जल संपन्न है, तो दूसरा पीने के पानी की कमी का शिकार। सवाल यह है कि क्या इन दोनों बिल्कुल भिन्न बाजारों में इसके परिणाम भी भिन्न होते हैं? या कि हम दो बिल्कुल भिन्न कारणों से इस बात पर सहमत होंगे कि इस व्यवसाय की कीमत हमारी धरती को चुकानी पड़ रही है जो हमारे लिए कोई अच्छी बात नहीं है।

पानी के क्षेत्र में और आर्थिक रूप से संपन्न इलाकों में बोतलबंद पानी की शुरूआत विलासिता के रूप में हुई थी जो कि सामाजिक रुतबे, स्वास्थ्य या इच्छाओं के मद्देनजर अनावश्यक सी चीज है। पानी खूबसूरत पर्वतीय जलधाराओं से आता है, जिसे वे बोतलबंद कर खनिजयुक्त (मिनरल) पानी कहकर बेचते हैं। यह नल के पानी से एकदम भिन्न मीठा और कोकाकोला का एक ‘स्वस्थ्य अभिजात्य विकल्प’ था, लेकिन जल्द ही जिस तरह से इसका बाजार फैला, कंपनियों ने पहाड़ी झरनों से न लेकर नगरपालिका की टंकी का सामान्य पानी ही बोतलबंद कर बेचना शुरू कर दिया। और जब बोतलबंद पानी एक अभिजात्य आदत में शुमार हो गया और उसका एक बड़ा बाजार बन गया, तब कंपनियों ने ज्यादातर टोंटी का सामान्य पानी ही प्लास्टिक की बोतलों में भरकर सुपरमार्केट में बेचना शुरू कर दिया।

जैसे कोई नहीं कहता कि राजा नंगा है, ठीक उसी तरह कोई यह नहीं पूछता कि क्यों वे बोतलों में भरा नगरपालिका का सामान्य पानी दस गुना ज्यादा कीमत पर खरीद रहे हैं। इसे विज्ञापन की बड़ी सफलता ही कहा जाना चाहिए, जिसके बल पर बोतलबंद पानी का यह अनावश्यक बाजार बड़ी तेजी से फैला है। सन् 2006 में अमेरिकी लोगों ने 31 अरब लीटर बोतलबंद पानी के लिए कुल 11 अरब डॉलर अदा किए थे और अब भी उनकी प्यास बढ़ती जा रही है, लेकिन बुलबुला आखिर फूट ही गया। पिछले महीने सेन फ्रांसिस्को के मेयर ने सरकारी इमारतों में बोतलबंद पानी के इस्तेमाल को प्रतिबंधित कर दिया, क्योंकि लाखों की संख्या में बेकार फेंकी प्लास्टिक की बोतलों से पूरा मैदान भर गया था। अमेरिका में एक अनुमान के अनुसार, तकरीबन छह करोड़ पानी की बोतलें हर रोज फेंकी जाती हैं, जिसका एक मामूली हिस्सा ही दोबारा उपयोग में लाया जाता है। राज्यों और कई बार देशों के बाहर भी इन बोतलों को जिन ट्रकों से फेंका जाता है, उनसे निकलने वाली ग्रीन हाउस गैसें भी इस प्रतिबंध का एक बड़ा कारण रहा है, लेकिन इतनी ही महत्वपूर्ण बात यह भी है कि मेयर ने शहर के नगर निगम पर इस बात के लिए भी दबाव बनाया कि उसका पानी राष्ट्रीय अभ्यारण्य के प्राकृतिक और शुद्ध स्रोतों से आए। वे अकेले नहीं हैं।

पिछले साल साल्टलेक सिटी के मेयर ने सरकारी कर्मचारियों से कहा कि सरकारी दफ्तरों के लिए वे तुरंत बोतलबंद पानी मंगाना बंद करें। न्यूयॉर्क ने भी लोगों को शुद्ध सार्वजनिक पानी के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करने के लिए दस लाख डॉलर का एक प्रचार अभियान शुरू किया है। दूसरा झटका उन जलपान गृहों की तरफ से लगा है, जिन्होंने अपने अभिजात्य के ठीक उलट लोगों को बोतलबंद पानी परोसने से इंकार कर दिया। बोतलबंद पानी की कंपनियों के लिए और भी बुरा यह हो रहा है कि अमेरिका में जंक फूड के ‘दैत्य’ के प्रतीक पेप्सी को इस बात के लिए मजबूर किया जा रहा है कि वह यह बात मान ले कि उसका बोतलबंद पानी ‘एक्वाफिना’ दरअसल और कुछ नहीं, सामान्य टोंटी वाला पानी है। उसे अपनी बोतलों पर यह लिखने के लिए राजी कर लिया गया है जिसे ‘पेप्सी’ बिल्कुल मानना नहीं चाहती थी कि एक्वाफिना का पानी सार्वजनिक स्रोतों से लिया गया पानी ही है।

लेकिन अगर लोग इस बात को महसूस कर लें कि इस उत्पाद के लिए हमारे पर्यावरण को काफी बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है, साथ ही यह महसूस कर लें कि एक ही चीज जो सस्ते में उपलब्ध है, उसके लिए खामखा दस गुना ज्यादा कीमत चुकाना मूर्खता है।

