मंदी के गुनहगार और खेवनहार

Submitted by Hindi on Wed, 02/06/2013 - 16:02
Source
हिन्दुस्तान, नई दिल्ली, दिसम्बर 16, 2008, सुनीता नारायण की पुस्तक 'पर्यावरण की राजनीति' से साभार
इस समझ को बदलना कि ख़ुशियाँ कैसे आती है और सबको रोज़गार कैसे मिल सकता है। इसका अर्थ होगा उस पैमाने को बदलना जिससे हम अर्थव्यवस्था के विकास को मापते हैं। अभी तो हम नहीं बदलेंगे। दुनिया अभी भी उन लोगों के ही हाथ में है जिन्होंने हमें इस संकट में पहुंचाया है। उनकी सीमित कल्पना-शक्ति और सोच के चलते ही आज हम यहां हैं। यह उनकी कल्पना-शक्ति ही थी जिसने एयरलाइंस को पहले यह समझाया कि वे उतनी सस्ती सेवा दे सकती हैं जितना कि रेलवे। फिर सार्वजनिक धन से उन्हें उस सेवा के लिए राहत दी जो आम आदमी की हैसियत में है ही नहीं। इसलिए किसी बदलाव की उम्मीद मत कीजिए। हो सकता है कि यह वित्तीय संकट अभी चला जाए। लेकिन असली आंधी का आना अभी बाकी है।इस साल की शुरुआत में मैंने केंद्र सरकार के बजट को दूर-दृष्टिहीन कहा था। मैं यह बात अब फिर दोहराना चाहती हूं। क्यों? इसलिए कि केंद्रीय बजट इस बात को नज़रअंदाज़ कर गया कि दुनिया के सामने कौन सी नई चुनौतियाँ आने वाली हैं। इनमें से ज्यादातर चुनौतियाँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं और इतनी भयानक हैं कि तबाही ला सकें। इनमें से एक है खाद्य पदार्थों की लागत का बढ़ना। याद कीजिए खाद्य पदार्थों की कीमतें जब बढ़ी तो दुनिया के कई हिस्सों में इसे लेकर दंगे तक हो गए। दूसरा संकट था पेट्रोलियम की कीमतों का बुलंदी पर पहुंच जाना। इसकी कीमत जब 140 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई तो पूरी दुनिया में हंगामा खड़ा हो गया था। कीमत अब नीचे आई है लेकिन बाजारों में अस्थिरता है। तीसरा है पर्यावरण में बदलाव का प्रभाव। बारिश के अनियमित हो जाने और पानी की कमी के कारण यह असर सबसे ज्यादा फ़सलों पर दिखाई दिया है। और फिर प्राकृतिक आपदा की घटनाएँ भी बढ़ रही हैं। और चौथा है अमेरिका की अगुवाई में दुनिया भर में आई मंदी।

यह मंदी अब हमारे सर चढ़कर बोल रही है। कंपनियां और बैंक डूब रहे हैं और उन्हें राहत देने के लिए सरकारें करोड़ों डॉलर की रकम पानी की तरह बहा रही हैं। दूरदृष्टि की कमी ने सारी दुनिया के लिए परेशानी खड़ी कर दी है। चिंता में डालने वाली चीज यह संकट नहीं है, उसकी बड़ा आकार नहीं है, उससे होने वाली तबाही भी नहीं है। चिंता में डालने वाली बात हमारे वित्तीय और राजनैतिक मैनेजरों की प्रतिक्रिया है। इन सबने एक ही जैसी पढ़ाई कर रखी है, वे एक ही भाषा बोल रहे हैं, और एक ही जैसा काम कर रहे हैं। वे सब मानते हैं कि वे इस दुनिया को समझते हैं और उनके पास हर सवाल का जवाब है। जब पुरी दुनिया सदमे में थी वे इसे नज़रअंदाज़ कर रहे थे। पहले उन्होंने कहा कि चिंता मत कीजिए यह संकट हमें छू भी नहीं पाएगा। अब वे कह रहे हैं कि जल्द ही यह समय भी गुजर जाएगा।

सच यह है कि जो हो रहा है उसकी इनमें कोई समझ नहीं है। वे इसे भी स्वीकार करने से इनकार करते हैं कि यह संकट विकास के उस रास्ते से जुड़ा हुआ है जिसे अभी तक हमने अपनाया है। हम यह मानते हैं कि उपभोग करके ही हम विकास करेंगे और उपभोग करके ही हम इस संकट के भी पार निकल जाएंगे। ‘चिंता नहीं उपभोग कीजिए’ – यही इस दौर का मंत्र है। और अगर आपकी हैसियत नहीं है, तो भी चिंता मत कीजिए, वित्त व्यवस्था आपके लिए कर्ज का इंतज़ाम कर देगी। घर, कार, वाशिंग मशीन जो भी आप चाहें उसके लिए सस्ता कर्ज हाज़िर है। आखिर आप उपभोग करेंगे तभी तो विकास के आंकड़े ऊपर उठेंगे और दुनिया खुश होगी।

