भय फैलाते अभ्यारण्य

Submitted by Hindi on Mon, 03/04/2013 - 11:36
Source
गांधी मार्ग, मार्च-अप्रैल 2013
सहरियाओं की दुर्गति यहीं समाप्त नहीं होती। राज्य ने अब कुनो के नजदीक बह रही नदी पर सिंचाई योजना प्रस्तावित कर दी है। अगर यह हुआ तो 10 गांवों की 1220 हेक्टेयर भूमि डूब में आ जाएगी। इसका अर्थ है पहले से उजड़े 10 में से 4 गांवों को फिर से विस्थापन की पीड़ा से गुजरना पड़ेगा। मध्यप्रदेश के खजूरीगांव के रंगू को कैमरे से डर लगता है। उसका यह डर निजी अनुभव से उपजा है। वर्ष 2000 में उसे, उसके परिवार को अन्य 1650 लोगों के साथ श्योपुर जिले के पालपुर कुनो वन्यजीव अभ्यारण्य से बाहर निकाल दिया गया था। उन दिनों को याद करते हुए रंगू बताता हैः ”एक दिन सरकारी अधिकारी हमारी तस्वीर खींचने आए। जब हमने इसका कारण पूछा तो उन्होंने हंसते हुए कहा तुम्हें काला पानी भेजा जा रहा है। हमने सोचा कि वे मजाक कर रहे हैं। लेकिन बाद में उन्होंने सचमुच हमें जंगल से बेदखल कर दिया। जंगल के बाहर बिताए पिछले बारह वर्ष किसी जेल से भी बदतर हैं।“ रंगू सहरिया जाति के हैं। सहरिया का अर्थ है ‘शेर का साथी’। सहरिया देश की सर्वाधिक जोखिम में पड़े 75 समूहों में से एक है।

सन् 1999 से 2002 के बीच कुनो के चौबीस गांवों को बिना उचित मुआवजा दिए बाहर हटा दिया था। सदियों से बसे गांवों में सहरिया लोगों ने अपने ढंग से जीवनयापन की सुंदर व्यवस्था कर ली थी। सिंचित खेती थी। वन था, चारा था। वन से बाहर कुछ नहीं था।

इन्हें हटाने की वजह यह थी कि सन् 1995 में केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय ने एक संरक्षण परियोजना के अंतर्गत गुजरात के गिर राष्ट्रीय पार्क में पाए जाने वाले एशियाई शेरों को वहां से कहीं और बसाने के लिए मध्यप्रदेश के कुनो नामक इसी क्षेत्र को उपयुक्त पाया था। अब इस बात को सत्रह वर्ष बीत गए हैं। लेकिन वहां अब तक गुजरात के सिंह नहीं लाए गए हैं। इसकी वजह है कि गुजरात ने अपने इस ‘गर्व’ को किसी और के साथ बांटने से मना कर दिया है। फिर पर्यावरण और वन मंत्रालय ने तय किया कि अब हमारे यहां विलुप्त हो चुके चीतों की प्रजाति को वह अफ्रीका के नामीबिया से लाकर कुनो में बसाएगा। लेकिन यह योजना भी औंधे मुंह गिर पड़ी।

मुआवजा पैकेज के तहत हरेक परिवार को दो हेक्टेयर कृषि भूमि और घर बनाने के लिए 3600 रुपए दिए गए थे। जिन लोगों के पास दो हेक्टेयर से ज्यादा जमीन के कागजात थे, उन्हें अतिरिक्त भूमि हेतु नकद मुआवजा विस्थापन के नौ वर्ष बाद दिया गया। जैसा स्वाभाविक ही है कि अनेक वनवासी बिना सरकारी रिकॉर्ड के खेती कर रहे थे। उन्हें भूमि के बदले मुआवजा नहीं दिया गया। जब वन में रहते थे तो इन परिवारों को वन उपज से भी कुछ मिल जाता था। बाहर फेंके जाने पर लघु वनोपज से होने वाली आमदनी भी चली गई। उसका मुआवजा इन्हें प्राप्त नहीं हुआ। आमदनी का अन्य कोई स्रोत न होने से अनेक लोगों ने रोजंदारी पर मजदूरी करना शुरू कर दिया।

चाक गांव के सुजानसिंह को वर्ष 1991 में बेदखल किया था। उनके 10 में से 4 बेटे आज प्रवासी मजदूर हैं। उनका कहना है, ”हमें दी गई जमीन बहुत उपजाऊ नहीं थी। एक फुट खोदने पर नीचे चट्टानें हैं। इससे मिलने वाली उपज से हमारे परिवार का पोषण नहीं होता। अधिकारियों ने विस्थापित गांवों के खेतों में सिंचाई के लिए कुआं खोदने कुछ वित्तीय सहायता का प्रस्ताव रखा था। रंगू और दो अन्य लोगों ने कुआं भी खोदा। लेकिन इसमें पानी नहीं आया। इसके बाद एक और कुंआ खोदना शुरू किया लेकिन धन के अभाव में वह उसे पूरा नहीं कर पाया।

दिल्ली स्थित अंबेडकर विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ह्यूमन इकॉलोजी (मानव पारिस्थितिकी अध्ययन केंद्र) की अस्मिता काबरा ने वर्ष 2009 में इस क्षेत्र में कुछ काम किया था। उस अध्ययन से पता चलता है कि कुनो के गांवों से विस्थापित 10 व्यक्तियों में से 8 गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन कर रहे हैं। गैर सरकारी संगठन ‘संरक्षण’ के सैयद मेराजुद्दीन का कहना है कि इसकी मुख्य वजह है लघु वन उपज तक उनकी पहुंच का प्रतिबंधित होना। काबरा का अध्ययन बताता है कि घटता कृषि उत्पादन, जंगली मांस, फलों और सब्जियों तक पहुंच बाधित होने से सहरियाओं पर बीमारी का प्रकोप भी बढ़ गया है। वन से बाहर किए जाने के शुरुआती वर्षों में अनेक व्यक्तियों की मृत्यु की बात सामने आई थी।

