ऋषियों की घाटी में

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जनसत्ता रविवारी, 17 मार्च 2013
कृष्णमूर्ति फाउंडेशन ने आंध्र प्रदेश में प्रकृति के बीच शिक्षा-दीक्षा की अद्भुत दुनिया रची है। भारत के महान दार्शनिक जिद्दू कृष्णमूर्ति के जीवन दर्शन की छाया वहां पग-पग पर देखी जा सकती है। ‘जितनी शाखाएं, उतने वृक्ष’ उक्ति चरितार्थ होती है। वहां से लौटकर कवि और कथाकार रमेशचंद्र शाह का यात्रा-संस्मरण।

यह संयोग बिधि बिचारी। बीती जनवरी की ही तो बात है जब कृष्णमूर्ति फाउंडेशन, वाराणसी में हर्षद पारेख से पहली मुलाकात हुई थी। कुछ लोगों से आप बार-बार मिल कर भी कभी नहीं मिलते और कुछ लोगों से पहली मुलाकात में ही ऐसे घुल-मिल जाते हैं जैसे साथ ही पैदा हुए हों और साथ ही बड़े भी हुए हों, ‘मनेर मानुष’ इसी को न कहते होंगे। अच्छे ख़ासे इंजीनियर थे हर्षद भाई कनाडा में, मात्र एक प्रवचन सुनकर या पढ़कर कृष्णमूर्ति का, इतने भीतर तक झनझना गए कि करिअर-वरिअर जमा-पूंजी सब उसी प्रेरणा पर न्योछावर कर दी। कृष्णमूर्ति ने पहले तो उन्हें टालने और विरत करने की कोशिश की, फिर देखा कि आदमी सिर्फ जुनूनी ही नहीं, सचमुच हीरा आदमी है और मानेगा नहीं। तो बोल दिया पढ़ाने को अपने किसी स्कूल में। अब वे भारत में जो श्रृंखला है, कृष्णमूर्ति द्वारा स्थापित विद्यालयों की, उसी से जुड़े हुए हैं: समग्र निरीक्षक के रूप में और शिक्षक भी गाहे-बगाहे। अब यों तो महाराष्ट्र और कर्नाटक में भी उनके स्कूल चलते हैं, पर ‘ऋषिवैली’ की कुछ ज्यादा ही चर्चा सुनने में आई है। तो हैदराबाद में बैठे-ठाले यों ही एक दिन खयाल आया कि क्यों न इस ‘कानों सुनी’ को ‘आंखों देखी’ कर लिया जाए। हर्षद भाई हैं ही वहां। एक रात भर का ही तो सफर है। क्या पता, अभी ‘ऋषिवैली’ में ही विराजमान हों! मोबाइल लगाया तो पता चला अभी वे बेंग्लूर में हैं, पर अगले माह ऋषिवैली में होंगे। मैं अवश्य उनका आतिथ्य स्वीकार करूँ।

‘ऋषिवैली’ नाम ही किस कदर लुभावना है। लैटिन का एक शब्द-युग्म है- ‘जीनियस लोसाई’- यानी ‘स्थान देवता’ अक्षरशः। हर जगह की न भी सही, कुछ जगहों की तो यकीनन कुछ अपनी ही विलक्षणता होती है - जिसमें लगता है, जितनी कुदरत की देन होती होगी, उतनी ही, बल्कि उससे कहीं ज्यादा वहां रहने वाली या किसी न किसी तरह से जुड़ी मानवीय विभूतियों की।यह छायाचित्र देख रहे हैं आप? एक सूखे बरगद और उसकी जटा-मूल संतति की? अपनी ही तरह का एक और वोधि-वृक्ष समझ लीजिए इसे। बरसों पहले, जब यह सूखा नहीं, हरा था तब इसकी छाया में खड़े कृष्णमूर्ति के भीतर एक सपना कौंधा था-खुली आंख का सपना, विश्वविद्यालय न भी सही-एक ऐसा विद्यालय ही कम से कम, यहां इसी जगह उगाने का सपना; जो उनके सर्वथा अ-पारंपरिक और सर्वथा क्रांतिकारी जीवन-दर्शन-यानी जीवन की कला (जी हां, यह आर्ट ऑफ लिविंग किन्हीं ‘श्री श्री..’ नहीं, जिद्दू कृष्णमूर्ति की ही ईर्जाद है...) के विचार को चरितार्थ करे; वटवृक्ष की तरह जितनी शाखा, उतने पेड़ (लैटिन-’टोट रैमी टोट अब्रोर्स’) की तर्ज पर।

