‘जल को जानें’ बनेगा गांधी शांति प्रतिष्ठान का स्वर्ण जयंती अभियान

Submitted by Hindi on Thu, 03/21/2013 - 11:35
कहने को पानी में सबसे कम प्रदूषण औद्योगिक इकाइयां डालती हैं, लेकिन उनका प्रदूषण इतना जहरीला होता है कि अन्य प्रदूषण उनके सामने बौने पड़ जाते हैं। व्यापारिक प्रतिष्ठान तथा औद्योगिक इकाइयां भी अपने ठोस कचरे के प्रति गंभीर नहीं हैं। छोटी ही नहीं, कहीं-कहीं तो बड़ी औद्योगिक इकाइयां भी कचरा निपटान और अवजल के शोधन की आधुनिक व सफल प्रणालियों-तकनीकों की जानकारी नहीं रखती। उन्होंने कभी जानने की कोशिश नहीं की, इन्हें अपनाकर वे कैसे अपने साथ -साथ समाज व प्रकृति का भी लाभ करेंगे। मई, 2013 में गांधी शांति प्रतिष्ठान अपने 50 वर्ष पूरे कर रहा है। इसके मद्देनज़र प्रतिष्ठान ने अगले वर्ष को स्वर्ण जयंती वर्ष के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। इन दिनों प्रतिष्ठान के कर्ताधर्ता स्वर्ण जयंती वर्ष के दौरान आयोजित किए जा सकने वाले विविध कार्यक्रमों की रूपरेखा बनाने में जुटे हैं। उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस वर्ष को ‘अंतरराष्ट्रीय जल सहकार वर्ष’ घोषित किया है। इस दृष्टि से भी गांधी शांति प्रतिष्ठान ने निर्णय लिया है कि मई, 2013 से मई, 2014 के दौरान एक विशेष अभियान चलायेगा। नाम होगा - ‘जल को जानें’। मुझे यह जानकारी प्रतिष्ठान के तत्व प्रचार केन्द्र के समन्वयक श्री रमेशचन्द्र शर्मा द्वारा भेजे एक पर्चे से हुई। सुखद है कि यह अत्यंत प्रतिष्ठित संस्था पानी के काम को भी गांधी मार्ग का ही काम मानती है।

व्यापक मुद्दे: विविध गतिविधियाँ


‘जल को जाने’ - इस विशेष अभियान का उद्देश्य जल का महत्व, संबंधित विचार, स्रोतों की बुनियादी समझ, पानी के प्रति पारंपरिक व आधुनिक दृष्टि, चुनौती व समाधान जैसे मसलों को लोगों के मध्य ले जाना है। अभियान खासतौर पर शिक्षण संस्थाओं और अन्य युवाओं के बीच पानी की बात पहुंचाने का मन रखता है। प्रतिष्ठान छोटी-छोटी बुनियादी जानकारियों, पानी का काम कर रहे व्यक्तियों, संगठनों के कार्यों से जन-जन को अवगत कराने से लेकर अंतरराष्ट्रीय हो चुके पानी मुद्दों को इस अभियान में शामिल करेगा। विभिन्न स्तरीय प्रतियोगिता, अध्ययन, कार्यशाला, व्याख्यान, शिविर, प्रदर्शनी, कविता पाठ, नुक्कड़ नाटक, फिल्म-स्लाइड शो, सहित्य-पर्चे-बैज आदि का वितरण और यात्राओं के अलावा कई ज़मीनी और श्रम आधारित गतिविधियों को भी इस अभियान का हिस्सा बनाया गया है।

चुनौती देते वर्ग क्यों न बनें अभियान की प्राथमिकता?


