गंगा जल की आणविक संरचना आंतरिक शक्ति का द्योतक है -प्रो. उदयकांत चौधरी

Submitted by Hindi on Wed, 03/20/2013 - 12:04
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नदियां केवल हमारी धार्मिक आस्था ही नहीं बल्कि मानव सभ्यता के प्रारंभिक इतिहास से ही मानव का जीवन रही है। जब धरा पर भयंकर दुर्भिक्ष पड़ा था उस वक्त भागीरथ मुनि की कठोर तपस्या ने मां गंगा को स्वर्ग से धरती पर आने के लिए विवश कर दिया। लेकिन स्वर्ग से पृथ्वी पर गिरती प्रचंड धारा को सहन करना संभव न था। यह उस वक्त की सबसे बड़ी समस्या थी कि प्रचंड वेग को धारण कौन करेगा? अंततः जगत के कल्याण के लिए देवाधिदेव महादेव अपनी जटाएं खोलकर हिमालय की उपत्यकाओं में खड़े हो गए। माता गंगा की जो तीव्र धारा थी वो धीमी गति में बदल गई तथा वह युगों-युगों से मानवजाति का पालन-पाषण कर रही है। लेकिन नदियों के प्रवाह को रोकने का कुचक्र, इसे प्रदुषित करने का कुत्सित प्रयास, नदी स्वच्छता की ढोंग, नदियों पर आंदोलन तथा नदियों को जोड़ने की बातें हो रही हैं।

प्रो. उदयकांत चौधरी एक प्रो. का नाम नहीं है। यह नाम है आधुनिक युग के भागीरथ का। मां गंगा को भागीरथ ने अखंड तप द्वारा स्वर्ग से धरती पर लाया परंतु धरती पर आने के बाद माता की दुर्दशा को देखकर इस भागीरथ ने प्रण कर लिया है कि मैं मां के स्वच्छता, पवित्रता, तथा अखंड प्रवाह को कभी भी बाधित नहीं होने दुंगा। क्योंकि नदियां तो साक्षात जगत का उद्धार करती है। जिनके पवित्र प्रवाह में स्नान करके करोड़ों जनता धन्य- हो जाती है। प्रस्तुत है प्रो. उदयकांत चौधरी से डॉ.मनोज चतुर्वेदी और प्रेरणा चतुर्वेदी द्वारा लिए गए साक्षात्कार का संपादित अंशः-

डॉ.मनोज चतुर्वेदी.. सर, आप अपने प्रारंभिक जीवन के संबंध में बताएं?
प्रो. उदयकांत चौधरी.. मैं 15 जुलाई, 1945 को भवानीपुर जिला-दरभंगा (बिहार) में पैदा हुआ। 1961 में कक्षा 10 दरभंगा से, 12वीं 1963 में सी.एम कॉलेज से, 1967 में बीई सिविल इंजिनयरिंग सिंदरी से तथा एम.टेक और पी-एच.डी. क्रमश 1972 और 1975 में आई.आई.टी. मुंबई से हूं। मैंने 1974 में इंजिनयरिंग सर्विस परीक्षा में चुन लिया गया तथा 1976 में मेरी नियुक्ति काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सिविल इंजिनियरिंग विभाग में प्रवक्ता के पद पर हो गई। तथा मैंने 1976 से ही गंगा पर कार्य करना शुरू कर दिया। 1979 में 3 वर्षो में ही उपाचार्य पद पर आ गया। 1987 में प्रोफेसर तथा सितंबर 1994 से सितंबर, 1997 तक विभागाध्यक्ष रहा। मैंने 1985 में गंगा प्रयोगशाला तथा गंगा शोध केंद्र स्थापित करवाया।

डॉ.मनोज चतुर्वेदी.. सुना है कि आपने कई परियोजनाओं तथा पुस्तकों पर भी कार्य किया हैं?
प्रो. उदयकांत चौधरी.. हां, मैंने 1993 से ‘‘चैतन्य धारा गंगा’’ पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। अब तक मेरे 92 लेखों तथा 66 शोध पत्रों का प्रकाशन तथा 29 विद्यार्थियों ने मेरे निर्देशन में कार्य किया है। इसके साथ ही मैंने गंगा प्रबंधन को लेकर पांच सिद्धांतों का विकास किया। ये हैं-
River water sharing
Food Mitigation
Confluence Theory of Meandering Management
Pollution Management
Pollution Modeling

इसके साथ ही मैंने 16 क्षेत्रीय/राष्ट्रीय कार्यशालाओं का आयोजन भी किया है।

बच्चों हेतु हिन्दी में एक लघु पुस्तिका लिखा हूं जिसका नाम है- Ganga- The Living Body System. मैं 2001 में भारत सरकार के टिहरी बांध समिति का सदस्य भी था।