बोतलबंद पानी का व्यापार हमारी दुनिया में काफी समय से फल-फूल रहा है। भारत दुनिया में बोतलबंद पानी का इस्तेमाल करने वाला दसवाँ सबसे बड़ा देश है। इसकी मांग जो 1990 में सिर्फ बीस लाख थी, वह एक अनुमान के मुताबिक, 2006 में बढ़कर एक करोड़ अस्सी लाख हो गई लेकिन भारत में बोतलबंद पानी का इस्तेमाल एक जरूरत के रूप में बढ़ा है जिसे सार्वजनिक संस्थाएं पूरा नहीं कर पाती। लोग इतना पैसा दे रहे हैं, जिसे वास्तव में वे वहन नहीं कर सकते, लेकिन उनके पास और कोई विकल्प नहीं है।

भारत में बोतलबंद पानी टोंटी से नहीं, बल्कि भूमिगत जल स्रोतों से लिया जाता है। कंपनियां सीधे-सीधे जमीन में छेद करती है, उसमें से पानी निकालकर, कभी-कभी साफ करके सिर्फ बोतल में भर देती हैं और फिर उसे तमाम-शहरों में बिकने के लिए भेज देती हैं। प्रत्यक्षतः देखें तो यह भूमिगत जल का निजीकरण हो गया है।

भारत में बोतलबंद पानी टोंटी से नहीं, बल्कि भूमिगत जल स्रोतों से लिया जाता है। कंपनियां सीधे-सीधे जमीन में छेद करती है, उसमें से पानी निकालकर, कभी-कभी साफ करके सिर्फ बोतल में भर देती हैं और फिर उसे तमाम-शहरों में बिकने के लिए भेज देती हैं। प्रत्यक्षतः देखें तो यह भूमिगत जल का निजीकरण हो गया है।

यह पूरा धंधा बिना निवेश किए ‘मोटा’ मुनाफा कमाने का है। उदाहरण के लिए, अगर हम जयपुर के निकट काला डेरा में लगे कोका कोला के बॉटलिंग प्लांट को लें, तो कोका कोला जो बोतलबंद पानी बेचती है, वह उसे लगभग मुफ्त में ही मिलता है सिवाए उस मामूली से कर की अदायगी के जो वह राज्य के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को चुकाती है। यह कर 2000-02 में महज पांच हजार रुपये था, जो 2003 में बढ़कर 24,246 रुपये हो गया। इतना मामूली कर चुकाकर कंपनी प्रतिदिन लगभग पांच लाख लीटर पानी लेती है यानी प्रति एक हजार लीटर पानी के लिए उसे महज चौदह पैसे चुकाने होते हैं। दूसरे शब्दों में, एक लीटर की किनले की बोतल के लिए आपसे जो 12 रुपये लिए जाते हैं, उसके कच्चे माल की जो कीमत कंपनी चुकाती है वह महज दो से तीन पैसे पड़ती है। इसमें पानी साफ करने की कीमत भी जोड़ लें। यहां तक कि पानी की छानने की सबसे महंगी प्रक्रिया कुल लागत ज्यादा से ज्यादा पच्चीस पैसे प्रति लीटर ही आती है।

प्लास्टिक की एक लीटर की बोतल की कीमत कंपनी को तीन-चार रुपये पड़ती है। इसमें प्लांट से शहरों में बोतलें पहुंचाने की कीमत और उसके विज्ञापन व बिक्री का खर्च भी जोड़ लें, तो सबको जोड़ने के बाद भी जो खर्च आता है, वह इस धंधे को ‘स्वप्न’ सरीखा बना देता है।

खासकर ऐसे देश में, जहां सार्वजनिक पेयजल व्यवस्था पूरी तरह असफल हो। सच यह है कि इन बोतलों में जो पानी हमें मिलता है, वह टोंटी से मिलने वाले पानी से रत्ती भर भी अलग नहीं है। अंतर सिर्फ यह है कि यह हमें पाइपलाइन के जरिए न मिलकर बोतल में मिलता है। लेकिन जहां भारत के अमीर इस बोतलबंद पानी का खर्च उठा सकते हैं, वहीं गरीब के लिए इसका खर्च सहन करना संभव नहीं हो सकता। अमीरों के पास यह एक विकल्प है, जिसे वह सार्वजनिक पेयजल व्यवस्था के असफल होने पर अपनाते हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि हमारी पानी की व्यवस्था इसलिए विफल हुई है क्योंकि अमीरों के घर पर पानी की आपूर्ति से कमाई नगरपालिका द्वारा हो रहे उस पर खर्चे का दसवाँ भाग ही है। मैं यहां पहाड़ों पर फेंकी जाने वाली पानी की प्लास्टिक की बोतलों की बात नहीं कर रही, जिन्हें नष्ट करने की कीमत तक अदा नहीं की जाती, इस तरह बोतलबंद पानी की कीमत पृथ्वी को ही चुकानी पड़ती है।

Disqus Comment

More From Author

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

नया ताजा