यमुना मुक्ति पदयात्रा के आगे क्या...

Submitted by Hindi on Fri, 03/15/2013 - 09:55
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यदि हमें नदियों को और इनके बहाने से खुद को बचाना है, तो सामाजिक जवाबदारी व हकदारी दोनों एक साथ सुनिश्चित करनी ही होगी। जहां समाज ने आगे बढ़कर जवाबदारी उठा ली है; नदी के साथ व्यवहार की नीति तय कर ली...संकल्प पक्का हो गया, वहां गंदी नदी साफ हो गई; सूखी नदी नीली उमंगों से भर गई। उत्तराखंड की सूखी गाड, सहारनपुर की पावंधोई, पंजाब की कालीबेंई, अलवर-जयपुर-करौली की अरवरी, सरसा आदि नदियां इसकी प्रमाण हैं। जहिर कि जवाबदारी तब तक नहीं आती, जब तक कि हकदारी स्पष्ट न हो।

मान मंदिर, बरसाना, उत्तर प्रदेश के प्रमुख पदधारी के अलावा रमेश बाबा की पहचान पिछले कुछ सालों से ब्रज के कुण्डों में नीलिमा भरने और पहाड़ियों पर हरीतिमा रोपने के प्रकृति प्रिय काम की प्रेरक शक्ति के रूप में भी हैं। रचना ने सत्याग्रह की शक्ति दी। ब्रज ने दिल्ली पर चढ़ाई कर दी। पहली हुंकार ने मैदान तैयार किया। दूसरी हुंकार का नज़ारा अभी इसी मार्च के दूसरे पखवाड़े तक पूरे हिंदुस्तान ने मीडिया में देखा। राधा रानी की जय! जमुना मैया की जय!! जयघोष करता एक जनसैलाब बरसाने से उमड़ा और बजाय जंतर-मंतर रोड के पूर्व तय गंतव्य तक पहुंचने के दिल्ली-उ. प्र सीमा पर स्थित सरिता विहार के इलाके में सिमटने को मजबूर कर दिया गया। जंतर-मंतर आज भी खगोल विज्ञान के काम की जगह है, लेकिन इसके नाम पर दर्ज रोड अब तंत्र के समक्ष जन की शक्ति के प्रदर्शन का केन्द्र बन गई है। खैर! राधा रानी के बहाने ब्रज से चली “राधा रानी यमुना मुक्ति पदयात्रा’’ फिलहाल विराम ले चुकी है। गंगा का पानी हिंडन के जरिए मथुरा में छोड़े जाने का वायदा यमुना रक्षक दल और साथी संगठनों से किया गया। सीवेज को साफ करने के बाद यमुना में डालने की बजाय इसके समानान्तर नाला बनाकर आगे कृषि आदि उपयोग के लिए छोड़ दिया जायेगा। इसकी कार्ययोजना बनाने के लिए एक समिति गठित होगी। यमुना रक्षक दल के प्रतिनिधि इसमें सदस्य होंगे। यमुना रक्षक दल इतने से संतुष्ट हो सकता है। आस्था के अपने ही बनाये केन्द्रों को धुरी मान खुद को चमकाने में व्यस्त धर्मसत्ता के लिए यह प्रयास प्रकृति को धुरी मानकर उसे चमकाने के लिए आस्था को लामबंद करने की सीख दे सकता है; किंतु क्या यमुना के संतुष्ट होने के लिए यह काफी है? क्या इतने से कृष्ण प्यारी की प्राण रक्षा हो जायेगी? नहीं, तो आगे क्या? यह प्रश्न हमारे मन में उठना चाहिए। जरा पीछे मुड़कर देखें, तो जवाब मिल जायेगा कि क्यों।

