कोष से जरूरी डीजल पर रोक

Submitted by Hindi on Thu, 01/31/2013 - 11:02
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राष्ट्रीय सहारा, नई दिल्ली, अगस्त 1, 2008, सुनीता नारायण की पुस्तक 'पर्यावरण की राजनीति' से साभार
पर्यावरण सुधार के प्रति हमारी प्रतिबद्धता तभी साबित होगी, जब हम प्रहार के लिए समस्याओं की जड़े चुनें, न कि तनें। हमें हर हाल में ऐसी नीति पर बढ़ना होगा, जिसके तहत डीजल वाली कारों को सड़कों से हटाया जा सके। यह प्रतिबंध के जरिए हो सकता है या ऐसे उपायों के जरिए जिससे उपभोक्ता खुद डीजल कारों के प्रयोग से दूर हट जाएं। हमें ऐसे कारणों को देखना होगा, जिसके परिपेक्ष्य में ही उपभोक्ता डीजल वाली कारों को प्राथमिकता देते हैं। जाहिर है इसमें सब्सिडी प्रमुख है। देश में डीजल पर काफी सब्सिडी दी जाती है। दिल्ली सरकार द्वारा ‘पर्यावरण कोष’ की स्थापना का फैसला उचित है। इसका स्वागत होना चाहिए, किंतु यह समझना जरूरी है कि प्रदूषण के बढ़ते स्तर को देखते हुए ऐसे कदम पर्याप्त नहीं हैं। पर्यावरण उपकर के तौर पर अभी 25 पैसे प्रति लीटर की जो बढ़ोतरी की गई है उससे सिर्फ 48 करोड़ रुपए ही सालाना आने वाले हैं, जो पर्यावरण से जुड़ी महंगी योजनाओं के लिए काफी कम ही कहा जाएगा। फिर सरकार के इस फैसले से निजी गाड़ियों खासकर डीजल कारों की बढ़ती संख्या पर कोई खास असर नहीं पड़ने वाला है। जबकि पर्यावरण प्रदूषण से बचने के लिए जरूरत इस बात की है कि कैसे सड़कों पर रोज़ाना उतर रही इन बेहिसाब कारों पर लगाम लगाई जाए। जाहिर है कि डीजल वाली कारें पर्यावरण के लिए आज ख़ासी नुक़सानदेह साबित हो रही हैं और अगर इस पर सख़्ती से लगाम नहीं लगी, तो शहरों का वातावरण कुछ ही दिनों में दमघोंटू हो जाएगा।

दरअसल, पर्यावरण सुधार के प्रति हमारी प्रतिबद्धता तभी साबित होगी, जब हम प्रहार के लिए समस्याओं की जड़े चुनें, न कि तनें। हमें हर हाल में ऐसी नीति पर बढ़ना होगा, जिसके तहत डीजल वाली कारों को सड़कों से हटाया जा सके। यह प्रतिबंध के जरिए हो सकता है या ऐसे उपायों के जरिए जिससे उपभोक्ता खुद डीजल कारों के प्रयोग से दूर हट जाएं। हमें ऐसे कारणों को देखना होगा, जिसके परिपेक्ष्य में ही उपभोक्ता डीजल वाली कारों को प्राथमिकता देते हैं। जाहिर है इसमें सब्सिडी प्रमुख है। देश में डीजल पर काफी सब्सिडी दी जाती है। इसके पीछे सार्वजनिक परिवहन को सस्ता बनाने की नीति है, किंतु शहरों खासकर दिल्ली में इसका लाभ निजी वाहन मालिक ही उठाते हैं। आज ऐसी नीति पर चलना जरूरी है, जिससे कारों के लिए सब्सिडी की छूट कम की जा सके। फिर बाजार में जो भी डीजल हो, उसमें सल्फर की मौजूदगी 10 पीपीएम से कम हो, ऐसी प्रौद्योगिकी भी विकसित की जानी चाहिए। अभी सस्ता होने के कारण ही डीजल गाड़ियों की मांग बढ़ी है। कार सस्ती पड़ने के कारण ही कार कंपनियां भी डीजल वाले कार मॉडलों पर अधिक ध्यान दे रही हैं। डीजल के पक्ष में जो भी बताया जाए, सच यही है कि पर्यावरण स्वास्थ्य के लिए इसका धुआँ बेहद नुक़सानदेह है। यह कई श्वास रोगों और कैंसर तक के लिए जिम्मेदार है। पेट्रोल कारों की तुलना में डीजल कारें करीब 8 गुना जहरीला धुआँ छोड़ती हैं। नाइट्रोजन ऑक्साइड का उत्सर्जन इनमें 33 प्रतिशत तक अधिक होता है। जिस यूरो-3 एवं भारत स्टेज-3 मानक के डीजल कारों को सुरक्षित बताया जा रहा है, वो भी दूषित गैसों के उत्सर्जन में कम नहीं हैं। अभी दिल्ली में रोज़ाना करीब 300 डीजल कारें सड़क पर उतरती हैं। यह कुल कारों का 30 प्रतिशत है। जिस रफ्तार से डीजल कारों की संख्या बढ़ रही है, उससे साफ है कि 2010 तक डीजल कारों की संख्या कुल संख्या का 50 प्रतिशत होगी। सरकार को फौरी तौर पर कठोर निर्णय लेने होंगे, तभी समस्या का सही तौर पर निपटारा हो सकेगा।

डीजल कारों के निर्माण में कहीं न कहीं उत्सर्जन के मानकों से भी समझौता किया जाता है। दिल्ली ही नहीं, देश के अच्छे पर्यावरण के लिए सड़कों पर नई डीजल कारों के उतरने पर रोक लगाने की नीति जरूरी है। दिल्ली में अभी जो एक लाख 20 हजार डीजल कारें चल रही हैं उनमें भी सीएनजी किट लगाने की व्यवस्था की जा सकती है। दरअसल, सरकार को इस मुद्दे पर अपना नज़रिया बिल्कुल साफ कर लेना चाहिए। कार कंपनियों के दबाव में आने की कोई जरूरत नहीं है। पर्यावरण का मसला आज के सबसे बड़े मसलों में से है, इसलिए इसके लिए सख्त होना ही होगा। पर्यावरण कोष की स्थापना के बाद सरकार को डीजल गाड़ियों पर लगाम लगाने की नीति पर बढ़ना चाहिए।

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