तो, सुनिए ‘स्कूलों के नाम चिट्ठियाँ’ नामक एक संकलन ही है कृष्णमूर्ति का-उसमें एक जगह वे क्या कह रहे हैं: मनुष्य द्वारा निर्मित समस्त वस्तुओं से-उसके सारे शास्त्रों और देवी-देवताओं से बड़ी है यह ‘जीने की कला: कलाओं में महानतम कला।’ मानव-जाति के लिए जो अब आज की तारीख में एकमात्र आशा बची है, वह यही, कि एक सर्वथा अभूतपूर्व, आमूलचूल नई सभ्यता पनपे इस पृथ्वी पर। वह सभ्यता या संस्कृति केवल मात्र इस जीने की कला से ही जनमेगी। और वह कला केवल ‘संपूर्ण स्वातंत्र्य’ में से ही आ सकती है, और किसी भी तरह नहीं। यह स्वातंत्र्य कोई आदर्श नहीं है, जिसे कि मनुष्य किसी सुदूर भविष्य में पा लेगा। तुम अभी - इसी पल जो करते हो, उसी का अर्थ और महत्व है। उसका नहीं, जो तुम भविष्य में कभी करोगे। जीवन वह है जो अभी बिल्कुल अभी घटित हो रहा है। संपूर्ण स्वातंत्र्य की दिशा में उठा पहला पग ही अंतिम पग है। मूल्य या महत्व जो भी है, वह पहले कदम का ही है। वह कदम तुमने उठा लिया, तो समझो, अनंत संभावनाओं भरा जीवन तुम्हारे लिए खुल गया।

तिरुपति एक्सप्रेस दो घंटा लेट थी। रात आठ बजे चले थे सिकंदराबाद से और मदनपल्ली पहुंचे अगली सुबह साढ़े नौ बजे। हर्षदभाई का जलवा! हमें लेने उनके स्कूल की मैटाडोर आ ही गई। यों कह दिया था उन्होंने साफ, कि वादा नहीं कर सकते-हमें टैक्सी करनी पड़ सकती है। पर उसकी नौबत नहीं आई। स्टेशन से मदनपल्ली शहर भी थोड़ा दूर ही निकला। हमने सोचा भी नहीं था इतनी घनी और यातायात से पटी बस्ती हमें पार करनी पड़ेगी। कदम-कदम पर स्वर्णिम भविष्य का जाल बिछाती तरह-तरह की टेक्नोलॉजी और बिज़नेस मैनेजमेंट की लकदक दूकानों की इमारतें और साइनबोर्ड। कहां खपते होंगे इतने सारे उम्मीदवार। श्रीपति, जो खुद इंजीनियरी और कंप्यूटर टेक्नोलॉजी के कई पापड़ बेल चुका है, बेहद हैरान और त्रस्त हो गया है इस अंतहीन ‘मायाबाजार’ से। वह भी ऋषिवैली के रास्ते पर ! कौन कहेगा अगर पहले से पता न हो कि यही कृष्णमूर्ति का जन्मस्थान है, और यहीं थोड़ी ही दूर पर उनके सपनों की घाटी का विद्यालय भी