आंदोलन के बाद क्या? : एक जरूरी सवाल


नदी तल का रेत, पत्थर, चट्टानें, प्रवाह, नदी की ज़मीन, तथा नदी को नदी बनाने वाली सहायक छोटी धाराएं, जीव व वनस्पतियों को हासिल किए बगैर कोई नदी अपने नैसर्गिक स्वरूप को वापस नहीं पा सकती। इस सत्य से हम सभी अवगत हैं। पिछले 101 वर्ष में इसे हासिल करने के लिए कई आंदोलन हो चुके हैं। टिहरी-नर्मदा का अतीत, यमुना का दिल्ली सत्याग्रह, गंगा बचाओ, नदी बचाओ, उत्तराखंड में बहन सुशीला भंडारी की गिरफ्तारी, राजेन्द्र सिंह के खिलाफ उक्रांद का ऐलान, नई बहुगुणा सरकार में उन्हें खदेड़ बाहर करने का षडयंत्र, जी डी अनशन-दर-अनशन, स्वामी निगमानंद की शहादत और गंगा एक्सप्रेसवे के ज़मीन कब्ज़ा अभियान के दौरान रायबरेली-प्रतापगढ़ में हुई मौत और मिर्जापुर में बरसी लाठियों जैसी तमाम संवेदनशील घटनाओं के बावजूद आज पूरा का पूरा जैवविविधता तंत्र ही दांव पर है। देशभर में नदियों के आंदोलन चल रहे हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल के अलावा देश की कई अदालतों में नदी प्रदूषण-शोषण को लेकर मुकदमें ही मुकदमें हैं। फैसले भी नजीर बनकर सामने आइना दिखा रहे हैं। पालना की कोई गारंटी नहीं। नतीजा, हालांकि इस बात से इंकार से नहीं किया जा सकता कि आंदोलन तथा विरोध के ऐसे अन्य प्रयास अपने पीछे कुछ न कुछ ऐसा अवश्य छोड़ जाते हैं, जिसका पीछा करके आगे का रास्ता बन सकता है। लेकिन नदियों के मामले में होता यह रहा है कि हर आंदोलन नदियों के नाम पर कुछ और बजट.. कुछ और कार्यतंत्र का बोझ बढ़ा देता है। नदियां वहीं की वहीं रहती हैं। नदियां मर रही हैं और विवाद बढ़ रहे हैं। आगे और बढ़ेंगे। विवाद छोटी और बड़ी बहन के किनारे बसने वालों से लेकर देशों के बीच होने की नौबत आ ही गई है। इन्हें थामने के लिए जरूरी हो गया है यह पूछना कि ‘आंदोलन के बाद क्या?’ जब सवाल पूछी ही नहीं होगी, तो जवाबदारी कहां से आयेगी !

स्पष्ट हो हकदारी और जवाबदारी।


यदि हमें नदियों को और इनके बहाने से खुद को बचाना है, तो सामाजिक जवाबदारी व हकदारी दोनों एक साथ सुनिश्चित करनी ही होगी। जहां समाज ने आगे बढ़कर जवाबदारी उठा ली है; नदी के साथ व्यवहार की नीति तय कर ली...संकल्प पक्का हो गया, वहां गंदी नदी साफ हो गई; सूखी नदी नीली उमंगों से भर गई। उत्तराखंड की सूखी गाड, सहारनपुर की पावंधोई, पंजाब की कालीबेंई, अलवर-जयपुर-करौली की अरवरी, सरसा आदि नदियां इसकी प्रमाण हैं। जहिर कि जवाबदारी तब तक नहीं आती, जब तक कि हकदारी स्पष्ट न हो। अतः पहली स्पष्टता नदी के हक को लेकर भी होनी चाहिए। आखिर नदी को भी अच्छी उमंग और स्वस्थ तरंग के साथ जीने का कोई हक है या नहीं? सवाल उत्तराखंड, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश से पहले यमुना को इसकी सेहत के ठीक रखने के लिए कितना और कैसा पानी चाहिए... सबसे पहले यह सवाल उठना चाहिए कि नहीं उठना चाहिए? यदि नदी को इसकी हकदारी दे दी, तो यह अपनी सेहत ठीक रखने की जवाबदारी खुद ही निभा लेगी। यह गारंटी है। इसके बाद नंबर आता है नदी पर आश्रित मनुष्य के साथ -साथ शेष वनस्पति-जीवों के हक का।

नदियां किसकी हैं? इनके उपयोग का हक किसका और कितना है? यह स्पष्ट होना दूसरा बेहद जरूरी काम है। उपयोग का हक जिसके पास होगा, नदी की अविरलता और निर्मलता सुनिश्चित करने की जवाबदारी में नदी के साथ-साथ वह भी पूरी तरह हो जायेगा। इस पर आज तक कोई स्पष्टता नहीं है। इसीलिए नदी अपनी बीमारी के इलाज के लिए अलग-अलग डॉक्टरों के बीच भटक रही है। केमिस्ट इसी का फायदा उठाकर मनचाही दवाइयाँ नदी के इलाज के लिए थमा कर पैसा कमाने की जुगत लगाता रहता है। देश का कितना पैसा इसी में बर्बाद हो रहा है। स्पष्ट है कि हकदारी और जवाबदारी की संवैधानिक व सामाजिक स्पष्टता तय किए बगैर कार्यक्रम या योजना बनाने का काम जब तक चलता रहेगा, नदियों पर आंदोलन जारी रहेंगे, खर्च बढ़ता रहेगा और नदियां मरती रहेंगी। अब इनके मरने का ग्राफ, गति और विवादों का आंकड़ा बहुत तेजी से बढ़ रहा है। चेतावनी कड़ी है। आगे ऐसा न हो, अतः जरूरी है कि जोर टुकड़े पर न होकर आर-पार पर हो;स्पष्टता और समग्रता पर हो। ऐसा कैसे होगा? सोचिए! मुझे भी बताइये।

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

शिक्षा:


स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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