वर्ष 2012 में हुई एक सुनवाई में गुजरात ने तर्क दिया कि कुनो में शेर इसलिए नहीं लाना चाहिए क्योंकि मंत्रालय की प्राथमिकता अभ्यारण्य में चीता लाने की है। न्यायालय ने इस मामले में नियुक्त अपने सलाहकार पी.एस. नरसिम्हा के आवेदन पर चीता परियोजना के क्रियान्वयन पर ही रोक लगा दी।पर्यावरण और वन मंत्रालय ने एशियाई शेरों को दूसरी जगह बसाने की पहल भारतीय वन्यजीव संस्थान की अनुशंसा पर की थी। इसमें कहा गया था कि गिर में उपलब्ध सीमित स्थान की वजह से शेरों में महामारी फैलने की आशंका बढ़ जाएगी। फिर एक अध्ययन के बाद संस्थान ने शेरों के दूसरे रहवास के रूप में मध्यप्रदेश के कुनो को चुना। संस्थान ने यह अनुशंसा भी की थी कि अभ्यारण्य में स्थित गांवों को कोर क्षेत्र से बाहर कर दिया जाए। काबरा के अनुसार अनुशंसाएं बिना किसी विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन के हुई थीं। सहअस्तित्व यानी गांव और शेर एक साथ रह सकते हैं- इसकी संभावनाएं तलाशी नहीं गई थीं। जब गुजरात से कुछ शेर देने की बात की गई तो राज्य ने इस गर्वोक्ति के साथ ऐसा करने से इंकार कर दिया कि उसने अपने प्रयत्नों से शेरों की संख्या बढ़ाई है। यह सन् 1985 में 191 थी और वर्ष 2010 में 400 हो गई। सन् 2006 में दिल्ली स्थित गैरसरकारी संगठन बायोडायवरसिटी कंजरवेशन ट्रस्ट ने सर्वोच्च न्यायालय में दायर जनहित याचिका के माध्यम से गुजरात सरकार को इस संबंध में दिशा निर्देश देने की अपील दायर की। यह मामला अभी भी न्यायालय में लंबित है।

शेरों के हस्तांतरण की परियोजना चल नहीं पाई तो फिर पर्यावरण और वन मंत्रालय ने चीता को कुनो में लाना तय किया। इसके लिए 300 करोड़ रुपए का निवेश भी तय हो गया। सन् 1952 तक हमारे देश में चीता था। वन्य जीव संस्थान ने यहां बाहर से चीता लाने का अध्ययन किया था।

उसका कहना था कि एक बार कुनो जंगल में चीता आ जाए तो फिर शेरों को भी यहां आने में बाधा नहीं होगी। वर्ष 2012 में हुई एक सुनवाई में गुजरात ने तर्क दिया कि कुनो में शेर इसलिए नहीं लाना चाहिए क्योंकि मंत्रालय की प्राथमिकता अभ्यारण्य में चीता लाने की है। न्यायालय ने इस मामले में नियुक्त अपने सलाहकार पी.एस. नरसिम्हा के आवेदन पर चीता परियोजना के क्रियान्वयन पर ही रोक लगा दी।

यह तय करने के लिए तो संघर्ष चलता ही रहेगा कि किस प्रजाति को कब यहां लाया जाना है, लेकिन वन विभाग सहरियाओं को कुनो के नजदीक भी नहीं बसने देना चाहता! नयागांव को वर्ष 2001 में बेदखल किया गया था। दो वर्ष पश्चात नयागांव से निकाले गए 40 परिवार पुनः अभ्यारण्य में आ गए। उन्हें दिए गए खेतों में खूब कोशिशों के बाद भी फसल नहीं हो पा रही थी। ऐसे में पुराने गांव लौटने के अलावा वे क्या करते। छः माह के भीतर अधिकारियों ने इस वायदे के साथ उन्हें पुनः बेदखल कर दिया कि वे उनके खेतों को उपजाऊ बनाएंगे। विभाग के बेमन से किए जा रहे प्रयासों को देखते हुए ये परिवार पुनः वर्ष 2005 में अभ्यारण्य में वापस आने को बाध्य हो गए। विभाग द्वारा जबरदस्त दबाव बनाए जाने के बाद इस वर्ष अप्रैल में उन्हें पुनः बेदखल होना पड़ा है। बारेलाल कहते हैं ”जिला कलेक्टर ने खेतों की मेंड़बंदी, तीन हैंडपंप और मकान बनाने के लिए 25,000 रुपए देने का वायदा किया था। बाद में उन्होंने धमकी दी कि यदि हम वहां से नहीं हटेंगे तो हमारी झोपडि़यां जला दी जाएंगी।“

सहरियाओं की दुर्गति यहीं समाप्त नहीं होती। राज्य ने अब कुनो के नजदीक बह रही नदी पर सिंचाई योजना प्रस्तावित कर दी है। अगर यह हुआ तो 10 गांवों की 1220 हेक्टेयर भूमि डूब में आ जाएगी। इसका अर्थ है पहले से उजड़े 10 में से 4 गांवों को फिर से विस्थापन की पीड़ा से गुजरना पड़ेगा।

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