इस मॉडल की दिक्कत यह है कि इसमें हम चीजों की लागत को इतना नीचे लाने के लिए कुछ नहीं करते कि वह हमारी हैसियत में आ जाए। दूसरे शब्दों में हम चीजों को यह सोच कर न तो डिज़ाइन करते हैं और न ही उत्पादन करते हैं कि वह लोगों की क्रय क्षमता के भीतर आ जाएं। हमें ऐसी तकनीक नहीं चाहिए जो सस्ती चीजें बनाए। हम सब विकास में, संपत्ति में इस तरह साझेदार भी नहीं कि घर या कार हमारी क्रय क्षमता के भीतर आ जांए। हमें इसके लिए कर्ज चाहिए जिससे बैंकों में तेजी आती है और फिर यह बुलबुला फूट जाता है। अमेरिका में जो सब-प्राइम संकट आया था उसका कारण यही था कि लोगों को सस्ते कर्ज दिए गए ताकि वे घर खरीद सकें। इससे घर लगातार महंगे होते गए और क्रय शक्ति के ज्यादा बाहर चले गए।

दूसरा तरीका यह है कि हम चीजों पर सबसिडी दें ताकि चीजों का उपभोग हो सके। नैनो का उदाहरण लीजिए। भारत में हर कार उत्पादक सस्ती जमीन, ब्याज मुक्त कर्ज, लगभग मुफ्त जल और विद्युत आपूर्ति हासिल कर रहा है। यह सब इसलिए कि वह कार की लागत कम कर सके। उस कार की जो हमारी पहुंच में होगी ही नहीं। अर्थव्यवस्थाएं एक स्तर पर उपभोग को सबसीडाइज करने की कोशिश करती हैं। यह कहानी अमीर देशों की कृषि की है। वहां किसानों को डॉलर में सबसिडी मिलती है ताकि वे खाद्यान्न की खेती करें। ताकि लोग सस्ता उपभोग और अति उपभोग कर सकें। नतीजा यह है कि मोटापा वहां रोग की तरह फैल रहा है। यह भी एक सच है की उपभोग की इस अर्थव्यवस्था ने ही दुनिया को पर्यावरण विनाश की कगार पर पहुंचा दिया है। लेकिन क्या हम इन संबंधों को पहचानने लगे हैं?

अभी तो मौजूदा संकट से निकलने का एक ही रास्ता सुझाया जा रहा है कि अभी तक हम जो करते रहे हैं उसे और करें। जार्ज बुश ने 700 अरब डॉलर का जो राहत पैकेज जारी किया है उसके लिए यही कहा गया है कि वह गरीब मजदूर की मदद के लिए है। ‘बैंक को कर्ज देने के लिए धन की जरूरत है, अन्यथा आम अमेरिकी के पास कार खरीदने के लिए पैसा नहीं होगा। जिसका अर्थ होगा कि डेट्रॉयट की नौकरी चली जाएगी।’ साधारण सा तर्क है-खरीदते रहो ताकि अर्थव्यवस्था चलती रहे।

इस तरह से तो यह दुष्चक्र चलता ही रहेगा। भले ही इसकी कीमत हमारे बैंकों को या इस धरती को चुकानी पड़े। हम इस पर बात नहीं करेंगे। बात करने का अर्थ होगा उस तरीके को बदलना जिस पर विकास की हमारी समझ आधारित है। इस समझ को बदलना कि ख़ुशियाँ कैसे आती है और सबको रोज़गार कैसे मिल सकता है। इसका अर्थ होगा उस पैमाने को बदलना जिससे हम अर्थव्यवस्था के विकास को मापते हैं। अभी तो हम नहीं बदलेंगे। दुनिया अभी भी उन लोगों के ही हाथ में है जिन्होंने हमें इस संकट में पहुंचाया है। उनकी सीमित कल्पना-शक्ति और सोच के चलते ही आज हम यहां हैं। यह उनकी कल्पना-शक्ति ही थी जिसने एयरलाइंस को पहले यह समझाया कि वे उतनी सस्ती सेवा दे सकती हैं जितना कि रेलवे। फिर सार्वजनिक धन से उन्हें उस सेवा के लिए राहत दी जो आम आदमी की हैसियत में है ही नहीं। इसलिए किसी बदलाव की उम्मीद मत कीजिए। हो सकता है कि यह वित्तीय संकट अभी चला जाए। लेकिन असली आंधी का आना अभी बाकी है।

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