कि... अचानक दृश्य बदल गया। इतने कद्दावर, इतने सुंदर और इतने रंग-बिरंगे वृक्ष सड़क के दोनों और कहां कब देखे थे हमने? ज्यों-ज्यों आगे बढ़ रहे हैं, त्यों-त्यों सघन होती जा रही है वृक्षावली..। मोड़ पर मोड़ पार करते हुए अचानक एक जगह फट सा गया जंगल बीचोंबीच से और उसके भीतर से उग आई एक के बाद एक जगमग करती इमारतें। और उनको पार करते ही हमारा छोटा-सा अतिथि-गृह। नीची छतवाली एक वृत्ताकार कुटिया, मानो धरती से एक जान। चारों तरफ सन्नाटा। और उस सन्नाटे में अकस्मात आविर्भूत हर्षदभाई। और उनके साथ ही थर्मस हाजिर है चाय का एकाएक उन्होंने अपना मोबाइल निकाला और थपथपाने लगे उसे। ‘ये देखिए, आज सुबह ही सैर के दौरान क्या अद्भुत दृश्य दीखा मुझे।’ विस्फारित आंखों से देखा हमने कि वन-वीथी के आरपार एक नागराज पसरे हुए हैं अपना फन काढ़े.. मानो हमारे ही स्वागत को।.. ‘यों तो मिलते रहते हैं सर्प यहां रोज ही। मगर ‘कोबरा’ का दर्शन कभी-कभार ही होता है। इसलिए, सोचा आपको भी करा दूं। चलिए आप नहा-धो लीजिए। फिर ले चलते हैं आपको परिसर घुमाने।

नहा-धोकर निकले हैं हम ऋषिवैली के परिसर की परिक्रमा करने। रास्ते में गैंती-फावड़ा लिए चहकती-खिलखिलाती छात्राओं की एक टोली मिली तो हम पर भी मस्ती छा गई। कहां है कोबरा यहां, इस आनंद-वन में?

छुट्टी का दिन है आज। कक्षाएं नहीं लगेंगी। पर श्रमदान तो बारी-बारी से नित्य की चर्या है। खासा बड़ा और सादा, मगर सुरुचिपूर्ण स्थापत्य वाला परिसर। ‘वह देखिए...कृष्णमूर्ति इसी मकान में रहते थे जब भी आते थे।’... कोई तीन सौ एकड़ में विस्तृत है परिसर हाल ही में 100 एकड़ भूमि अतिरिक्त आ जुड़ी है- नब्बे वर्ष की लीज पर। ‘बायोडेवलपमेंट प्रोग्राम’ के तहत। सर्वाधिक प्रभावित किया हमको, नए-नए खुले इस ‘बायोडेवलपमेंट सेंटर’ ने, जो सचमुच ही बहुत अच्छा काम कर रहा है: ठाकुर के ‘श्रीनिकेतन’ का अधुनातन संस्करण। लौटते हुए रास्ते में ‘बोधि वृक्ष’ के सामने पड़ी बेंचों पर सुस्ता रहे हैं हम। सामने ही एक सीधी खड़ी चढ़ाई वाली पगडंडी हमें लुभा रही है। ‘ऊपर चोटी से बहुत सुंदर दृश्य दिखाई देता है, समूची ऋषिवैली का।’ हर्षद कह रहे हैं। ‘मगर समय कहां है आपके पास? देखते हैं - अभी तो लंच का समय हो गया है। चलिए, डाइनिंग हाल चलते हैं।’ डाइनिंग हाल जितना बड़ा है, भोजन उतना ही छोटा। सच पूछें तो हम जैसे भुक्खड़ अतिथियों को देखते हुए जरूरत से ज्यादा ही सादा। ज्यादातर लोग खा-पीकर जा चुके हैं। पर कुछ अध्यापक अभी भी डटे हुए हैं। चलो अच्छा है, इनसे भी कुछ गपशप हो जाएगी।

