सूखे बुंदेलखंड में नहीं मिलेगा पानी

Submitted by Hindi on Tue, 03/19/2013 - 11:34
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इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीटिरियोरोलॉजी इंस्टीट्यूट का अध्ययन कहता है कि वर्ष 2100 तक बुंदेलखंड अंचल में शीतकालीन वाष्पीकरण घटकर 50 फीसदी से भी कम रह जाएगा। यही वह मौसम है, जब समूचे अंचल में गेहूं की खेती होती है।

लगातार सात साल तक सूखे जैसे हालात का असर बुंदेलखंड की हरियाली पर पड़ा है। हालांकि, 18वीं और 19वीं सदी के दौरान बुंदेलखंड में हर 16 साल बाद सूखे का दौर आया, लेकिन 1968 से 1992 के बीच सूखे की अवधि में तीन गुने का इज़ाफा हुआ है। इसकी सबसे करारी मार अंचल के 25 फीसदी दलित और आदिवासी तबके पर पड़ा है। अंचल की 75 फीसदी आबादी जीने के लिए खेती पर निर्भर है, पर खरीफ के सीजन में आप चले जाएं तो 20 फीसदी रकबे में ही फसल नजर आएगी। मप्र में बुंदेलखंड के 6 जिले हैं। दतिया को छोड़कर बाकी पांचों जिलों में मैं घूम चुका हूं। इनमें से चार जिलों में दो बार से ज्यादा यात्राएं हुई हैं और हर बार मैंने वहां की हरियाली को घटते ही देखा है। मौसमी बदलाव का ज़मीनी चेहरा अब साफ नजर आने लगा है। सबसे खराब हालत दतिया और टीकमगढ़ की है। अध्ययनकर्ता एमएन रमेश और वीके द्विवेदी की रिपोर्ट के मुताबिक अब 10 फीसदी से भी कम जंगल बचे हैं। बाकी चार जिलों सागर, छतरपुर, पन्ना और दमोह के 29.69 फीसदी हिस्से में जंगल हैं। पन्ना में इसका श्रेय टाइगर रिजर्व को जाता है, वरना चारों जिलों में अवैध खनन खरपतवार की तरह फैल रहा है।

टीकमगढ़ से निकलकर जैसे ही छतरपुर की ओर बढ़ेगे, आपको सड़क के दोनों तरफ खड़खड़ाते क्रेशर और उड़ती धूल नजर आएगी। एक समय बुंदेलखंड का 37 पीसदी से बड़ा इलाका बियाबान था। यहां की पहाड़ियां लंबे, ऊंचे पेड़ों से ढंकी थी। छतरपुर में रहने वाले जाने-माने पर्यावरणविद् और आईआईटी के गोल्ड मेडलिस्ट भारतेंदु प्रकाश ने बड़े ही चिंतित लहज़े में हमें बताया कि अंचल के अधिकतम और न्यूनतम तापमान में आया बदलाव असल में तेजी से खत्म होते जंगलों के कारण है। ये जंगल धरती के लाखों वर्षों के विकास क्रम का नतीजा है। जंगलों के लगातार सफाए के चलते भारतेंदु जी कहते हैं, इस नुकसान की भरपाई अब किसी भी सूरत में नहीं हो सकती। ये जंगल बारिश को खींचते हैं। पेड़ के हर पत्ते में पानी संग्रहित होता है। सूर्य की किरणें जब इन पर पड़ती है तो प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के साथ ही वाष्पीकरण भी होता है। यह पारे की चाल पर लगाम लगाता है। उन्होंने कहा कि सरकार चाहे लाख दावे कर ले, लेकिन वह पहाड़ की ढाल पर दोबारा पेड़ नहीं लगा सकती।

एमएन रमेश के अध्ययन में यह बात भी सामने आई है कि बुंदेलखंड के सभी 13 जिलों में 1991 से 2003 के दौरान जंगल सबसे तेजी से कम हुए। पुणे के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीटिरियोरोलॉजी इंस्टीट्यूट का अध्ययन कहता है कि वर्ष 2100 तक बुंदेलखंड अंचल में शीतकालीन वाष्पीकरण घटकर 50 फीसदी से भी कम रह जाएगा। यही वह मौसम है, जब समूचे अंचल में गेहूं की खेती होती है। नमी की मात्रा घटकर आधी रह जाने का नतीजा गेहूं की पैदावार में गिरावट के रूप में सामने आएगा। भारतेंदु जी का आकलन है कि दमोह और सागर में जंगलों के होने से वहां 950 मिलीमीटर से ज्यादा बारिश होती है, लेकिन टीकमगढ़ और छतरपुर में बारिश की मात्रा घटकर 850 मिमी से तोड़ी ज्यादा रह गई है और इसमें आ रही गिरावट ही फ़िक्र की बात है। अब तो सितंबर में ही धूप इस कदर तेज हो जाती है कि वह जमीन की अधिकांश नमी खींच लेती है। इससे किसानों को अपनी फसल लेने के लिए सिंचाई पर ज्यादा जोर देना पड़ता है।

भारतेंदु जी की बात का टीकमगढ़ के पृथ्वी पुर ब्लॉक के राजावर गांव में 77 वर्षीय एक किसान ने भी समर्थन किया। करीब 200 घर वाले राजावर गांव में ज्यादा कुशवाहा रहते हैं। बाबा कहते हैं, ’10 साल पहले हम इसी फरवरी में कावनी-कोदो, गेहूं, मक्का। ज्वाहर उगा लेते थे। अब कोदा नहीं उगता। मूंगफली लगभग ग़ायब हो गई है, जबकि तिल इक्का-दुक्का किसान ही उगा पाते हैं।‘ उन्होंने कहा कि पहले जेठ, यानी जून में ही बारिश हो जाती थी। आजकल सावन और भादो इन दो महीनों में भी 70 प्रतिशत से ज्यादा बारिश होती है। बारिश के दिन घटे हैं तो बूंदों का वेग भी बढ़ा है। भारतेंदु जी इसे थोड़ा और सरल करते हुए बताते हैं कि दरअसल पेड़ की पत्तियां बूंदों की तेजी को कम कर देती हैं। इससे स्प्रंकलिंग इफेक्टक होता है। पहले खेत के चारों ओर पेड़ लगाने का रिवाज था। अब तो मेड़ भी ठीक से नहीं बनते। जीएम और संकर बीजों के आने से कीटनाशकों की खपत तीन गुनी बढ़ी है, सो मेड़ पर मिट्टी को बांधने वाली घास भी हीं उग पाती। हमें इन भयावह परिस्थितियों की चिंता अभी से करनी होगी।

लेखक पत्रकार हैं।

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