डॉ प्रेरणा चतुर्वेदी.. गंगा पर ही प्रख्यात पर्यावरणविद प्रो. वीरभद्र मिश्र ने भी काम किया है उनके बारे में क्या विचार है?
प्रो. उदयकांत चौधरी.. प्रो. वीरभद्र मिश्र जी एक सम्मानित व्यक्तित्व है। अतः उनके बारे में मैं ज्यादा कुछ कहना नहीं चाहता। एक बात मैं बताना चाहता हूं कि बीएचयू में जो गंगा शोध केन्द्र है। उसके समतुल्य कोई भी शोध केंद्र नहीं है। यह छः प्रमुख परियोजनाओं के संयुक्त प्रयास से बना है। इसमें UGC, CSIR, NST,AICTE,CWC, नार्वे सरकार और यूरोपीय यूनियन के संयुक्त प्रयास का प्रतिफल है।

डॉ.प्रेरणा चतुर्वेदी.. काशी हिन्दू विश्वविधालय स्थित गंगा शोध केन्द्र के बारे में कुछ बताएं?
प्रो. उदयकांत चौधरी.. 35 वर्षों की पूरी की पूरी तपस्या का परिणाम शून्य है। महामना का स्वप्न था कि गंगा, गीता और गायत्री की रक्षा हो।

डॉ.प्रेरणा चतुर्वेदी.. नदियों को जोड़ने के बारे में?
प्रो. उदयकांत चौधरी .. नदियों को जोड़ना घातक होगा। यह बात पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था। मा. अटल जी इस राष्ट्र के नायक हैं। परंतु नदी जोड़ों योजना राष्ट्रहित में नहीं है।

डॉ.मनोज चतुर्वेदी.. तैरने वाला समाज डूब रहा है और यहां से बड़ी मात्रा में जनता का पलायन हो रहा है?
प्रो. उदयकांत चौधरी.. तैरने वाला समाज डूब रहा है। यह प्रख्यात लेखक अनुपम मिश्र जी की पुस्तक है जिसमें उन्होंने बिहार में बाढ़ के संबंध में प्रकाश डाला है। बाढ़ आने पर सबसे पहला दोष नेपाल को देते हैं। नेपाल एक छोटा सा देश है। बाढ़ के लिए हम उसे कब तक दोषी ठहराते रहेंगे। कहा जाता है कि नेपाल ने पानी छोड़ा। इसलिए उत्तर बिहार बाढ़ग्रस्त क्षेत्र बन गया। मोटे तौर पर कह सकते है कि नेपाल बाढ़ का पहला हिस्सा है। वहां हिमालय की चोटियों पर से जो पानी गिरता है, उसे रोकने से खतरे और भी बढ़ सकते हैं, इसलिए नेपाल पर दोष थोपना बंद करना होगा।

श्री अनुपम जी की उपरोक्त बातें पुरानी हो चुकी है तथा नेपाल के कारण बिहार तथा असम डुब जाता है। हमें जल प्रबंधन पर व्यापक रणनीति बनाने की जरूरत है। हमारे पड़ोसी देश शत्रुभाव रखने लगे हैं।

डॉ.मनोज चतुर्वेदी.. नदियां बांध में क्यों फंसती जा रही हैं?
प्रो. उदयकांत चौधरी.. भोगवादी व्यवस्था का यह गलत परिणाम है कि नदियां बांधों में फंसती जा रही हैं। भागीरथी गंगोत्री से निकलती है और टिहरी में भिलंगना में मिलती थी। वहां अपने साथ अलकनंदा की सहायक नदियों के जल को समाहित करके आगे ऋषिकेश की ओर गंगा के नाम से बढ़ती है।

उत्तराखंड जल-विद्युत निगम के अनुसार गंगा-यमुना-शारदा और उसकी सहायक नदियों पर छोटी-बड़ी 157 जल-विद्युत परियोजनाएं हैं। जिन्हें 2012 तक विकसित करना था। अकेले भागीरथी पर एक के बाद एक दस बड़े बांध हैं। मतलब यह है कि भागीरथी और अन्य नदियों को पहाड़ में कहीं पर बहती अवस्था में नहीं छोड़ा जाएगा।