यों पाठ्यक्रम वही बंधा-बंधाया। जैसा कि सभी स्कूलों में होता है। कुछ भी नया नहीं । लगता नहीं प्रथमदृष्टया, कि ‘क्रिएटिविटी’ जो कृष्णमूर्ति के जीवन-दर्शन में सारे मूल्यों का चरम मूल्य है, उसे चरितार्थ या विकसित करने का कोई विशेष और विलक्षण मार्ग यहां निकाला गया हो। शिल्प-विभाग और अन्य विभागों की सैर की हमने। हिंदी और अंग्रेजी में कुछ बड़ी मनोरंजक ‘एक्सरसाइजेज’ दिखाई दीं श्यामपट पर लिखीं। सबसे ज़ोरदार चीज लगी एंफीथियेटर। जो सचमुच कमाल ही है। प्रकृति का ऐसा सानिध्य अपने आप में सबसे बड़ी शिक्षा और दीक्षा भी है- यह तथ्य इस परिसर में बिल्कुल नई तरह से हमारे दिमाग पर हावी हो रहा है।

हम लौटकर आ गए हैं वापस अपने अतिथिगृह। एक उत्तराखंडी सज्जन भी आ गए हैं हमसे मिलने। हर्षदभाई उन्हें भी तुरत-फुरत नागराज के दर्शन करवा रहे हैं। मगर उनके उत्साह पर ठंडा पानी डाल दिया उनके सहचर ने। ‘नहीं जी, यह कोबरा कत्तई नहीं। बड़ा जरूर है। फुंफकारता भी बहुत तेज है। मगर जहरीला भी बहुत तेज है। मगर जहरीला नहीं है।’ चलो जान छूटी। हर्षदभाई ने तो हमें खामखां डरा-सहमा दिया था कि कहीं यही कोबरा या उसी का कोई बंधु-बांधव हमारे अतिथिगृह के आसपास ही डेरा डाले हुए हो तो? एकदम धरती से सटी हुई यह कुटिया तो मानो सरीसृपों के लिए ही बनी है। अभी सांझ घिर आएगी, तब क्या होगा? विद्युत प्रकाश भी तो यहां सौर-उर्जा का ही है।

एक और परिक्रमा परिसर की इस बार दूसरी दिशा में - पूरी करके हम वापस गेस्ट हाउस आ गए हैं और बरामदे में बैठकर दो चार अन्य अध्यापक बंधुओं के साथ काफी पी रहे हैं। काफी के साथ कई अवांतर प्रकरण भी धड़ल्ले से खुल और खिल रहे हैं। ऋषिवैली के शैक्षिक प्रयोगों के बारे में ‘फ्राम दि हॉर्सेज माउथ’ जानने का जो कुतूहल मन में था- वह तो अशमित ही रहा आया है। बस इतना ही पता चला है कि परीक्षाफल के लिहाज से यह संस्थान दूसरे तमाम स्कूलों की तुलना में उन्नीस नहीं, इक्कीस ही निकलता आया है। पर इससे क्या? कृष्णामूर्ति की अभिलषित क्रांति से परीक्षाफल का क्या लेना-देना! ‘अवचेतन संस्कार लेके जाते हैं बच्चे, जो जिंदगी भर साथ देंगे।’ हर्षदभाई कहते हैं। पर इससे मेरा समाधान नहीं होता। संस्कार और परंपरा का भला कृष्णमूर्ति से क्या लेना-देना! वे तो दोनों को सच्ची स्वतंत्रता के मार्ग में बाधक ही मानते हैं। दोनों से मुक्त होने की जरूरत पर बल देते हैं।

