नीयत साफ हो, तब नदी

Submitted by Hindi on Mon, 03/25/2013 - 10:11
Source
राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 23 मार्च 2013
कोई भारतीय सिद्धांत आज भी अमृत में विष को मिलाने की इजाज़त नहीं देता। 1932 में पहली बार बनारस के अंग्रेज कमिश्नर हॉकिन्स ने अमृत में विष मिलाने का उलटा काम शुरू कराया। गंगा से नाला जोड़ने का एक लिखित आदेश जारी किया। नदियों को प्रदूषित करने का भारत में यह पहला दर्ज आदेश है। ताज्जुब यह है कि इसके बाद एक भी आदेश ऐसा नहीं मिलता, जो नदियों को प्रदूषित करने की इजाजत देता हो। नाले को नदी से जोड़ने का कोई अन्य आदेश मेरे संज्ञान में नहीं है। कोई ऐसा आदेश नहीं, जो कहता हो कि नदी भूमि या बाढ़ क्षेत्र को शहरी कचरे-मलबे से भर दिया जाए। राधा रानी यमुना रक्षा पदयात्रा दिल्ली आई। आलीगांव को गुलजार किया। कुछ कलमें चलीं। कुछ फ्लैश लाइट चमकीं। कुछ आवाजें मुखर हुईं। राजनेताओं ने भी दिखाई थोड़ी संवेदना। आश्वासन भी मिला। एक समूह ने जताई सहमति। एक समूह वापस जंतर-मंतर पर। संघर्ष जारी रहेगा। ..अब आगे? प्रदूषण को लेकर कानून हैं, कायदे हैं, इन्हें लागू कराने के लिए मंत्रालय है, प्रदूषण नियंत्रणबोर्ड हैं, ग्रीन ट्रिब्युनल हैं; अदालतें हैं; जिला पंचायतें हैं, नगर निगम पालिकाएं हैं..प्रशासन है। अब तो एक पूरी रिवर बेसिन अथॉरिटी ही यह सुनिश्चित करने में लगी है कि नदी प्रदूषण मुक्त रहे। प्रदूषण मुक्ति के लिए जरूरी तकनीक भी है और तकनीकी संस्थान भी; बजट भी है और योजनाएं भी। विमर्श व जागृति के लिए नित्य नये सेमिनार और साहित्य की भी कमी नहीं। अनशन और आंदोलनों का सिलसिला चल ही रहा है। बावजूद इसके, भारत में एक भी नदी ऐसी नहीं, जिसके बारे में सरकार दावा कर सके कि वह उसके द्वारा पूरी तरह प्रदूषण मुक्त कर दी गई है। आखिर ऐसा क्या है, जिसके न होने से हमारी नदियां प्रदूषित हो रही हैं और हम कुछ नहीं कर पा रहे?

प्रदूषण और नदियां पयार्यवाची कैसे हुई?


यदि पिछले सौ बरस का इतिहास देखें तो नदियों को लेकर कई तरह संघर्ष हुए। भीमगौड़ा बांध(हरिद्वार)प्रस्ताव के खिलाफ 1912 में अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के नेता लालसुखवीर सिंह की खुली बगावत से लेकर आज तक..यदि मैं बांध, बैराज, अवैध कब्जे और बंटवारे को लेकर हुए संघर्षों पर इस लेख में चर्चा न भी करूं तो अकेले प्रदूषण मुक्ति संघर्षों की फ़ेहरिस्त लंबी है। अकेले उत्तर प्रदेश में काली, कृष्णा, हिंडन, गोमती, सई, पांडु, मंदाकिनी, आमी की प्रदूषण मुक्ति के संघर्ष हैं। राजस्थान में बांडी-लूणी, महाराष्ट्र की गार्वी-मीठी और झारखंड में दामोदर जैसे कई संघर्ष चल रहे हैं। तमिलनाडु की अडियार-कूवम, कर्नाटक की अरकावती-वैधवती के अलावा गंगा और यमुना जैसी अंतरराज्यीय नदियों के संघर्ष में मुख्य मुद्दा आज प्रदूषण ही है। जयपुर ने तो द्रव्यवती नदी का नाम ही बदलकर अमानीशाह नाला लिख दिया गया है। जानकारों के मुताबिक साबी नदी के निचले सिरे को ही आज हम नजफगढ़ नाले के नाम से जानते हैं। यह सब इसके बावजूद है कि जल के साथ व्यवहार का मूल भारतीय सिद्धांत अमृत को विष से अलग करने पर आधारित है। क्या यह जरूरी है कि हम पहले नदी को गंदा करें और फिर उसे साफ करने के नाम पर कई हजार करोड़ खर्च कर दें? क्या यह नहीं हो सकता कि हम नदी को गंदा ही न करें?

कोई भारतीय सिद्धांत आज भी अमृत में विष को मिलाने की इजाज़त नहीं देता। 1932 में पहली बार बनारस के अंग्रेज कमिश्नर हॉकिन्स ने अमृत में विष मिलाने का उलटा काम शुरू कराया। गंगा से नाला जोड़ने का एक लिखित आदेश जारी किया। नदियों को प्रदूषित करने का भारत में यह पहला दर्ज आदेश है। ताज्जुब यह है कि इसके बाद एक भी आदेश ऐसा नहीं मिलता, जो नदियों को प्रदूषित करने की इजाजत देता हो। नाले को नदी से जोड़ने का कोई अन्य आदेश मेरे संज्ञान में नहीं है। कोई ऐसा आदेश नहीं, जो कहता हो कि नदी भूमि या बाढ़ क्षेत्र को शहरी कचरे-मलबे से भर दिया जाए। मालूम नहीं, ऐसा भी कोई आदेश है या नहीं, जो कहता हो कि साफ किए जाने के बाद फैक्टरी या मल के अवजल को नदी में ही डाला जाए। आदेश है तो नदियों में कचरा न डालने का। आदेश है तो, अलग-अलग नदियों में प्रवाह से क्रमश: 200 से 500 मीटर की दूरी तक निर्माण प्रतिबंधित करने का। नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल का ताज़ा आदेश यमुना में डंप किए ठोस कचरे को उसी के खर्च पर हटाने के लिए कहता है, जिसका कचरा है। बीते कुंभ के दौरान मेला क्षेत्र में पॉलीथीन पर प्रतिबंध का आदेश था ही।