डॉ.मनोज चतुर्वेदी.. गंगा की मौलिक विशेषताएँ?
प्रो. उदयकांत चौधरी .. शक्ति को पदार्थ के रूप में परिवर्तित करने के वैज्ञानिक सिद्धांत के अंतर्गत वह नदी, जो अपनी शक्ति के कुछ अंश से मानव का रूप धारण की हो तथा जो सदा संवेदनशील रही हो वह गंगा है।
समतल मैदानी क्षेत्र की नदी जिसके जल का आवेग अन्य नदियों की तुलना में अत्यधिक हो-वो गंगा है। जल का आवेग जल में ऑक्सीजन की मात्रा को संतुलित रखता है।
विश्व में जिस नदी-बेसिन की भूमि सबसे उपजाऊ हो- वह गंगा है। यह मिट्टी की विशिष्ट संरचना का सूचक है।
जिस नदी का जल सर्वाधिक स्वच्छ एवं धवल हो-वह गंगा है। यह गंगा जल की आणविक संरचना की दूसरे जल से तुलनात्मक भिन्नता एवं आंतरिक शक्ति का द्योतक है।
जिस जल में सड़न न पैदा हो, अर्थात् जिस नदी-जल में घुलित ऑक्सीजन रखने तथा रोग-जीवाणुओं से लड़ने की क्षमता विश्व की अन्य नदियों के जल की तुलना में सबसे ज्यादा हो- वह गंगा है। यह गुण जल में उपस्थित रासायनिक तथा जैविक अवयवों के संग जल की आणविक संरचना की विशेषता को बताता है।
वह नहीं, जिसके बेसिन में रहने वाले लोगों की संख्या विश्व की अन्य नदियों के बेसिन क्षेत्र की तुलना में ज्यादा हो, और जहां 30-40 करोड़ लोग नदी से प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से जुड़े हुए हों - वह गंगा है।
वह नदी, जिसमें अपनी गति एवं प्रवाह को बदलने की रफ्तार बहुत धीमी हो वह नदी गंगा है।
वह नदी, जिसमें अवजल-शुद्धिकरण की क्षमता सर्वाधिक हो-वह गंगा है।
वह नदी, जो सबसे ज्यादा उर्वरक पदार्थों को ढोती हो -वह गंगा नदी है।

डॉ.मनोज चतुर्वेदी.. गंगा बेसिन में वर्षा, लंबाई तथा कुल जल की मात्रा के संबंध में बताएं?
प्रो. उदयकांत चौधरी.. गंगा बेसिन में औसतन 120 से.मी.वर्षा होती है। इसकी कुल लंबाई 2525 कि.मी है। तथा कुल प्राप्त लंबाई 446 मिलियन एकड़ फीट है। हां, इसके बेसिन का 861404 वर्ग कि.मी. क्षेत्रफल है।

डॉ.प्रेरणा चतुर्वेदी.. गंगा के प्रदूषक तत्वों में से कौन-कौन हैं?
प्रो. उदयकांत चौधरी.. प्रमुख प्रदूषक तत्व- कैल्शियम, मैग्नेशियम, आयरन, मैंग्नीज, सोडियम, सल्फेट, फॉस्टफेट, कोबाल्ट, निकिल, कॉपर, लेड, जिंक, कैडनियम और क्रोमियम इत्यादि हैं।

डॉ.मनोज चतुर्वेदी.. गंगा में कीटनाशकों का प्रवाह भी होता है?
प्रो. उदयकांत चौधरी.. कीटनाशकों के प्रवाह के निर्मल गंगा को प्रदूषित गंगा में बदल दिया है। इसमें प्रतिवर्ष 1.15 लाख टन फर्टिलाइजर एवं कीटनाशक प्रवाहित होते हैं। जिनमें नाईट्रोजन 88,600 टन, फास्फोरस 17,000 टन और पोटैशियम 9200 टन है।

डॉ.मनोज चतुर्वेदी.. सहायक नदियों के बारे में बताएं?
प्रो. उदयकांत चौधरी.. भागीरथी तथा अलकनंदा की लंबाई 180 किमी/215 कि.मी. है। भागीरथी का कैचमेंट क्षेत्रफल 8067 किमी है और अलकनंदा का 10963 वर्ग किमी. है। गंगा का कैंचमेंट क्षेत्रफल 19030 वर्ग किमी. है।

डा. प्रेरणा चतुर्वेदी नदी प्रदूषण की समस्या केवल गंगा तक ही सीमित नहीं है?
प्रो. उदयकांत चौधरी.. मैं नदियों के प्रदूषण को लेकर पत्र लिखने वाला हूँ। ये पत्र प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, विरोधी दल के नेता तथा अन्य समाजसेवी संगठनों एवं संत-महात्माओं को भेजे जाएँगे।

लेखक हिन्दुस्थान समाचार में कार्यकारी फीचर संपादक तथा स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर डी.लिट् कर रहें हैं।
लेखिका, कहानीकार, कवयित्री, मनोवैज्ञानिक सलाहकार तथा संपादन से जुड़ी हैं।

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