फिर वही कम्युनिस्ट कीड़ा, जो हर विलक्षणता, हर वैशिष्ट्य के सामने आते ही मुझे, कुरेदने-काटने लगता है, यहां भी मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा।... तो निकल ही गया मुंह से मेरे- ‘ऋषिवैली में पढ़ने वालों के जितने अभिभावकों से मिला हूं मैं आज तक, वे सभी या तो ब्यूरोक्रैट थे, या खासे संपन्न और अभिजात वर्ग के। फीस भी आपके यहां काफी तगड़ी होती है। तो क्या यह संस्थान बड़े लोगों के लिए ही है? आपने खुद ही मुझे लिखा था पत्र में, कि कृष्णमूर्ति का इनर सर्किल भी ठेठ अभिजातों और वह भी विदेशी अभिजातों वाला ही था।’ इससे क्या? हर्षद बोले अभिजातों संपन्नों-ताकतवरों का दिमाग बदलना ही तो सबसे ज्यादा जरूरी है। और ऐसा भी नहीं है कि हमारे स्कूलों के दरवाज़े ग़रीबों के लिए बंद हों। कम संख्या में ही सही, वे भी प्रवेश पाते हैं यहां। उनके लिए विशेष प्रावधान किया गया है।

मन में था कि सीधे छात्रों से मिलूं और उन्हीं से पता करूं किस मानी में वे अपने-आपको दूसरे ऊँचे संस्थानों में पढ़ रहे अपने साथियों से अलग पाते हैं? पर वैसा मौका मिला नहीं। कुछ अध्यापक ज़रूर इधर-उधर टकराए। मगर हर कोई तो हर्षदभाई नहीं हो सकता। न होना चाहता है। भाग्यवान थे वे, जिन्हें कृष्णमूर्ति के जीवन-काल में सानिध्य मिला उनका यहां। हालांकि वीडियो पर भी कृष्णमूर्ति को देखना - सुनना अद्भुत अनुभव होता है। कुछ बानगियां पेश की जाएं? तो लीजिए, सुनिए। एक अभिभावक पूछता है, मैं अपने बच्चों को बेहद प्यार करता हूं। कैसे उन्हें शिक्षित करूं कि वे सर्वांगपूर्ण मनुष्य बने? ...तो कृष्णमूर्ति क्या कह रहे हैं, सुन लीजिए - मुझे इसमें सौ फीसद शक है कि हम अपने बच्चों से सचमुच ‘प्रेम’ करते हैं। और उन्हें वही बनने देना चाहते हैं जो वे स्वरूपतः हैं। हम कहते ज़रूर हैं ऐसा, मगर हकीक़त क्या है? यदि हम अपने बच्चों से सचमुच प्रेम करते, तो क्या ‘युद्ध’ नाम की चीज का अस्तित्व भी होता संसार में?

यदि हम उन्हें प्रेम करते, तो मनुष्यता इस कदर जाति और धर्म और राष्ट्र के नाम पर बँटी होती? यदि ह प्रेम को जानते और जी सकते तो दुनिया इस वक्त जैसी है, उससे पूरी तरह भिन्न होती। बेशक हमें अपने बच्चों को लेकर और सामाजिक संरचना को लेकर भी आमूलचूल क्रांति लानी होगी, जिसका सीधा मतलब यही होता है कि हम अपने बच्चों का इस्तेमाल अपनी मनमानी लालसाओं और आकांक्षाओं की तुष्टि के लिए कदापि नहीं करेंगे-जैसा कि हम करते आए हैं हजारों सालों से। ‘प्रेम ’ की हमारी समझ कितनी उथली और बंजर है यह हमारी समझ में तभी आएगा, जब हम सबसे पहले बच्चों को नहीं, उनके शिक्षकों को शिक्षित करने का बीड़ा उठा लें। वर्तमान शिक्षा तो हमें चतुर-चुस्त यानी नृशंस ही बनाती है। बेशक तुम्हें अपने काम में चतुरता-दक्षता भी चाहिए। मगर वास्तविक संवेदनशीलता और आत्मसंघर्ष का मोल चुकाकर नहीं। हमें पूरी तरह चेतन-जागरूक होना होगा। उस सब के प्रति, जो हमारे चारों ओर है और हमारे भीतर भी। लेकिन यह तथाकथित दिमाग तुम्हारा अचूक कंप्यूटर के सिवा और क्या है? जब हम अपने दिलोदिमाग की इस अंतहीन यंत्र-प्रक्रिया को जान लेते हैं तभी अपनी उस विलक्षण व्यक्तिमत्ता का भी साक्षात करते हैं, जो इस दुश्चक्र को पलट सकती है - एक आमूलचूल नई संस्कृति को जन्म ले दे सकती है।