सीवर को रिवर से अलग करने की नीति बने


यह वैज्ञानिक सिद्धांत भी सर्वमान्य है कि ताज़ा जल नदी में बहने दिया जाए और गंदे पानी को साफ करके नहरों में डाला जाये। सोचने की बात यह है कि बावजूद इसके आज ताज़ा जल नहरों में और गंदा पानी नदियों में बहाने की उलटबांसी हर जगह दिखाई जा रही है। तमाम नाले नदियों से जो जोड़ दिए गये हैं। फ़ैक्टरियों के ठोस खतरनाक रासायनिक कचरे को भी हम नदियों में भर ही रहे हैं। अस्पतालों के गंदे-लिजलिजे कचरे को ही हम कहां रोक पा रहे हैं? यह बात भी सैद्धांतिक तौर स्पष्ट है कि जिस चीज या गुण को जितना दूर तक ले जाएंगे, वह उतना फैलेगा। कचरे को ढोकर ले जाएंगे, कचरा फैलेगा। इसीलिए कचरे को ढोकर ले जाना वैज्ञानिक व नैतिक..दोनों तरह से पाप माना गया है। सिर पर मैला ढोने को हमने इसी बिना पर प्रतिबंधित किया। कैंसर का इलाज उसके मूल स्रोत पर ही किया जाता है। कचरे का निपटान भी उसके मूल स्रोत पर ही किया जाना चाहिए। परंपरागत त्रिकुंडीय ‘सेप्टिक टैंक’ यही करता है। बावजूद इसके हम सीवर पाइप लाइनों को तेजी से अपनाते जा रहे हैं।

इसका मतलब एक बात साफ है कि अभाव जानकारी, कानून, तंत्र या पैसे का नहीं..अभाव नीयत का है। यदि हमारी नीयत साफ होती तो आज़ादी का क्रांतिदूत बना मेरठ अपने कत्लखानों को नदी किनारे न लगाता और खुशबूदार इत्र के लिए मशहूर कन्नौज गंगा में बदबू फैलाने का अपराध कभी न करता। जहां नीयत साफ हुई, वहां नदी भी साफ हो गई। पंजाब की कालीबेंई, सहारनपुर की पांवधोई, पाली की लूणी नदी इसका प्रमाण हैं। कोलकाता की निर्मल कथा पढ़कर आप आनंदित हो उठेंगे। देश में पिछले कुछ वर्षों से नदी नीति की मांग उठ रही है। कहा जा रहा है कि सीवर को रिवर से अलग रखने की नीति बने। इसी अपेक्षित नीति के आधार पर ही यमुना रक्षक दल द्वारा दिल्ली के सीवेज को यमुना में डालने के बजाय साफ करके डालने की मांग की गई। नीति संघर्षकर्ताओं के हाथ का एक औजार बन सकती है। जननिगरानी का सशक्त तंत्र प्रदूषण नियंत्रण में बड़ी भूमिका निभा सकता है। लेकिन यदि नीयत ही ठीक न हो तो नीति और निगरानी क्या करेगी? यह नीयत का ही मामला है कि अब इस देश की अदालतें और ट्रिब्युनल भी इस बात का दावा नहीं कर सकते कि उनके दिए आदेश क्रियान्वित हो ही जाएंगे।

नदियों की धुलाई की शर्त यह है कि..


यदि नीयत ठीक होती, तो सरकार ‘यमुना रक्षक दल’ से लिखित समझौता करती। उसे अधिसूचित करने की बात कहती। वाया हिंडन गंगा का पानी यमुना में डालने के बजाय यमुना नहर के इलाकों में नहरी सिंचाई पर निर्भरता घटाने की योजना बनाती। तालाबों, झीलों, कुंओं को जिंदा कर भूजल के भंडारों को भरने के लिए धन आवंटन करती। मनरेगा के तहत बन रहे तालाबों की गलत डिज़ाइन व स्थानों के चयन में गलती को सुधारती। कोशिश करती कि पानीपत-सोनीपत की फैक्टरियां फायदे से ज्यादा कायदे की चिंता करें। नई बस्तियों और सोसाइटी परिसरों को सीवर पाइपलाइनों से जोड़ने के बजाय विकेन्द्रित व सामुदायिक मल शोधन प्रणालियों को अपनाने के लिए धन व तकनीकी सहायता मुहैया कराती। यह सुनिश्चित करती कि दिल्ली के हर अस्पताल/नर्सिंग होम में इन्सिनरेटर पूरा काम करे। पॉलीथीन व गुटखे पर दिल्ली में लगा प्रतिबंध कागजी होकर रह गया है। यह न हो। सरकार ने ऐसा नहीं किया। दरअसल, दुनिया में जो कुछ भी घटता है;उससे पहले वह किसी के दिलो-दिमाग में घट चुका होता है। नदियां प्रदूषित बाद में हुई, हमारा दिमाग और दिल पहले। जिस दिन हमारा दिलो-दिमाग प्रदूषण मुक्त हो जाएगा, हमारी नीयत साफ हो जाएगी और हिंदुस्तान की नदियां भी। दुआ कीजिए! एक दिन ऐसा ही हो।

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

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स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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