मेरा मानना है कि आज जल सुरक्षा को सबसे बड़ी चुनौती चार तरफ से है: कृषि, शौच, ठोस कचरा और औद्योगिक अवजल। अतः जल सहकार के लिए सात प्रमुख वर्ग ऐसे हैं, जिन्हें बुनियादी हकीक़त से अवगत कराना और दायित्वपूर्ति के लिए प्रेरित करना जरूरी है: किसान, स्थानीय निकाय, व्यापारिक प्रतिष्ठान, औद्योगिक इकाइयां, सरकारी अस्पताल, निजी नर्सिंग होम और नदी किनारे स्थापित आस्था केन्द्र। यह जल सहकार का असली काम होगा। पानी की सबसे ज्यादा खपत कृषि क्षेत्र में है। नहरी सिंचाई प्रणाली का दुरुपयोग, अधिक सिंचाई से कम उपज के प्रति जानकारी का अभाव, कम पानी में अधिक उपज के वैज्ञानिक तौर-तरीकों की जानकारी व संसाधनों का अभाव तथा कृषि में रसायनों का बढ़ता प्रयोग जैसे मसले चुनौती बढ़कर खड़े हैं। आज नदी के पानी की बी ओ डी कम करने से ज्यादा बड़ी समस्या कोलीफॉर्म की बेतहाशा बढ़ती संख्या बन गई है। कोलीफॉर्म मल की उपज है। यदि नगर-निगम, नगरपालिकाएं और जिला पंचायतें तथा टाउन एरिया कमेटियां मल प्रबंधन और कचरा निपटान के प्रति सजग और ईमानदार हो जायें, तो ही तस्वीर बदल सकती हैं। नदी किनारे के मठ-मंदिर-आश्रम अपना कचरा नदी में बहा रहे हैं। उन्हे स्वयं अनुशासन की जरूरत है।

कहने को पानी में सबसे कम प्रदूषण औद्योगिक इकाइयां डालती हैं, लेकिन उनका प्रदूषण इतना जहरीला होता है कि अन्य प्रदूषण उनके सामने बौने पड़ जाते हैं। व्यापारिक प्रतिष्ठान तथा औद्योगिक इकाइयां भी अपने ठोस कचरे के प्रति गंभीर नहीं हैं। छोटी ही नहीं, कहीं-कहीं तो बड़ी औद्योगिक इकाइयां भी कचरा निपटान और अवजल के शोधन की आधुनिक व सफल प्रणालियों-तकनीकों की जानकारी नहीं रखती। उन्होंने कभी जानने की कोशिश नहीं की, इन्हें अपनाकर वे कैसे अपने साथ -साथ समाज व प्रकृति का भी लाभ करेंगे। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कारपोरेट घरानों की मरी संवेदनाओं को भी जगाना जरूरी है। ऐसा मानकर चलना कि मुनाफ़े की लालच में वे तो ऐसा करेंगे ही... ठीक नहीं होगा।

गांधी शांति प्रतिष्ठान की वर्तमान अध्यक्षा सुश्री राधा बहन जमनालाल बजाज पुरस्कार के निर्णायक मंडल की सदस्य हैं। मोहनदास को गांधी बनाने में स्व. श्री जमनालाल बजाज की भूमिका भुलाई नहीं जा सकती। इस नाते भी उम्मीद करनी चाहिए कि यह अभियान कम से कम बजाज घराने को तो प्रकृति की कदर करने के लिए प्रेरित कर ही सकेगा। बजाज व दूसरे औद्योगिक समूहों को ऐसा करने के लिए यदि प्रेरित किया जा सका, तो उनकी नजीर आगे बड़े नतीजे लाएंगी। पानी के अक्सर अभियान किसानों, व्यापारियों, उद्योगपतियों और स्थानीय निकायों को अपना लक्ष्य समूह नहीं बनाते; जबकि सबसे ज्यादा प्रेरक और गहन संवाद की जरूरत इनके बीच ही है। न्यायपालिका, कार्यपालिका और पत्रकार वर्ग के बीच में जल को जानने की गंभीर व समग्र कोशिश कभी नहीं हुई। उम्मीद है कि यह अभियान जलसुरक्षा को चुनौती दे रहे वर्गों को प्राथमिकता सूची में पीछे नहीं रखेगा।

पहले घर: फिर बाहर


यह अन्यथा लेने की बात नहीं, लेकिन यदि गांधी शांति प्रतिष्ठान का इस अभियान के बाद सिर्फ खादी और गांधीवादी संगठनों में पॉलीथीन, पॉली प्लेट-पत्तल-दोने-गिलास-बोतलबंद पानी की ख़रीद व प्रयोग बंद हो गये; कचरे का उचित प्रबंधन होने लगा; शौच नदी में जाने से रुक गया... तो यह अभियान स्वयमेव सफल मान लिया जायेगा। हम जागेंगे: जग जागेगा। अग्रिम बधा !

जल को जाने’ अभियान से जुड़ने के लिए

संपर्क:
तत्व प्रचार केन्द्र, गांधी शांति प्रतिष्ठान केन्द्र, 221-223,
दीनदयाल उपाध्याय केन्द्र, नई दिल्ली 11002,
फोन: 011- 23237491/93,
ईमेल :- gpf18@rediffmail.com

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

शिक्षा:


स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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