इसी तरह एक श्रोता ‘प्रार्थना’ की बात करता है तो कृष्णमूर्ति कहते हैं - प्रार्थना में पसरा हुआ हाथ उतना ही और वही पाता है, जितना, और जो कुछ हजारों बरसों की यंत्रचर्या में कीलित हमारे मन में ठुंसा हुआ है। एकमात्र जो चीज हमें छुटकारा दिला सकती है, वह है इस मन-मस्तिष्क रूपी मशीन की प्रक्रिया को सचमुच आरपार देख लेने की सामर्थ्य पा लेना यानी आत्म-ज्ञान। प्रार्थना और सारे परंपरागत मज़हबी उपाय इस असली आत्मज्ञान की राह के रोड़े भर हैं, और कुछ नहीं। यह पृथ्वी सच्चा प्यार और सच्ची हिफाज़त चाहती है, मेरे और तुम्हारे बीच का बँटवारा और वर्गीकरण नहीं। जब तक यह अलगाव है, तब तक संवेदनशीलता असंभव है: संवेदनशीलता के प्रति और चराचर जीवन-मात्र की अंतहीन ललकार के प्रति।

अब जहां तक ‘प्रकृति’ का प्रश्न है, कृष्णमूर्ति जैसी संवेदनशीलता के प्रकृति के प्रति आपको कहीं नहीं मिलेगी। आप उनकी डायरी पढ़िए-आप विस्मयाभिभूत हो जाएंगे, जैसे कि मैं भी हुआ था बीस साल पहले उसे पढ़कर राजघाट में ठीक यही कैफियत तारी होती है आप पर - ‘कमेंट्रीज ऑन लिविंग पढ़ते हुए, जो आल्डस हक्सले के अनुरोध पर लिखा गया था। कैसा भी जन्मजात और सिद्ध कवि भी छटपटा उठे ईर्ष्या से ऐसा है कृष्णमूर्ति का चराचरसंवेदी गद्य। लेकिन जहां तक आपकी सामाजिक संवेदना का सवाल है, वह आपको उनके यहां उतनी प्रत्यक्ष नहीं लगेगी, क्योंकि उसमें भावुकता और विचारधारायी पुण्यात्मापन के लिए रत्ती भर भी अवकाश नहीं। वह ‘विकल्पहीन चैतन्य’’ का सदा-जागृत दर्शन है जो शब्दों से नहीं झिलता। विचारणा नहीं, भक्ति भी नहीं, योगाभ्यास भी नहीं, विशुद्ध साक्षीचेतना और उसका नैरतर्य ही कृष्णमूर्ति के कथनानुसार मानव-व्यक्ति के लिए उस मुक्तावस्था का द्वार खोल सकता है, जहां कोई भय-द्वंदू नहीं रह जाता और स्वयं का काल बोध भी पूरी तरह बदल जाता है।

अचानक हर्षद भाई बोल पड़े जोर से-कृष्णमूर्ति के दर्शन की कुंजी मृत्यु के प्रति उनके उस स्वीकार - भाव में है जो ठीक इस तरह और कहीं नहीं मिलता वे फुर्ती से लपक कर भीतर जाते हैं और एक किताब लाते हैं। सुनिए जरा...

जो कुछ भी मनुष्य ने जोड़ा-बटोरा है, वह सब पूरी तरह यहीं छूट जाना है। कुछ भी साथ नहीं जाता-कुछ भी। मरने का एकमात्र अर्थ यही है। छोड़ना हर चीज को पूरी तरह चिपकने नहीं देना किसी भी चीज को अपने से। क्या तुम कर सकते हो ऐसा-नित्यप्रति और अनुक्षण? नहीं, तुम्हारा दिमाग, तुम्हारी तालीम, तुम्हें कुछ भी त्यागने नहीं देंगे। तब फिर इस भयानक लोभ और मोह की गुलामी से कौन तुम्हें छुड़ा सकता है? प्रेम और मृत्यु पल-प्रतिपल साथ-साथ हैं। मृत्यु तुमसे कह रही है मुक्त हो जाओ अभी इसी पल, क्योंकि कुछ भी तुम्हारे साथ जाने वाला नहीं है। और उसी के सुर में सुर मिलाते हुए प्रेम करता है - प्रेम वहीं हो सकता है जहां संपूर्ण स्वतंत्रता है।

वटवृक्ष, जो ऋषिवैली का प्रेरणास्रोत बनावटवृक्ष, जो ऋषिवैली का प्रेरणास्रोत बनास्वतंत्रता किससे? तुम्हारी औरत से, या तुम्हारे मर्द से? या कि तुम्हारी लालसाओं-कामनाओं की अंतहीन लपेट से? खोल दो एकबारगी इस लपेट को। ऊर्जा, अक्षय ऊर्जा का स्रोत वही हैं - उसी असली स्वतंत्रता में।

कुछ भी साथ नहीं ले जा सकते तुम। तो फिर अभी इसी क्षण घुलने-मिलने क्यों नहीं देते जीवन और मृत्यु को? क्यों नहीं झटककर फेंकते, क्यों नहीं मुक्त हो जाते तुम अपनी समस्त आसक्तियों से? मृत्यु और इसके सिवा क्या है - मुझे बताओ। अनासक्त हो जाओ-आज और अभी। कल किसने देखा है? क्यों नहीं जीना और मरना हमारा जीते जी एक साथ चले क्षण-प्रतिक्षण? पता नहीं, इस बात के समूचे सौंदर्य को तुम देख पा रहे हो कि नहीं? देख पाओ तो अपने भीतर तुम्हें मुक्ति का ऐसा प्रपात अनुभव होगा जैसा तुमने आज तक कभी नहीं जाना। हर दिन एक नया दिन, हर क्षण में समूचा भविष्य धड़कता हुआ जिंदा। पूछो बारंबर खुद से मरना यानी क्या? देखो इस बात के अथाह अपार सौंदर्य को। जीवन के प्रत्येक क्षण तुम मर रहे हो- इसका अर्थ क्या हुआ? यही न, कि वास्तव में ता जिंदगी तुम किसी भी चीज से बंधे हुए नहीं हो। तो फिर यह अर्थ जान लेने के बाद डरना कैसा? क्या तुम डर रहे हो अब भी। मौत से?

चलिए गाड़ी आ गई - अचानक झटका सा लगता है सुनकर। गाड़ी में दो जने और भी बैठे हैं। अध्यापक होंगे। चलो कुछ गपशप ही रहेगी। बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा है बिछुड़ना इस अरण्यानी से इतनी जल्दी। क्या ही मति मारी गई थी हमारी कि जो दो दिन भी पूरे निकाल नहीं सके हम अभागे। ऋषिवैली में सुबह की असेंबली देखते पेड़ों की छांव में लगती कक्षाओं में बैठते इतनी सारी कविताएं लिखी हैं बच्चों के लिए। वही सुनाते-कितना मजा आता। कितना प्रफुल्ल हुई थीं वे मैडम-जब डाइनिंग हाल से निकलते हुए यों ही उनकी फरमाइश पर ‘बहुत दिनों की बात है बच्चों’ सुनाई थी। उन्हें भेजने हैं संग्रह सारे। वचन दे चुका हूं उन्हें।

उफ! वह ‘ऋषियों की घाटी’ वाली पुस्तिका तो मैं भूल आया, जिसमें उन ऋषियों के बारे में लिखा था जो कभी यहां रहते थे। चलो, छोड़ो। इस भारतभूमि का ऐसा कौन सा कोना है जो ऋषि-मुनियों या पुराणों महाकाव्यों के छोटे-बड़े नायकों-नायिकाओं से अछूता छूट-बड़े नायकों- नायिकाओं से अछूता छूट गया हो? नायपॉल इसी पर न लहालोट हैं। आखिर हम श्रुति-परंपरा वाले हैं, स्मृति-वह भी ऐतिहासिक स्मृति-वह भी ऐतिहासिक समृति-कहां लगती है इस श्रुति के सामने? क्या कृष्णमूर्ति नहीं जानते थे इसे? जानते थे, तभी न, नए सिरे से इस वैली का नाम सार्थक करने की सूझी उन्हें। यह कोई जन्मस्थली का मोह, या कि ‘नॉस्टेल्जिया’ तो था नहीं।

लो, मदनपल्ली भी आ गया। मगर इतना यातायात। यह तो हद है। जितना समय स्कूल से यहां तक पहुंचने में लगा-उससे कहीं ज्यादा समय यह जाम खा लेगा क्या? ट्रेन तो राइट टाइम है और वह राइट टाइम एकदम पास आ गया है। कहीं... चूक गए ट्रेन पकड़ने से तो? यों तो अच्छा है इसी गाड़ी से वापस चले जाएंगे। कल एक दिन और ऋषि घाटी का आनंद ले सकेंगे। अपनी भूल की भरपाई भी हो जाएगी। मगर फिर अगले दिन की ट्रेन का आरक्षण कैसे मिलेगा? वह तो असंभाव्य है एकदम।

लो.. इधर हम प्लेटफार्म में दाखिल हुए, उधर तिरुपति एक्सप्रेस धड़धड़ाती हुई हमारे सामने आ लगी। लेटते ही नींद ने धर दबोचा। और नींद में ही लिंगमपल्ली आ गया जहां से अपना अतिथि गृह मात्र दो किलोमीटर के फासले पर है। ओह हौर्सले हिल्स तो रह ही गया। पर उसका कोई मलाल नहीं। हिमालयवासीके लिएए भला हौर्सले हिल्स का क्या आकर्षण, जो किसी घोड़े का नहीं, बल्कि उस जमाने के किसी अंग्रेज कलेक्टर का नाम है। अंग्रेज हर जगह हिल स्टेशन खोजता है। और कहीं भी हिल स्टेशन की सुखद भ्रांति उपजा के ही संतुष्ट हो जाता है। लेकिन हमारे लिए तो वह भ्रांति ही हुई न? वैसे भी ‘ऋषिवैली’ देख चुकने के बाद अब कैसी भ्रांति।

अब लौ. नसानी, अब ना नसैहों।
लो, अतिथि-गृह भी आ गया। श्रीपति मुझे पहुँचाकर तुरंत अपने घर लौटना चाहता है। एक कप चाय के लिए भी रुकने को तैयार नहीं। मगर..यह अचानक उसे क्या हुआ? किस बात पर ऐसी हंसी आ रही है उसे, जो रोके नहीं रुकती? क्या हुआ श्रीपति?

श्रीपति अपना मोबाइल जेब से निकालकर उसे थपथपा रहा है। ‘कोबरा! वह चिल्लाता है और फिर से खिलखिलाने लगता है। चलो इतनी गुरु-गंभीर यात्रा में उसे ‘कॉमिक रिलिफ’’ के नाम पर कुछ तो मिला?

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